कश्मीर जन्नत है, लेकिन इतिहास दर्दनाक रहा।
सदियों तक कश्मीरी पंडितों पर अत्याचार और पलायन हुआ।
1947 हमला और 1990 पलायन सबसे बड़ा दुखद दौर रहा।
कश्मीर...(Kashmir) जिसे भारत का जन्नत भी कहा जाता है। वो कश्मीर जहाँ झीलों की ख़ामोशी, बर्फ़ से ढकी वादियाँ और पहाड़ों की गोद में बसी खूबसूरती हर दिल में सुकून भर देती है। भारत ही नहीं, दुनिया के हर व्यक्ति के मन में एक ख्वाहिश जरूर होती है कि एक बार वो 'कश्मीर दर्शन' जरूर करे लेकिन क्या आप जानते हैं, सुंदर और जन्नत जैसी दिखने वाली ये कश्मीर अपने भीतर कितने जख्म लेकर बैठी है।
पौराणिक कथाओं के अनुसार कश्मीर को ऋषि कश्यप (Rishi Kashyap) की धरती कहा जाता है क्योंकि कश्मीर शब्द कश्यप-मीर से निकला है। प्राचीन समय में कश्मीर घाटी एक झील थी, जिसे सतीसर (Satisar) कहते थे। मान्यताओं के मुताबिक ऋषि कश्यप ने उस झील का पानी बाहर निकलवाकर इस जगह को बसने योग्य बनाया लेकिन इस धरती पर बसने वाले लोगों को 670 साल तक अत्याचार सहना पड़ा। खासकर कश्मीरी पंडितों (Kashmiri Pandit) को।
कश्मीरी पंडितों (Kashmiri Pandit) पर अत्याचार की कहानी कोई नई नहीं है। 67 दशकों से इस जन्नत जैसी धरती पर रक्त की धाराएं बहती आ रही हैं। कश्मीर आज भी विवादों के घेरे में हैं। कभी आतंकवाद को लेकर तो कभी POK को लेकर। POK कश्मीर का वो भाग जिसपर पाकिस्तान ने जबरन कब्जा कर रखा है। आपको यह जानकर हैरानी होगी कि 670 सालों में 8 बार यहाँ धरती कश्मीरी पंडितों के खून से लाल हुई है। आइये इसके बारे में समझते हैं।
कश्मीरी पंडितों (Kashmiri Pandit) पर अत्याचार की पहली घटना 1320 ईस्वी में मिलती है, जब कादिर खान, जिस इतिहास में दालचा के नाम से जाना जाता था, वो एक मंगोल आक्रमणकारी था। करीब 60000 सैनिकों के साथ वो कश्मीर घाटी आया और जमकर कत्लेआम मचाया। उसने गांव-शहरों को खूब लूटा और वहां आग लगा दी। पुरुषों की हत्या कर महिलाओं और बच्चों को गुलाम बना लिया।
उस समय वहां सहदेव नामक राजा थे, जो डरकर किश्तवाड़ भाग गए। यही कारण रहा कि कश्मीर में हिन्दू शासन कमजोर हुआ और आगे चलकर सदरुद्दीन वहां का सुलतान बना। कहा जाता है कि करीब 8 महीने लूटपाट करने के बाद जब कादिर खान वापस लौट रहा था, तो एक बर्फीले तूफ़ान में फंसकर उसकी और उसके साथियों की मौत हो गई।
सुलतान सिकंदर जिसे सिकंदर बुतशिकन के नाम से भी जाना जाता था। वो कश्मीर के शाहमीर राजवंश के छठा सुल्तान था। बुतशिकन धार्मिक कट्टरता और बड़े पैमाने पर हुए धर्मांतरण के लिए लिए मशहूर है। कहते हैं कि उसने कश्मीर में इस्लामी शरिया कानून को सख्ती से लागू किया और वहां के कई हिन्दू मंदिरों को तोड़ने के साथ मूर्तियों को भी नष्ट किया। यही कारण था कि उसे "बुतशिकन" की उपाधि मिली थी।
बुतशिकन के शासनकाल में पारंपरिक हिंदू रीति-रिवाजों पर पाबंदी लगा दी गई और उस समय बड़ी संख्या में कश्मीरी पंडितों ने पलायन करना शुरू किया। अपने शासनकाल में उसने श्रीनगर में प्रसिद्ध जामिया मस्जिद बनवाया। बुतशिकन के काल में ही ईरान और मध्य एशिया से कई सूफी संत कश्मीर आए, जिनमें मीर मोहम्मद हमदानी प्रमुख थे।
सुल्तान सिकंदर की मौत के बाद उसका बेटा अली शाह गद्दी पर बैठा और उसने अपने बाप के कट्टर नीतियों को ही आगे बढ़ाया। इस दौर में भी कश्मीरी पंडितों (Kashmiri Pandit) पर काफी ज़ुल्म हुए। शाह ने भी 'जज़िया' कर (गैर मुस्लिमों से लिया जाने वाला टैक्स) को जारी रखा। जो पंडित कर (टैक्स) नहीं दे पाते थे, उन्हें गंभीर यातनाएं झेलनी पड़ती थी। अली शाह का एक प्रधानमंत्री था, जिसका नाम सुहभट्ट (जो धर्मांतरण कर सैफुद्दीन बना) था और इसका रवैया हिन्दुओं के प्रति काफी कठोर था।
शाह के कहने पर उसने पंडितों के धार्मिक रीति-रिवाजों, तिलक लगाने और पवित्र धागा (जनेऊ) पहनने पर कड़ी पाबंदी लगा दी। कई पंडितों ने तो इस्लाम कबूल करने से ज्यादा मृत्यु को गले लगाना जरूरी समझा। कुछ पलायन कर गए, तो कुछ ने ज़हर खा लिया। अली शाह के काल में कश्मीरी पंडित समाज पूरी तरह बिखर गया था।
कश्मीरी पंडितों (Kashmiri Pandit) के लिए काजी चक और मूसा रैना का शासनकाल किसी श्राप से कम नहीं था। ये सबसे भयानक और दमनकारी दौर माना जाता है। मूसा रैना का शासन काल 1501–1513 के आसपास बताया जाता है। रैना ने सुल्तान फतह शाह के प्रधानमंत्री के रूप में कार्य किया था और उसने कश्मीरी पंडितों के खिलाफ काफी क्रूर अभियान चलाया था। इतिहासकार बताते हैं कि उसके काल में करीब 24000 हिन्दुओं को जबरन इस्लाम में परिवर्तित होने के लिए मजबूर किया गया था। कई मंदिरों को ध्वस्त करके वहां मस्जिद का निर्माण करवाया गया।
वहीं, काजी चक का शासन काल 1519–1545 तक रहा और ये भी धार्मिक कट्टरता के लिए जाना जाता था। कई रिपोर्ट्स के मुताबिक उसने एक दिन में 800 हिन्दू नेताओं का कत्ल करवाया था क्योंकि उन्होंने इस्लाम कबूल करने से मना कर दिया था। हालत इतनी दयनीय हो गई थी कि पंडितों को घाटी छोड़कर पहाड़ों में शरण लेना पड़ा था।
औरंगजेब के शासनकाल के दौरान इफ्तिखार खान 1671–1675 के बीच कश्मीर का गवर्नर था। बताया जाता है कि इफ्तिखार खान ने औरंगजेब की कट्टर नीतियों को लागू किया और जबरन इस्लाम कबूल करने के लिए मजबूर किया। इसके लिए उसने तलवार का भी इस्तेमाल किया। उसने हिन्दुओं के धार्मिक प्रतिक जैसे तिलक और जनेऊ पर पाबंदी लगा दी। कई कश्मीरी पंडित महिलाओं और लड़कियों को जबरन हरम में ले जाया गया।
इन अत्याचारों से तंग आकर पंडित कृपा राम दत्त के नेतृत्व में करीब 500 कश्मीरी पंडितों का एक दल सिख गुरु तेग बहादुर जी के पास आनंदपुर साहिब पहुँचा। उनका दुःख सुनकर तेग बहादुर को औरंगजेब पर काफी गुस्सा आया और उन्होंने मुगल सम्राट से दो-दो हाथ करने की ठानी लेकिन हिन्दुओं की रक्षा करते हुए वो वीरगति को प्राप्त हुए। दिल्ली के चांदनी चौक में उन्होंने अपना बलिदान दिया और यही कारण है कि उन्हें 'हिंद दी चादर' कहा जाता है।
1720 में एक समय ऐसा भी आया, जब मुगल साम्राज्य कमजोर हो रहा था, तभी कश्मीर में हिंसा और बढ़ने लगी। इस दौरान स्थानीय कट्टरपंथी नेता मुल्ला अब्दुल नबी ने सत्ता पर काबिज हो गया। उसने जबरन कश्मीरी हिन्दुओं से 'कर' वसूलने शुरू किये। पंडितों के जूते पहनने, पगड़ी बांधने और घोड़ों की सवारी करने पर प्रतिबंध लगा दिया गया।
मुल्ला की सोच थी कि वो ऐसा करके कश्मीरी पंडितों (Kashmiri Pandit) को मानसिक और सामाजिक रूप से तोड़ देगा। उसकी हिंसा इतनी खौफनाक थी कि शिया समुदाय के मुसलमान भी उससे ख़फ़ा होने शुरू हो गए थे। इसके बाद उसने मुसलमानों को प्रताड़ित करना शुरू किया, जिसके बाद उसके अपने ही लोगों ने नबी की हत्या कर दी।
1753–1819 के बीच कश्मीर में अफगान शासन था, जिसे इतिहास का क्रूर काल माना जाता है। अहमद शाह अब्दाली द्वारा स्थापित इस शासन के दौरान कश्मीरी पंडितों पर हुए अत्याचारों ने मानवता की सीमाएं पार कर दी थीं। कहा जाता है कि अफगान गवर्नर पंडितों को घास की बोरियों में बांधकर डल झील में डुबो देते थे। इसे "मौत का बोरा" कहा जाता था।
इसके साथ ही उनसे बिना मजदूरी के काम भी करवाया जाता था। आतंक से तंग आकर लोग अपना घर तक छोड़ने को मजबूर हो गए। इस अंधकारमय युग का अंत तब हुआ जब महाराजा रणजीत सिंह की सिख सेना ने 1819 में कश्मीर को अफगानों से मुक्त कराया।
साल 1947 में जब भारत आज़ाद हुआ, तब जम्मू कश्मीर की गुत्थी उलझ गई। यहाँ के राजा हरी सिंह (Hari Singh) इसे स्वतंत्र देश रखना चाहते थे। ना तो वो पाकिस्तान का साथ चाहते थे ना भारत का लेकिन पाकिस्तान की मंशा कश्मीर को हथियाने की थी। 22 अक्टूबर 1947 को अपनी तरफ से भेजे गए कबायली लड़ाकों ने कश्मीर में जमकर उत्पात मचाया। कई महिलाओं के साथ बर्बता की और उन्हें उठा ले गए।
हरी सिंह ये सब देखकर भारत में विलय को तैयार हुए और तब जाकर पंडित नेहरू ने भारतीय सेना को श्रीनगर पहुँचने का आदेश दिया। सेना पहुंची और कबायली लड़ाकों को खदेड़ दिया लेकिन कश्मीर का कुछ हिस्से पर पाकिस्तान का कब्ज़ा हो गया, जिसे आज POK कहा जाता है।
वहीं, इसके बाद 1989 में कश्मीरी हिन्दुओं पर जुल्म ढाए गए। टीका लाल टपलू और न्यायमूर्ति नीलकंठ गंजू जैसे प्रमुख पंडित नेताओं की हत्या कर समुदाय में दहशत फैलाई गई। कहा जाता है कि रात में मस्जिद के लाऊड स्पीकर्स से पंडितों को यह धमकी दी गई थी कि इस्लाम अपनाओं, नहीं तो मार दिए जाओगे। इस धमकी के बाद करीब 3 से 5 लाख कश्मीरी हिन्दुओं को अपना पुस्तैनी जमीन, घर और सम्पति छोड़कर जम्मू के साथ देश के कई अलग हिस्सों में शरण लेनी पड़ी।
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वर्तमान समय की बात करें तो जम्मू कश्मीर में हालात काफी हद तक सामान्य हैं। साल 2019 में जब धारा 370 हटाई, उसके बाद से यहाँ खुशहाली काफी देखी जा सकती है। जिस लाल चौक पर कभी तिरंगा नहीं दिखता था, आज वहां शान से भारतीय ध्वज लहराता है। पहलगाम आतंकी हमले जैसे अपवाद को छोड़ दें, तो जम्मू कश्मीर के हालात काफी सुधरे हैं लेकिन जिन कश्मीरी पंडितों ने घर छोड़ा था, वो अभी भी वापसी का इतंजार कर रहे हैं।