क्या आपने कभी सोचा है कि तिरूपति बालाजी मंदिर में लाखों लोग अपने सिर के बाल क्यों दान करते हैं? यहाँ हर दिन एक अनोखा दृश्य देखने को मिलता है। कहीं छोटे बच्चों का पहला मुंडन हो रहा होता है, तो कहीं बड़े-बुजुर्ग श्रद्धा से अपने बाल अर्पित करते दिखाई देते हैं। कई लोग अपनी मनोकामना पूरी होने पर यहाँ आते हैं और भगवान को धन्यवाद देने के लिए अपने बाल दान कर देते हैं। लेकिन सवाल यह है कि आखिर बाल ही क्यों? क्या यह सिर्फ एक पुरानी परंपरा है, या इसके पीछे कोई गहरी आस्था और रोचक कहानी छिपी हुई है? तो आइए इसके बारे में विस्तार से जानतें हैं।
दरअसल, यह परंपरा भगवान वेंकटेश्वर के प्रति भक्ति, विनम्रता और समर्पण का प्रतीक माना जाता है। कहा जाता है कि जब भक्त अपने बाल भगवान को अर्पित करता है, तो वह अपने अहंकार, घमंड और बुराइयों को भी उनके चरणों में समर्पित कर देता है। लेकिन इस परंपरा की शुरुआत कैसे हुई? इसके पीछे एक दिलचस्प पौराणिक कथा भी बताई जाती है, जो इस परंपरा को और भी खास बना देती है। आइए जानते हैं कि तिरुपति बालाजी मंदिर में बाल दान करने की यह अनोखी परंपरा आखिर कब और कैसे शुरू हुई।
तिरूपति बालाजी मंदिर में बालों का दान करना केवल एक धार्मिक परंपरा नहीं, बल्कि गहरी आस्था, समर्पण और त्याग का प्रतीक माना जाता है। यह परंपरा लगभग एक हजार साल से भी अधिक समय से चली आ रही है। हर साल लाखों श्रद्धालु यहाँ भगवान वेंकटेश्वर के दर्शन करने आते हैं और अपनी श्रद्धा व्यक्त करने के लिए बाल अर्पित करते हैं। इस परंपरा के पीछे एक प्रसिद्ध पौराणिक कथा भी बताई जाती है। कहा जाता है कि एक बार भगवान वेंकटेश्वर के सिर पर चोट लग गई थी, जिससे उनके कुछ बाल झड़ गए। यह देखकर नीला देवी नाम की एक देवी ने अपनी भक्ति दिखाते हुए अपने बाल काटकर भगवान को अर्पित कर दिए, ताकि उनके सिर का वह हिस्सा ढक सके। भगवान उनकी इस निस्वार्थ भक्ति से बहुत प्रसन्न हुए और उन्होंने आशीर्वाद दिया कि जो भी भक्त यहाँ आकर अपने बाल दान करेगा, उसकी मनोकामनाएँ पूरी होंगी और उसे विशेष आशीर्वाद मिलेगा। तभी से तिरुपति में बाल दान करने की परंपरा शुरू हो गई।
आज भी मंदिर परिसर में एक विशेष स्थान “कल्याण कट्टा” है, जहाँ रोज़ हजारों लोग अपने बाल मुंडवाते हैं। यहाँ छोटे बच्चों से लेकर बुजुर्गों तक, पुरुष और महिलाएँ सभी इस परंपरा को निभाते हैं। कई परिवार अपने बच्चों का पहला मुंडन संस्कार भी यहीं करवाते हैं। लोगों का मानना है कि बाल दान करने से व्यक्ति अपना अहंकार, घमंड और नकारात्मकता भगवान के चरणों में समर्पित कर देता है। बहुत से श्रद्धालु अपनी कोई बड़ी मनोकामना पूरी होने पर-जैसे नौकरी मिलना, बीमारी ठीक होना, या कोई कठिन काम सफलता मिलना-तब यहाँ आकर बाल दान करते हैं।
एक और दिलचस्प बात यह है कि मंदिर में इकट्ठा हुए इन बालों को फेंका नहीं जाता। मंदिर प्रशासन इन्हें नीलाम करता है और इन बालों से विग और कई तरह के उत्पाद बनाए जाते हैं। इससे मंदिर को हर साल सैकड़ों करोड़ रुपये की आय होती है, जिसका उपयोग मंदिर के संचालन, भक्तों की सुविधाओं और कई सामाजिक कार्यों में किया जाता है। इस तरह तिरुपति बालाजी में बाल दान केवल एक धार्मिक रस्म नहीं, बल्कि आस्था, कृतज्ञता और त्याग की एक अनोखी परंपरा है, जो सदियों से चली आ रही है और आज भी लाखों लोगों की श्रद्धा का केंद्र बनी हुई है। [SP/MK]