करोड़ों भक्तों की आस्था और गाढ़ी कमाई के प्रतीक अयोध्या के भव्य राम मंदिर में हाल ही में एक बड़ा वित्तीय घोटाला सामने आया है। जून 2026 के पहले और दूसरे हफ्ते 7 जून से 13 जून के बीच में विपक्ष और मंदिर के पूर्व एकाउंट्स ऑफिसर महिपाल सिंह (Mahipal singh) ने दानपात्र से भारी मात्रा में कैश गायब होने का भंडाफोड़ किया।
यह चोरी तब उजागर हुई जब पूर्व लेखा अधिकारी महिपाल सिंह ने मंदिर के बड़े पदाधिकारियों को दान के पैसों में हेरफेर और बैंक बंडलों में गड़बड़ी की शिकायत की, जिसके बदले उन्हें नौकरी से ही हटा दिया गया। इसके बाद यह गंभीर मामला मीडिया में आया। शुरुआती जांच में जहां 5 से 7 करोड़ रुपये गायब होने की बात कही गई थी, वहीं रिपोर्टों और विपक्ष के दावों के अनुसार ऐसा अनुमान लगाया जा रहा है की यह घोटाला 200 करोड़ रुपये तक का हो सकता है।
राम मंदिर में होने वाली ये चोरियां कोई नई बात नहीं हैं। यह मंदिर ट्रस्ट के भीतर एक गहरे और पुराने संस्थागत भ्रष्टाचार की ओर इशारा करती हैं, जिसकी जड़ें 2021 के उन विवादित जमीन सौदों तक जाती हैं जिनमें तत्कालीन बीजेपी मेयर और उनके करीबियों के खातों से पैसों के लेन-देन के आरोप लगे थे।
अयोध्या राम मंदिर में चढ़ावे की चोरी का मामला जून 2026 की शुरुआत में तब गहराया, जब पूर्व एकाउंट्स ऑफिसर महिपाल सिंह और विपक्ष ने इसका भंडाफोड़ किया। बढ़ते आक्रोश को देख उत्तर प्रदेश सरकार ने 13 जून 2026 को तीन सदस्यीय विशेष जांच टीम (SIT) का गठन किया, जिसने 15 जून 2026 से मंदिर परिसर में मैराथन जांच शुरू कर दी। सबसे चौंकाने वाला आरोप सबूतों से छेड़छाड़ का है| महिपाल सिंह के अनुसार, घोटाला छुपाने के लिए पिछले 8 महीनों का सीसीटीवी (CCTV) फुटेज तक डिलीट कर दिया गया है। शुरुआती जांच के बाद अब विपक्ष का दावा है कि यह हेराफेरी ₹200 करोड़ तक हो सकती है।
जांच में महज ₹15,000 मासिक सैलरी पाने वाले कर्मचारियों के पास से ₹12 लाख से लेकर करोड़ों की बेनामी संपत्तियां और महंगी गाड़ियां मिलने का दावा किया गया है। ट्रस्ट के सचिव चंपत राय के करीबी 'टिन्नू यादव' पर सीसीटीवी गायब करने और सोना-चांदी प्रभारी के.डी. तिवारी पर महज एक साल में ₹5 करोड़ की अवैध संपत्ति अर्जित करने के गंभीर आरोप हैं। पुलिसिया छापेमारी में अब तक करीब ₹2 से ₹3 करोड़ का कैश बरामद हो चुका है और कई संदिग्ध हिरासत में हैं।
राम मंदिर में वित्तीय अपारदर्शिता का खेल कोई नया नहीं है, बल्कि इसकी जड़ें साल 2021 के विवादित जमीन सौदों से जुड़ी हैं (The 2021 Land Controversy)। जून 2021 में आम आदमी पार्टी और समाजवादी पार्टी ने दस्तावेजों के साथ खुलासा किया था कि राम मंदिर ट्रस्ट ने अयोध्या के बाग बिजैसी में कौड़ियों के भाव की जमीन को महज कुछ मिनटों में करोड़ों में खरीदा। रिकॉर्ड के मुताबिक, 18 मार्च 2021 को शाम 7:10 बजे सुल्तान अंसारी और रवि मोहन तिवारी ने एक जमीन ₹2 करोड़ में खरीदी। ठीक पांच मिनट बाद, शाम 7:15 बजे ट्रस्ट ने इसी जमीन को उनसे ₹18.5 करोड़ में खरीद लिया। महज 5 मिनट में ₹16.5 करोड़ के इस उछाल वाले सौदे में अयोध्या के तत्कालीन बीजेपी मेयर ऋषिकेश उपाध्याय खुद गवाह थे।
घोटाले का यह जाल तब और गहरा गया जब मनी ट्रेल सीधे मेयर के परिवार से जुड़ा। बैंक दस्तावेजों से खुलासा हुआ कि मेयर के भतीजे दीपनारायण उपाध्याय ने जो जमीन महज ₹20 लाख में खरीदी थी, उसे कुछ ही महीनों बाद सीधे ₹2.5 करोड़ में राम मंदिर ट्रस्ट को बेच दिया गया। इन सौदों में मेयर के करीबियों के खातों से पैसों का सीधा ट्रांसफर हुआ था। विपक्ष ने इसे रामभक्तों के पैसे की खुली लूट और मनी लॉन्ड्रिंग बताया। हालांकि, ट्रस्ट ने इसे 'मार्केट रेट बढ़ने' का तर्क देकर रफा-दफा कर दिया और पुख्ता सबूतों के बावजूद आज तक इसकी कोई निष्पक्ष जांच नहीं हो सकी।
चाहे साल 2021 का बहुचर्चित जमीन विवाद हो या फिर जून 2026 में सामने आई दानपात्र से करोड़ों रुपये की चोरी, दोनों ही मामलों ने राम मंदिर ट्रस्ट के भीतर पारदर्शिता और जवाबदेही (Shielding the Influential & Lack of Accountability) पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। दोनों महाघोटालों में ट्रस्ट के बड़े पदाधिकारियों और सत्ताधारी दल से जुड़े शक्तिशाली राजनीतिक चेहरों के नाम सीधे तौर पर उजागर हुए हैं। समाजवादी पार्टी के प्रमुख अखिलेश यादव और आम आदमी पार्टी के सांसद संजय सिंह जैसे विपक्षी नेताओं ने जून 2026 में प्रेस कॉन्फ्रेंस कर आरोप लगाया कि करोड़ों रुपये कैश की बरामदगी और गवाहों के पुख्ता बयानों के बावजूद, मुख्य आरोपियों और मास्टरमाइंड्स के खिलाफ एफआईआर (FIR) व कानूनी कार्रवाई में जानबूझकर ढील दी जा रही है।
विपक्ष का आरोप है कि राजनीतिक रसूखदारों को सरकारी 'कवच' देकर बचाया जा रहा है। देश-विदेश के करोड़ों रामभक्तों ने अपनी गाढ़ी कमाई से मंदिर के लिए पाई-पाई दान की है, लेकिन ट्रस्ट की लचर प्रशासनिक व्यवस्था और राजनीतिक हस्तक्षेप के कारण उस पवित्र पैसे का इस्तेमाल कुछ रसूखदार अपनी निजी तिजोरियां भरने के लिए कर रहे हैं। जून 2026 के मध्य में गठित हुई एसआईटी (SIT) की जांच के बीच भी यह मांग उठ रही है कि जब तक शीर्ष स्तर पर बैठे जिम्मेदारों पर कार्रवाई नहीं होती, तब तक भक्तों की आस्था के साथ हो रहा यह खिलवाड़ नहीं रुकेगा। [SP]