हम अपनी रोजमर्रा की जिंदगी की भागदौड़ में चाहे जितने भी बिजी रहें, लेकिन कभी न कभी, किसी अपनों को खोने के बाद या फिर रात के सन्नाटे में, एक सवाल हम सबके जेहन में जरूर आता है "आखिर अंतिम सांस लेने के बाद क्या होता है? जब यह शरीर शांत हो जाता है, तो हमारा क्या होता है?" यह एक ऐसा सच और सवाल है, जिसका जवाब ढूंढने की कोशिश इंसान सदियों से कर रहा है। आप चाहे किसी भी देश के हों, किसी भी बैकग्राउंड से आते हों या किसी भी मजहब को मानते हों, इस सवाल से कोई नहीं बच सकता।
यह लेख (Article) किसी भी धर्म या आस्था को दूसरे से बेहतर या कमतर दिखाने के लिए नहीं है। यह तो बस एक छोटी सी कोशिश है, हमारे समाज के दो बड़े स्तंभों 'सनातन धर्म' और 'इस्लाम' के उस गहरे दर्शन (Philosophy) को समझने की, जो हमें मौत के बाद के सफर का एक अलग और दिलचस्प रास्ता दिखाते हैं। चलिए, इस अनकहे सफर को थोड़ा करीब से समझने की कोशिश करते हैं।
सनातन धर्म (Sanatana Dharma) में मौत को किसी सफर का अंत नहीं, बल्कि सिर्फ एक ठहराव माना गया है, ठीक वैसे ही जैसे हम पुराने कपड़े बदलकर नए कपड़े पहन लेते हैं। श्रीमद्भगवद्गीता का वो मशहूर श्लोक 'नैनं छिन्दन्ति शस्त्राणि' हमें यही सिखाता है कि यह जो हमारा शरीर है, वह तो मिट्टी का है और एक दिन मिट्टी में मिल जाएगा, लेकिन इसके भीतर रहने वाली जो आत्मा है, उसे न तो कोई हथियार काट सकता है और न ही आग जला सकती है वह अमर है।
जब इंसान अपनी अंतिम सांस लेता है, तो उसकी आत्मा (Soul) अपने साथ इस जन्म के अच्छे और बुरे कर्मों की एक अदृश्य पोटली लेकर आगे बढ़ जाती है। हमारे शास्त्र, विशेषकर गरुड़ पुराण में बताया गया है कि मृत्यु के बाद आत्मा यमलोक की यात्रा पर निकलती है, जहाँ उसे अपने कर्मों के आधार पर वैतरणी नदी जैसी कठिन चुनौतियों का सामना करना पड़ता है। यहाँ कोई पैरवी या चालाकी काम नहीं आती बल्की हमारे किए गए कर्म ही तय करते हैं कि आत्मा को इस जन्म-मरण के चक्रव्यूह से मुक्ति (मोक्ष) मिलेगी या फिर उसे किसी नए रूप में दोबारा इस दुनिया में आकर अपने कर्मों का हिसाब चुकता करना पड़ेगा। सीधे शब्दों में कहें तो, यहाँ मौत केवल चोला बदलने का नाम है, कहानी तो कर्मों के सहारे चलती रहती है।
इस्लामिक (Islamic Point Of View) नजरिए में मौत को जीवन का अंत नहीं, बल्कि एक मुसाफिर के अपने असली घर लौटने जैसा माना गया है। जैसे ही इंसान अपनी आखिरी सांस लेता है, उसकी रूह (आत्मा) इस दुनिया को छोड़कर एक नए पड़ाव में दाखिल होती है, जिसे 'बरज़ख' कहा जाता है। यह एक तरह का इंतजार (Waiting Period) है, जहाँ रूह मौत से लेकर कयामत के दिन तक रहती है। जब इंसान को कब्र में दफनाया जाता है, तो मान्यता है कि वहाँ 'मुनकर और नकीर' नाम के दो फरिश्ते आते हैं, जो उससे तीन बेहद सीधे और बुनियादी सवाल पूछते हैं "तुम्हारा रब (ईश्वर) कौन है? तुम्हारा दीन (धर्म) क्या है? और तुम्हारे पैगंबर कौन हैं?" इन सवालों के जवाब इंसान की जुबान नहीं, बल्कि दुनिया में किए गए उसके अच्छे या बुरे काम देते हैं।
जिसके कर्म अच्छे होते हैं, उसकी रूह के लिए कब्र में जन्नत की खिड़की खोल दी जाती है और वह कयामत तक सुकून से आराम करती है। इसके बाद आता है 'आख़िरत' यानी कयामत का वो आखिरी दिन, जब पूरी कायनात का हिसाब-किताब होगा। उस दिन खुदा के सामने हर इंसान के 'आमाल' (कर्मों) का तराजू तौला जाएगा और उसी अंतिम न्याय के आधार पर तय होगा कि रूह को हमेशा-हमेशा के सुकून की जगह 'जन्नत' (स्वर्ग) मिलेगी या फिर उसके बुरे कामों की वजह से 'जहन्नुम' (नरक)। यहाँ पूरा दर्शन इसी बात पर टिका है कि आज की जिंदगी कल के इम्तिहान की तैयारी है।
जब हम इन दोनों रास्तों को थोड़ा ध्यान से देखते हैं, तो समझ आता है कि भले ही मंज़िल को बयां करने के तरीके अलग हों, लेकिन इंसानी जिंदगी को बेहतर बनाने का मकसद दोनों का एक ही है।
अगर हम समानताओं (Common Grounds) की बात करें, तो सनातन धर्म और इस्लाम दोनों ही इस बात पर पूरी तरह सहमत हैं कि हमारी यह जिंदगी सिर्फ इस धरती तक या इस आखिरी सांस तक सीमित नहीं है। मौत कोई अंत नहीं, बल्कि एक नए सफर की शुरुआत है। सबसे खूबसूरत बात यह है कि दोनों ही दर्शनों में 'न्याय' (Judgement) और इंसान के 'कर्मों' (Deeds) को सबसे ऊंचा दर्जा दिया गया है। सनातन धर्म जिसे 'कर्मफल' कहता है, इस्लाम उसे 'आमाल' का नाम देता है। दोनों ही साफ शब्दों में समझाते हैं कि आप यहाँ जो बोएंगे, वही आगे चलकर काटेंगे; यहाँ की गई किसी भी भलाई या बुराई का हिसाब अधूरा नहीं छूटता।
अब आते हैं उस मोड़ पर जहाँ दोनों के रास्ते थोड़े अलग (The Differences) हो जाते हैं। सनातन धर्म वक्त को एक पहिये की तरह देखता है एक चक्र (Cyclic View), जहाँ 'पुनर्जन्म' (Reincarnation) का सिद्धांत है। यानी जब तक आत्मा के कर्मों का हिसाब पूरी तरह चुकता नहीं हो जाता और उसे मोक्ष नहीं मिलता, वह अलग-अलग योनियों में इस दुनिया में लौटती रहती है। वहीं दूसरी तरफ, इस्लाम का नजरिया एक सीधी लकीर (Linear Timeline) जैसा है। यहाँ इंसान को सिर्फ एक ही जिंदगी मिलती है, जो उसका इकलौता इम्तिहान है। मौत के बाद दोबारा इस दुनिया में लौटने का कोई रास्ता नहीं है; रूह को सीधे कयामत के उस आखिरी दिन का इंतजार करना होता है जहाँ उसका हमेशा-हमेशा के लिए अंतिम फैसला सुना दिया जाता है।
देखा जाए तो एक तरफ सुधरने के लिए बार-बार मौके मिलने की उम्मीद है, तो दूसरी तरफ इसी एक जीवन में खुद को पूरी तरह झोंक देने का अनुशासन। रास्ता चाहे चक्र का हो या सीधी लकीर का, दोनों ही हमें आज एक बेहतर इंसान बनने की सीख देते हैं।
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आखिर में बात बस इतनी सी है कि चाहे रास्ते अलग हों, चाहे शास्त्रों के पन्ने अलग-अलग जुबान में लिखे गए हों, दोनों का मूल संदेश घूम-फिरकर एक ही बात पर आकर टिकता है। हमारी इस छोटी सी जिंदगी में कमाए गए अच्छे कर्म, किसी की मदद करने में बिताए गए पल और हमारे दिल की साफगोई ही वो इकलौती पूंजी है, जो मौत के बाद हमारे साथ जाएगी। कोई भी मजहब हमें मौत से डराना नहीं चाहता, बल्कि वे तो हमें यह अहसास दिलाते हैं कि इस जिंदगी का हर एक दिन, हर एक सांस कितनी कीमती है।
इस दुनिया से जाते वक्त हमारे बैंक बैलेंस, गाड़ियां या मकान यहीं छूट जाएंगे, लेकिन जो दुआएं और अच्छी यादें हम लोगों के दिलों में छोड़ जाएंगे, वही हमारी असली विरासत होगी। इसलिए, मृत्यु के उस अनकहे सफर से घबराने या डरने के बजाय, क्यों न हम आज की इस जिंदगी को थोड़ा और बेहतर ढंग से जिएं? किसी के चेहरे पर मुस्कान लाएं, नफरत को थोड़ा कम करें और रोज़ कुछ ऐसा अच्छा करें कि जब यह सफर खत्म हो, तो हमें पीछे मुड़कर देखने पर कोई पछतावा न हो। आखिरकार, अच्छी जिंदगी ही एक अच्छे और सुकून भरे अंत की शुरुआत है।