जगन्नाथ मंदिर का इतिहास (History of Jagannath Temple) Wikimedia Commons
धर्म

क्या आज भी धड़क रहा है भगवान श्रीकृष्ण का दिल? जगन्नाथ मंदिर के 'ब्रह्म पदार्थ' का अनसुलझा रहस्य!

भगवान जगन्नाथ को श्रीकृष्ण का ही एक दिव्य रूप माना जाता है, जिन्हें उनके भाई बलभद्र और बहन सुभद्रा के साथ पूजा जाता है। ओडिशा के पुरी में स्थित जगन्नाथ मंदिर हिंदू धर्म के चार धामों में से एक है और लाखों श्रद्धालुओं की आस्था का केंद्र है।

Author : Sarita Prasad

भगवान जगन्नाथ (Lord Jagannath) को श्रीकृष्ण का ही एक दिव्य रूप माना जाता है, जिन्हें उनके भाई बलभद्र और बहन सुभद्रा (Brother Balabhadra and Sister Subhadra) के साथ पूजा जाता है। ओडिशा के पुरी (Puri In Orissa) में स्थित जगन्नाथ मंदिर हिंदू धर्म के चार धामों में से एक है और लाखों श्रद्धालुओं की आस्था का केंद्र है। यहाँ की परंपराएं, रथ यात्रा और अनोखी लकड़ी की मूर्तियां सदियों से लोगों को आकर्षित करती रही हैं। लेकिन इस मंदिर से जुड़ा एक रहस्य आज भी लोगों को हैरान करता है, क्या सच में भगवान जगन्नाथ की मूर्तियों के भीतर श्रीकृष्ण का दिल आज भी धड़कता है? मान्यता है कि “ब्रह्म पदार्थ” नामक एक दिव्य तत्व मूर्तियों के अंदर स्थापित होता है, जिसे श्रीकृष्ण के हृदय से जोड़ा जाता है। यह रहस्य आस्था और जिज्ञासा का अनोखा संगम है।

भगवान जगन्नाथ मंदिर का इतिहास

जगन्नाथ मंदिर का इतिहास (History of Jagannath Temple) आस्था, परंपरा और रहस्य से भरा हुआ है। माना जाता है कि इस भव्य मंदिर का निर्माण 12वीं शताब्दी में राजा अनंतवर्मन चोडगंग देव (Ananthavarman Chodagung Dev) द्वारा कराया गया था। हालांकि इससे पहले भी इस स्थान पर भगवान जगन्नाथ की पूजा होने के संकेत प्राचीन ग्रंथों में मिलते हैं, जिससे इसकी प्राचीनता और भी बढ़ जाती है।

भगवान जगन्नाथ (Lord Jagannath)

धार्मिक दृष्टि से यह मंदिर अत्यंत महत्वपूर्ण है, क्योंकि यहाँ भगवान जगन्नाथ, बलभद्र और सुभद्रा की पूजा की जाती है। हर वर्ष होने वाली प्रसिद्ध रथ यात्रा न केवल भारत, बल्कि दुनियाभर के श्रद्धालुओं को आकर्षित करती है। यह मंदिर ओडिशा की संस्कृति, कला और परंपराओं का जीवंत प्रतीक भी है, जहाँ लोक परंपराएं और धार्मिक आस्था एक साथ दिखाई देती हैं। हिंदू धर्म (Hindu Religion) की चार धाम यात्रा में इस मंदिर का विशेष स्थान है। पुरी को पूर्व दिशा का धाम माना जाता है, जबकि बद्रीनाथ, द्वारका और रामेश्वरम अन्य तीन धाम हैं। मान्यता है कि इन चारों धामों के दर्शन करने से मोक्ष की प्राप्ति होती है।

क्या है मूर्तियों की खासियत

भगवान जगन्नाथ (Lord Jagannath) की मूर्तियां अपनी अनोखी बनावट और रहस्यमयी परंपराओं के कारण पूरे विश्व में प्रसिद्ध हैं। सबसे खास बात यह है कि जगन्नाथ मंदिर (Jagannath Temple) में स्थापित ये मूर्तियां पत्थर या धातु की नहीं, बल्कि विशेष प्रकार की नीम (दारु) लकड़ी से बनाई जाती हैं। यह परंपरा सदियों से चली आ रही है और हर मूर्ति को धार्मिक नियमों के अनुसार तैयार किया जाता है। इन मूर्तियों की आकृति भी बेहद अलग है, क्योंकि इनमें हाथ-पैर पूर्ण रूप से नहीं बने होते। इसके पीछे कई धार्मिक मान्यताएं हैं कुछ लोग इसे भगवान के अनंत और निराकार रूप का प्रतीक मानते हैं, तो कुछ इसे अधूरी मानव समझ से जोड़कर देखते हैं। यही कारण है कि ये मूर्तियां अन्य मंदिरों से बिल्कुल अलग दिखाई देती हैं।

जगन्नाथ मंदिर (Jagannath Temple)

इन मूर्तियों से जुड़ी सबसे रहस्यमयी प्रक्रिया है “नवकलेवर” (“Navakalever”), जो लगभग हर 12 से 19 वर्षों में होती है। इस दौरान पुरानी मूर्तियों को बदलकर नई मूर्तियां बनाई जाती हैं और एक गुप्त विधि से उनमें “ब्रह्म तत्व” (“Brahma Tatva”) स्थापित किया जाता है। यह प्रक्रिया पूरी तरह गोपनीय होती है और इसे देखने की अनुमति किसी को नहीं होती।

‘ब्रह्म पदार्थ’ का रहस्य

ब्रह्म पदार्थ (Brahma Substance) को जगन्नाथ मंदिर का सबसे रहस्यमयी तत्व माना जाता है। मान्यता है कि “नवकलेवर” (“Navakalever”) के समय, जब नई मूर्तियां बनाई जाती हैं, तब पुरानी मूर्तियों से इस दिव्य तत्व को निकालकर नई मूर्तियों के भीतर स्थापित किया जाता है। इस प्रक्रिया को बेहद पवित्र और गुप्त रखा जाता है। कहा जाता है कि यह ब्रह्म पदार्थ ही भगवान की वास्तविक शक्ति का प्रतीक है। कई श्रद्धालु इसे श्रीकृष्ण के हृदय से जोड़कर देखते हैं और मानते हैं कि यही कारण है कि भगवान जगन्नाथ की मूर्तियों में दिव्यता और “जीवंतता” बनी रहती है।

ब्रह्म पदार्थ (Brahma Substance)

हालांकि इस रहस्य का कोई स्पष्ट वैज्ञानिक प्रमाण नहीं है, फिर भी यह आस्था का एक गहरा विषय है। इस प्रक्रिया की सबसे खास बात इसकी गोपनीयता है। नवकलेवर के दौरान मंदिर के दरवाजे बंद कर दिए जाते हैं, और केवल चुनिंदा पुजारी ही इस अनुष्ठान को अंधेरे में पूरा करते हैं। कहा जाता है कि जो पुजारी यह कार्य करते हैं, वे भी आंखों पर पट्टी बांधकर इसे संपन्न करते हैं, ताकि इस रहस्य की पवित्रता बनी रहे।

क्या सच में धड़कता है दिल?

क्या सच में भगवान जगन्नाथ की मूर्तियों में दिल धड़कता है? यह सवाल सदियों से लोगों के मन में जिज्ञासा पैदा करता है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, जगन्नाथ मंदिर में स्थापित “ब्रह्म तत्व” को श्रीकृष्ण के हृदय से जोड़ा जाता है, इसलिए कई श्रद्धालु मानते हैं कि भगवान आज भी जीवंत रूप में मौजूद हैं। वहीं, वैज्ञानिक दृष्टिकोण से देखा जाए तो मूर्तियों के अंदर किसी वास्तविक दिल के धड़कने का कोई प्रमाण नहीं मिला है। विशेषज्ञ इसे आस्था और परंपरा से जुड़ी मान्यता मानते हैं, न कि भौतिक सत्य।

यही कारण है कि यह विषय आस्था और विज्ञान के बीच संतुलन का उदाहरण बन जाता है। जहाँ एक ओर श्रद्धालु इसे चमत्कार और विश्वास का प्रतीक मानते हैं, वहीं दूसरी ओर विज्ञान इसे प्रतीकात्मक रूप में देखता है। [SP]