हिंदू धर्म (Hindu Religion) में अंतिम संस्कार (Funeral Rites)  X
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क्या बच्चों और साधुओं को जलाना पाप है? जानिए गरुड़ पुराण में छिपे दफनाने के वो नियम

हिंदू धर्म में अंतिम संस्कार की परंपरा आमतौर पर दाह संस्कार यानी शरीर को अग्नि को समर्पित करने की होती है।

Author : Sarita Prasad

हिंदू धर्म (Hindu Religion) में अंतिम संस्कार (Funeral Rites) की परंपरा आमतौर पर दाह संस्कार यानी शरीर को अग्नि को समर्पित करने की होती है। लेकिन क्या आप जानते हैं कि कुछ विशेष परिस्थितियों में लोगों को जलाने की बजाय दफनाया भी जाता है? यह सुनकर कई लोगों को आश्चर्य होता है, क्योंकि आम धारणा यही है कि हर हिंदू का अंतिम संस्कार अग्नि से ही होता है।

दरअसल, इसके पीछे गहरे धार्मिक, आध्यात्मिक और सामाजिक कारण छिपे होते हैं। कुछ वर्गों, संतों या खास स्थितियों में मृत्यु होने पर दफनाने की परंपरा अपनाई जाती है, जो हिंदू धर्म की विविधता और लचीलापन को दर्शाती है। आखिर किन लोगों को दफनाया जाता है और इसके पीछे क्या मान्यताएं हैं इसी दिलचस्प विषय को हम इस लेख में विस्तार से समझेंगे।

जलाने के बजाय दफनाने का रहस्य

सनातन धर्म (Sanatan Dharma) में सामान्य रूप से दाह संस्कार की परंपरा है, लेकिन कुछ विशेष परिस्थितियों में कुछ लोगों को अग्नि को समर्पित करने के बजाय भूमि में समाधि दी जाती है। इनमें छोटे बच्चे, साधु-संत और गर्भवती महिलाएं शामिल होती हैं। इन सभी के लिए यह परंपरा अलग-अलग धार्मिक और आध्यात्मिक कारणों से जुड़ी हुई है। आइए अब विस्तार से समझते हैं कि किन वजहों से इनका अंतिम संस्कार (Funeral Rites) दफनाकर किया जाता है।

सनातन परंपरा (Sanatan Dharma)

बच्चों को दफनाने का कारण

सनातन परंपरा (Sanatan Dharma) में छोटे बच्चों को निष्कलंक और पूरी तरह पवित्र माना जाता है। कहा जाता है कि वे अभी कर्मों के बंधन में पूरी तरह नहीं बंधे होते, इसलिए उन्हें “मोक्ष के करीब” (“Close to salvation”) माना जाता है। इसी वजह से उनका दाह संस्कार करने के बजाय उन्हें धरती में सुला दिया जाता है। कई जगहों पर यह भी मान्यता है कि बच्चे सीधे भगवान के पास चले जाते हैं, इसलिए उनके अंतिम संस्कार में शोक से ज्यादा शांति और प्रार्थना का भाव रखा जाता है।

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साधु-संतों को दफनाने का कारण

साधु-संतों के लिए “समाधि” की परंपरा बहुत खास मानी जाती है। मान्यता है कि उन्होंने अपने जीवन में तप और योग के माध्यम से शरीर से ऊपर उठकर आत्मा की अवस्था को प्राप्त कर लिया होता है। इसलिए उनके शरीर को जलाने की बजाय ध्यान मुद्रा में बैठाकर या विशेष विधि से दफनाया जाता है। कई संतों की समाधि स्थल बाद में मंदिर या तीर्थ बन जाते हैं, जहां लोग आशीर्वाद लेने जाते हैं। यह परंपरा उनके आध्यात्मिक स्तर और सम्मान को दर्शाती है।

गर्भवती महिलाओं को दफनाने का कारण

गर्भवती महिला का मामला बेहद संवेदनशील माना जाता है, क्योंकि उसके साथ एक और जीवन जुड़ा होता है। कुछ परंपराओं में यह माना जाता है कि ऐसे समय में मृत्यु होने पर दाह संस्कार की जगह दफनाना अधिक उचित और करुणामय होता है। यह मां और गर्भ में पल रहे शिशु दोनों के प्रति सम्मान प्रकट करने का तरीका माना जाता है। साथ ही, यह भी विश्वास है कि इससे दोनों आत्माओं को शांति और संतुलन मिलता है, इसलिए इस विधि को अपनाया जाता है। [SP]