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धार्मिक व्यवस्था में गड़बड़ी! बांके बिहारी मंदिर की सदियों पुरानी परंपरा टूटी, इतिहास में पहली बार हुई ये चूक

वृंदावन के बांके बिहारी मंदिर में सोमवार को ऐसा कुछ देखा गया, जिसने भक्त समेत मंदिर प्रशासन को भी हैरत में डाल दिया। सदियों से चली आ रही मंदिर की परंपरा टूट गई।

Author : न्यूज़ग्राम डेस्क
Reviewed By : Priyanka Singh

Summary

15 दिसंबर को बांके बिहारी मंदिर में पहली बार तय समय पर बाल भोग नहीं लग सका, सदियों पुरानी परंपरा टूटी।

भोग में देरी को लेकर मंदिर प्रबंधन पर सवाल, सेवायत पुजारी नाराज़, तनाव और बढ़ा।

बाल स्वरूप पूजा और झांकी दर्शन के लिए प्रसिद्ध मंदिर में हुई चूक से भक्तों की भावनाएँ आहत।

फिल्म गंगाजल का एक प्रसिद्ध डायलॉग है, जिसका मीम (MEME) भी काफी बनता है, और वो कुछ इस प्रकार है, 'भारी मिस्टेक हो गया सर...,' वो कहते हैं ना कि धर्म की बुनियाद सदियों से परंपराओं पर टिकी होती है लेकिन जब वही परंपरा लड़खड़ा जाए, तो आस्था भी सवाल करने लगती है। ऐसा ही एक वाकया हुआ है, वृंदावन के बांके बिहारी मंदिर में, जिसने भक्तों को चौंका दिया है।

हुआ कुछ यूँ है कि वृंदावन के बांके बिहारी मंदिर (Banke Bihari Mandir) में सोमवार को ऐसा कुछ देखा गया, जिसने भक्त समेत मंदिर प्रशासन को भी हैरत में डाल दिया। सदियों से चली आ रही मंदिर की परंपरा टूट गई। जैसे ही ये परंपरा टूटी, वैसे ही मंदिर के भीतर नाराजगी के साथ चिंता का माहौल भी पैदा हो गया। क्या है पूरा मामला? आइये समझते हैं।

बांके बिहारी मंदिर की परंपरा टूटी

दरअसल, परंपरा ये है कि वृंदावन के बांके बिहारी मंदिर (Banke Bihari Mandir) में बाल भोग हमेशा निर्धारित समय पर ही अर्पित किया जाता है लेकिन 15 दिसंबर को ये प्रथा टूट गई। मंदिर में ठाकुर जी की सेवा बाल स्वरुप में होती है, और इसके बाद ही दिन के कई पहर भोग अर्पित होते हैं। इसमें बाल योग का काफी विशेष महत्व है।

सैकड़ों साल से ये प्रथा बिना किसी रुकावट के चल रही थी लेकिन सोमवार को ऐसा लगा मानों समय रुक सा गया हो। सोमवार की सुबह ठाकुर जी को समय पर बाल भोग नहीं मिला, जिसके बाद वहां के पुजारियों और भक्तों के बीच असंतोष का माहौल देखा गया।

आखिर क्यों टूटी ये परंपरा?

अब सवाल ये उठता है कि आखिर सदियों से चली आ रही ये परंपरा टूट कैसे गई? जब इसकी वजह को तलाशना शुरू किया गया, तो पहले ये पता चला कि जो मंदिर के रसोइये हैं, वो समय पर बाल भोग बनाने के लिए मौजूद ही नहीं थे। जब ये चर्चा तेज हुई, तो मंदिर की हाई पावर्ड मैनेजमेंट कमेटी पर सवाल भी खड़े हुए। हालांकि, सच एक ऐसा हथियार है, जिसे दबाया नहीं जा सकता और इसे सामने आना ही था।

जब इसके पीछे का कारण समझने की कोशिश की गई, तो मंदिर के हलवाई ठेकेदार मयंक अग्रवाल सामने आए और उन्होंने पूरी बात बताई। उन्होंने बताया कि जो मुख्य कारीगर ठाकुर जी के भोग का प्रसाद तैयार करता था, उसकी पत्नी की तबियत अचानक ख़राब हो गई। जैसे ही उसे ये जानकारी मिली, वो तुरंत अपने घर लौट गया। पत्नी को डॉक्टर के पास लेकर गया और फिर भोग तैयार करने वापस लौटा। यही कारण है कि बाल भोग के तैयार होने में देरी हो गई।

फर्जी खबरों को अग्रवाल ने किया ख़ारिज

दरअसल, कई मीडिया रिपोर्ट्स में ये दावा किया जा रहा था कि कारीगरों को समय पर वेतन नहीं मिलता है, जिसके कारण उन्होंने भोग तैयार ही नहीं किया। हालांकि, मयंक अग्रवाल ने इन रिपोर्ट्स को पूरी तरह से ख़ारिज करते हुए निराधार बताया है। उनका कहना है कि ये सब एक पारिवारिक आपात स्तिथि के कारण हुआ है ना कि मंदिर प्रशासन की लापरवाही और वेतन से जुड़ी चीजों के कारण।

गुस्से में हैं मंदिर के पुजारी

गौरतलब है कि प्रशासन की तरफ से इसको लेकर सफाई दे दी गई है, लेकिन मंदिर के सेवायत पुजारी अभी भी गुस्से में हैं। उनके मुताबिक ये जो कुछ भी हुआ है, मंदिर के लिए बहुत ही ज्यादा दुर्भाग्यपूर्ण है। सेवायतों का कहना है कि समय पर भगवान का बाल भोग ना होना दुखद है। भगवान को भूखा रखा गया, इससे बड़ा अपमान कुछ नहीं हो सकता है।

पुजारियों का आरोप है कि वर्तमान समय में मंदिर का जो मैनेजमेंट है, वो पूरी तरह से असफल साबित हो रहा है। हर उम्मीद पर ये खड़ा नहीं उतर रहा है। साथ ही उन्होंने ये भी बताया कि मंदिर के जितने भी छोटे या बड़े फैसले लिए जाते हैं, उसमें पुजारियों को शामिल नहीं किया जाता है। कमेटी अपने हिसाब से सारे फैसले लेती है और परंपराओं के साथ भक्तों के भावनाओं को भी नज़रअंदाज किया जाता है।

बता दें कि मंदिर प्रशासन और सेवायतों के बीच ये तनाव पहले से ही चल रहा था लेकिन इस घटना ने और भी ज्यादा गहरा कर दिया है। सेवायतों का कहना है कि मंदिर की सदियों पुरानी परंपरा को बरकरार रखना प्रशासन की जिम्मेदारी है लेकिन अगर आगे सुधार नहीं हुआ, तो आने वाले समय में फिर ऐसा ही हो जाएगा। वहीं, भक्त भी इस घटना से काफी नाराज़ हैं।

क्यों इतना प्रसिद्ध है बांके बिहारी मंदिर?

अब आपको थोड़ा बांके बिहारी मंदिर (Banke Bihari Mandir) का इतिहास समझाते हैं। कहा जाता है कि स्वामी हरिदास जी ने इस मंदिर की स्थापना की थी। हरिदास जी को तानसेन का गुरु माना जाता है। ऐसी मान्यता है कि एक बार स्वामी हरिदास जी ने श्रीकृष्ण की तपस्या की। इस तपस्या से प्रसन्न होकर श्रीकृष्ण स्वयं राधा जी के साथ प्रकट हुए और इसके बाद ही यहाँ मंदिर की स्थापना हुई।

इस मंदिर की सबसे खास बात ये है कि यहाँ भगवान श्री कृष्ण को राजा की तरह नहीं, बल्कि उनके बाल स्वरूप की पूजा होती है। यहाँ आरती नहीं होती, बस झांकी दर्शन होती है। मान्यताओं के अनुसार ये कहा जाता है कि भगवान बांके बिहारी (Banke Bihari Mandir) इतने सजीव हैं कि अगर पर्दा नहीं हटा, तो वो भक्तों के साथ चले जाएंगे। यही कारण है कि दर्शन के लिए बार-बार पर्दा हटाया जाता है।

साथ ही आपको यहाँ एक और अलग परंपरा देखने को मिलेगी। यहाँ ना तो मंगल आरती होती है और ना ही शंख और घंटे बजाए जाते हैं। माना जाता है कि भगवान यहाँ सेवक नहीं बल्कि परिवार के सदस्य हैं। यही खास चीजें इस मंदिर को भक्तों के लिए विशेष बनाता है।

(RH/ MK)