पश्चिम बंगाल सहित देश के पांच राज्यों के चुनावी नतीजों ने सबको चौंका दिया है। भारतीय जनता पार्टी ने असम और पश्चिम बंगाल में पूर्ण बहुमत का आंकड़ा पार कर लिया है। पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने BJP पर यह आरोप लगाया है कि चुनाव आयोग और केंद्रीय सशस्त्र बलों की मदद से चुनाव में धांधली की गई है। इन राज्यों के चुनावी नतीजों से भारत में चुनावी राजनीति का मानचित्र बदल गया है। देश के भीतर लगभग 21 राज्यों में भाजपा और उसके गठबंधन की सरकार है। आइए समझते हैं कि शासन के संघात्मक स्वरूप पर इसका कैसा असर पड़ सकता है।
दरअसल, भारतीय संविधान बनने के बाद काफी समय तक इस बात पर बहस होती रही कि संविधान संघात्मक शासन व्यवस्था की बात करता है या एकात्मक शासन व्यवस्था की वकालत करता है। के.सी. व्हीयर ने भारतीय संविधान के संदर्भ में कहा था कि "भारत का संविधान अर्द्ध-संघात्मक है।" असल में भारतीय संविधान को बारीकी से देखा जाए तो यही समझ आता है कि इसमें दोनों विशेषताएँ विद्यमान हैं। आज भारतीय जनता पार्टी की सरकार आधे से अधिक राज्यों में बन चुकी है और क्षेत्रीय पार्टियों की अस्मिता पर खतरा मंडरा रहा है। ऐसे में संघवाद की प्रासंगिकता को लेकर बहस तेज हो गई है।
जब एक संघीय शासन व्यवस्था की बात होती है, तो राज्य और केंद्र की शक्तियों का स्पष्ट बंटवारा सबसे महत्वपूर्ण बिंदु के रूप में सामने आता है। भारत में संघीय व्यवस्था को बनाए रखने के लिए क्षेत्रीय दलों की भूमिका महत्वपूर्ण होती है, लेकिन जब एक ही पार्टी की सरकार अधिकतम राज्यों में बन जाती है, तो इसका नकारात्मक प्रभाव भी पड़ता है।
किसी भी राज्य में जब क्षेत्रीय दल की सरकार होती है, तो वह खुलकर राज्य के हितों के लिए केंद्र सरकार से मांग करती है। केंद्र और राज्यों के बीच कभी-कभी टकराहट भी देखने को मिलती है, जो स्वस्थ लोकतंत्र की निशानी मानी जाती है। इसके विपरीत, जब राष्ट्रीय दलों की सरकार राज्यों में बनती है, तो राष्ट्रीय दलों के क्षेत्रीय नेता केंद्र के साथ समझौतावादी दृष्टिकोण अख्तियार करते हैं, जिससे राज्यों के हितों पर नकारात्मक प्रभाव पड़ता है।
जब एक ही पार्टी की सरकार सभी राज्यों में बन जाती है, तो सरकार के कामकाज में तानाशाही नजर आने लगती है। भारत के संदर्भ में बात करें तो बीजेपी जिस तरीके से सभी राज्यों में सरकार बनाती जा रही है, एक समय बाद वह लोकतंत्र के लिए एक चुनौती भी बन सकता है। पिछले कुछ समय से यही देखा जा रहा है कि केंद्र सरकार का हस्तक्षेप राज्य सूची के विषयों में लगातार बढ़ता जा रहा है। वहीं, लोकसभा और राज्यसभा में बहुमत से बहुत ज्यादा सीटें जीतने पर भी सरकार तानाशाही का स्वरूप धारण कर लेती है। 2014 के बाद से भाजपा पर ये आरोप गहराता जा रहा है कि भाजपा केन्द्रीय और संवैधानिक संस्थाओं पर कब्जा करना चाहती है और संवैधानिक मूल्यों को खत्म करने का प्रयास किया जा रहा है।
भारत के संदर्भ में यह बात हमेशा कही जाती है कि 'विविधता में एकता' ही भारत की पहचान है। संविधान में भी भारतीय विविधता पर प्रकाश डाला गया है और उसे बरकरार रखते हुए भारत की एकता और अखंडता को बनाए रखने की बात कही गई है। समय-समय पर क्षेत्रीय पार्टियों का उदय क्षेत्रीय अस्मिता के नाम पर होता रहता है। राष्ट्रीय पार्टियों के भीतर राष्ट्रीय और अंतर्राष्ट्रीय मुद्दों पर विमर्श बहुत ज्यादा होता है, जिसकी वजह से क्षेत्रीय मुद्दों पर चर्चा बहुत कम हो पाती है। क्षेत्रीय मुद्दों पर सबसे तीखी और वृहद चर्चा क्षेत्रीय पार्टियों में ही देखी जाती रही है। यही कारण रहा है कि दक्षिण भारत की राजनीति में एक समय के बाद राष्ट्रीय दलों की भूमिका सीमित होती चली गई।
साल 1969 में इंदिरा गांधी के समय कांग्रेस को 9 राज्यों के चुनाव में करारी हार का सामना करना पड़ा था। इसके बाद से ही भारतीय राजनीति में संघवाद की प्रासंगिकता बढ़ती चली गई, क्योंकि राज्यों ने अपनी अलग पहचान और शक्ति का प्रदर्शन करना शुरू किया। अब अगर फिर से एक ही पार्टी की सरकार या उसके नेतृत्व में सभी राज्यों में सरकार बनती है, तो तानाशाही प्रवृत्ति की वजह से भारत की विविधता और उसके संघीय ढांचे पर नकारात्मक प्रभाव पड़ सकता है।
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