विपक्ष ने लोकसभा स्पीकर ओम बिड़ला के खिलाफ अविश्वास प्रस्ताव लाने की बात कही है, उन पर संसद में पक्षपातपूर्ण रवैया अपनाने का आरोप लगाया गया है।
संविधान के अनुच्छेद 94 के तहत स्पीकर को हटाने के लिए 14 दिन पहले नोटिस, कम से कम 50 सांसदों का समर्थन और सदन में बहुमत से प्रस्ताव पारित होना जरूरी है।
मौजूदा आंकड़ों के अनुसार एनडीए के पास 293 सांसदों का समर्थन है, जबकि विपक्ष के पास 238 सांसद हैं, इसलिए प्रस्ताव के पास होने की संभावना कम दिख रही है।
संसद के बजट सत्र का दूसरा भाग सोमवार से शुरू हो गया। इस दौरान विपक्ष ने चर्चा की शुरुआत लोकसभा स्पीकर (Loksabha Speaker) ओम बिड़ला (Om Birla) के खिलाफ अविश्वास प्रस्ताव लाने की बात से की। इस बात की पुष्टि संसदीय मामलों के मंत्री किरेन रिजिजू ने भी कर दी है। ओम बिड़ला पर विपक्ष ने यह आरोप लगाया है कि वो संसद में निष्पक्ष रवैया नहीं रखते हैं। उनका बर्ताव पक्षपात वाला है।
कांग्रेस की नेतृत्व वाली विपक्ष का कहना है कि वो सत्ताधारी दल का पक्ष लेते हैं। यही कारण है कि ओम बिड़ला (Om Birla) इस समय चर्चा का विषय बने हुए हैं। ऐसे में आइये समझते हैं कि लोकसभा स्पीकर को पद से हटाने का प्रोसेस क्या है और क्या विपक्ष का यह अविश्वास प्रस्ताव पास हो भी पाएगा या नहीं।
लोकसभा स्पीकर (Loksabha Speaker) को अगर पद से हटाना है, तो संविधान में इसके लिए एक प्रावधान है। संविधान के अनुच्छेद 94-C के तहत स्पीकर को पद से हटाने के लिए विपक्ष अविश्वास प्रस्ताव ला सकता है। इसमें यह जिक्र है कि लोकसभा स्पीकर को केवल सदन में पारित विशेष प्रस्ताव से हटाया जा सकता है लेकिन इसके लिए कुछ नियम और शर्ते हैं। अगर स्पीकर के खिलाफ सदन में प्रस्ताव लाना है, तो इसकी सूचना 14 दिन पहले देनी होगी।
इस प्रस्ताव पर तभी अमल किया जाएगा जब लोकसभा के कम से कम 50 सदस्य इसके सपोर्ट में हो। साथ ही 14 दिन पहले दी जाने वाली नोटिस में 50 सदस्यों के हस्ताक्षर अनिवार्य हैं। इतना सब होने के बाद स्पीकर यह तय करते हैं कि किस दिन इसपर चर्चा होगी लेकिन ये 10 दिन से ज्यादा नहीं होना चाहिए। फिर तय तारीख को वोटिंग होगी और विपक्ष को बहुमत मिलता है, तो स्पीकर को अपना पद छोड़ना होगा।
एक वाजिब सवाल यह भी है कि क्या लोकसभा के स्पीकर (Loksabha Speaker) जिन्हें पद से हटाने का प्रस्ताव लाया जा रहा है, वो इसकी अध्य्क्षता कर सकते हैं? इसका जवाब है नहीं, जब यह चर्चा चल रही होगी, तब स्पीकर उसकी अध्यक्षता नहीं करते। इस दौरान डिप्टी स्पीकर सदन की कार्यवाही चलाते हैं।
अगर प्रस्ताव पारित हो जाए, तो स्पीकर पद से हट सकते हैं लेकिन वो सांसद बने रहेंगे। इसके बाद लोकसभा का नया स्पीकर (Loksabha Speaker) चुना जाता है। वहीं, भारत के इतिहास पर नज़र डालें तो अब तक 3 बार ऐसा हुआ जब स्पीकर के खिलाफ अविश्वास प्रस्ताव लाया गया है लेकिन अब तक कोई भी अध्यक्ष इस प्रक्रिया से हटाया नहीं गया है।
जी. वी. मावलंकर (1954): 18 दिसंबर 1954 को जी. वी. मावलंकर के खिलाफ सदन में प्रस्ताव आया था। मावलंकर आज़ाद भारत के पहले स्पीकर थे। विपक्ष ने उनपर पक्षपाती होने और स्थगन प्रस्तावों को ठीक से न संभालने का आरोप लगाया था। बाद में प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू ने उनका बचाव किया और सदन ने यह प्रस्ताव खारिज भी हो गया था।
हुकम सिंह (1966): 1954 के बाद 1966 में सरदार हुकम सिंह के खिलाफ ऐसा नोटिस आया था लेकिन इसपर चर्चा ही नहीं हो पाई क्योंकि सदन में 50 सदस्यों का इसे समर्थन ही नहीं मिला।
बलराम जाखड़ (1987): स्पीकर के खिलाफ तीसरी बार अविश्वास प्रस्ताव 15 अप्रैल 1987 को आया था जब बलराम जाखड़ लोकसभा के स्पीकर थे। माकपा (CPI-M) के नेता सोमनाथ चटर्जी यह प्रस्ताव लेकर आए थे। इसपर लंबी बहस भी हुई लेकिन स्पीकर को पद से हटाने की वोटिंग में बहुमत नहीं मिला।
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आंकड़ों पर गौर करें तो लोकसभा स्पीकर (Loksabha Speaker) को पद से हटाने के लिए 272 सांसदों की आवश्यकता होगी, जो विपक्ष के पास होता दिखाई नहीं दे रहा है। वर्तमान में एनडीए के पास 293 सांसदों का समर्थन प्राप्त है, जिनमें से 240 बीजेपी, 16 जेडीयू, 12 टीडीपी से और अन्य दल से हैं जबकि विपक्ष के पास केवल 238 सांसद हैं, जिनमें से 99 कांग्रेस से, 37 सपा से, DMK 22, शिवसेना (UBT) 9, राष्ट्रीय जनता दल (RJD) 4, TMC के 28 और अन्य दल INDIA गठबंधन में हैं। वहीं, कांग्रेस के नेतृत्व में 118 सांसदों ने चर्चा के प्रस्ताव पर हस्ताक्षर किए हैं। ऐसे में फिलहाल विपक्ष के पास बहुमत का आंकड़ा नज़र नहीं आ रहा है।