जानें कौन थे पद्मश्री मोहम्मद शरीफ?  X
न्यूज़ग्राम विशेष

दंगे में बेटा खोया, पर पेश की इंसानियत की मिसाल, जानें कौन थे 25 हजार लावारिस शवों के मसीहा पद्मश्री मोहम्मद शरीफ?

अयोध्या के मोहम्मद शरीफ जिन्हें लोग 'शरीफ चचा' के नाम से जानते थे। कहा जाता है कि उनका जन्म साल 1933 में हुआ था।

Author : Mayank Kumar
Reviewed By : Ritik Singh

  • 25 हजार लावारिस शवों को दिया सम्मान

  • बेटा खोने के बाद इंसानियत की मिसाल बने

  • पद्मश्री से सम्मानित, विरासत आज भी ज़िंदा

कहते हैं दुनिया में आपको इंसानियत की खूबसूरती देखनी है, तो भारत में समय बिताइए। ये ऐसा देश है, जो यहाँ आया, यही का होकर रह गया। आप मुगलों का, पारसियों का, पुर्तगालियों का...यहाँ तक की अंग्रेजों का भी उदहारण ले सकते हैं। वो अंग्रेज जिन्होंने भारत पर 200 सालों तक हुकूमत की और आज उनके वंसज भी आपको यहाँ देखने को मिल जाएंगे। इन्हें हम एंग्लो-इंडियन (Anglo-Indian) समुदाय के नाम से जानते हैं।

भारत विविधताओं का देश है। यहाँ हर 50 किलोमीटर पर भाषा। वेशभूषा, खानपान के साथ धर्म तक बदल जाता है। वो अलग बात है कि इसको लेकर काफी नोकझोंक होती रहती है लेकिन कहते हैं ना कि रसोईघर में बर्तन होंगे, तो आवाज आएगी ही लेकिन इसका मतलब ये नहीं कि आप खाना बनाना बंद कर देंगे। हमारे देश में हिंदू-मुसलमान के बीच काफी लड़ाइयां भी होती हैं लेकिन इन लड़ाइयों के बीच खूबसूरती ढूंढने जाएं, तो आपको बहुत मिलेंगे।

हाल ही में 23 जनवरी 2026 को देश में वसंत पंचमी मनाई गई। आम तौर पर ये हिन्दुओं का त्यौहार है लेकिन दिल्ली के हज़रत निजामुद्दीन दरगाह पर 'सूफी बसंत' के रूप में एक विशेष और ऐतिहासिक परंपरा मनाया गया। ये 700 साल पुरानी परंपरा है। इसमें आपको हिंदू-मुसलमान दोनों दिख जाएंगे, जहाँ एक दूसरे का काफी सम्मान दिखेगा।

हिंदू-मुसलमान की एकता का कुछ ऐसा ही उदहारण अयोध्या के मोहम्मद शरीफ (Mohammed Sharif) ने पेश किया, जिसकी आज भी चर्चा होती है। तो आइये समझते हैं पूरा मामला।

कौन हैं मोहम्मद शरीफ?

अयोध्या के मोहम्मद शरीफ (Mohammed Sharif) जिन्हें लोग 'शरीफ चचा' के नाम से जानते थे। कहा जाता है कि उनका जन्म साल 1933 में हुआ था। वो अयोध्या (उत्तर प्रदेश) के मोहल्ला खिड़की अली बेग के रहने वाले थे। शरीफ चचा पेशे से एक साइकिल मैकेनिक थे। हालांकि, उनके जीवन में एक ऐसी घटना घटी, जिसके बाद वो हिंदू-मुसलमान की एकता का प्रतिक बन गए लेकिन ये कहानी काफी दुखद भी है।

बात साल 1992-93 के दंगों की है जब उनके बड़े बेटे, रईस की हत्या हो गई थी। रईस की हत्या कर उसकी लाश को लावारिस हालत में रेलवे ट्रैक पर फेंक दिया गया था। बाद में लाश को लावारिस समझकर नदी में प्रवाह कर दिया गया। उन्हें अपने बेटे का अंतिम संस्कार करने तक का मौका नहीं मिला। इस दुःख ने उन्हें भीतर से इतना झकझोर दिया कि 'शरीफ चचा' ने कसम खाई कि वो किसी भी लाश को लावारिस नहीं रहने देंगे।

अयोध्या और फैजाबाद में कोई भी लावारिस लाश हो, फिर चाहे वो हिंदू का हो या मुसलमान का, सबका अंतिम संस्कार रीति रिवाज से करेंगे। कहते हैं कि उन्होंने करीब 25000 से ज्यादा लावारिस लाशों का अंतिम संस्कार करवाया। वो इस कार्य को 28 वर्षो से कर रहे थे।

भारत सरकार ने पद्मश्री से किया सम्मानित

मोहम्मद शरीफ (Mohammed Sharif) के इस नेक कार्य को देखने के बाद भारत सरकार ने 26 जनवरी 2020 को उन्हें पद्मश्री से सम्मानित करने की घोषणा की थी। हालांकि, तब तक देश में कोरोना का कहर अपनी चरम सीमा पर आ चुका था और देश में लॉकडाउन की स्थति थी और उनके खराब स्वास्थ्य की वजह से उन्हें यह सम्मान मिलने में थोड़ी देरी हुई थी।

आधिकारिक तौर पर उन्हें यह सम्मान नवंबर 2021 में राष्ट्रपति भवन में आयोजित एक समारोह के दौरान दिया गया था। उस समय देश के राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद (President Ram Nath Kovind) थे। ये अवार्ड लेने के बाद शरीफ चचा ने कहा था कि पीएम मोदी समेत वहां मौजूद अन्य नेताओं ने भी उनके कार्य की तारीफ की थी। शरीफ का कहना था कि सबने उन्हें यही कहा कि ऐसा काम अभी तक किसी ने नहीं किया, इसलिए आपको पद्मश्री से सम्मानित किया जा रहा है।

वहीं, मोहम्मद शरीफ (Mohammed Sharif) का यह भी कहना है कि सबको अपने माता-पिता की इज्ज़त करनी चाहिए और समाज की सेवा करनी चाहिए।

साइकल मरम्मत की दुकान चलाते थे शरीफ

मोहम्मद शरीफ (Mohammed Sharif) साइकल मरम्मत की दुकान भी चलाते थे, जो एक टिन शेड के नीचे थी। अब वो बंद हो चुकी है। उन्होंने स्थानीय वक्फ मेंबर का घर किराए पर ले रखा था। उनकी 15 वर्षीय पोती, आयशा ने बताया कि शरीफ चचा की लीवर और किडनी खराब हो गए हैं। पद्मश्री मिलने की घोषणा के बाद जब शरीफ मीडिया में चर्चा का विषय बने थे, तब उनकी 76 वर्षीय की पत्नी बिब्बी ने बताया था कि परिवार पर बहुत कर्ज है। दवा काफी महंगा है।

वहीं, अब उनके 2 बेटे बचे हैं। पहले बेटे मोहम्मद रईस की दंगे में मौत हो गई थी जबकि दूसरे कि बेटे नियाज के दिल की धड़कन रुकने से मृत्यु हुई थी। अब परिवार में मोहम्मद सगीर और मोहम्मद जमील हैं। सगीर स्कूल की गाड़ी चला कर परिवार का पेट पालते हैं जबकि जमील अपने पिता के साथ काम करते थे। हालांकि, सगीर ने बताया था कि उनका परिवार अब अपने पिता के नेक काम को आगे बढ़ा रहा है और जो भी लावारिस लाश आती हैं उनके धर्म के अनुसार वो अंतिम संस्कार करवाते हैं।

जब शरीफ चचा को पद्मश्री देने की घोषणा हुई थी, तो उस समय को याद करते हुए सगीर ने कहा था कि दिल्ली जाने के लिए हमने स्थानीय सूदखोर से 2,500 रुपये उधार लिए और ट्रेन टिकट बुक की लेकिन कोरोना महामारी के कारण ये कार्यक्रम रद्द हो गया। ट्रेन टिकट के लिए जो पैसे लिए थे, हम वो भी वापस नहीं कर पाएं।

आज इस दुनिया में नहीं हैं 'शरीफ चचा'

पद्मश्री से सम्मानित मोहम्मद शरीफ (Mohammed Sharif) उर्फ़ 'शरीफ चचा' आज हमारे बीच नहीं हैं। 4 मार्च, 2022 को अयोध्या में उनके पैतृक आवास पर उनका निधन हुआ। वो किसी गंभीर बीमारी से पीड़ित तो नहीं थे, लेकिन बढ़ती उम्र की कमजोरियां उन्हें छोड़ नहीं पाईं। 89 वर्ष की उम्र में उन्हें किडनी और सांस लेने में तकलीफ जैसी समस्याएं थीं।

अंतिम समय में उनकी आर्थिक स्थिति काफी खराब थी। बताया जाता है कि बेटे ने मीडिया के जरिये सरकार से अपील की थी कि इलाज में मदद की जाए क्योंकि उनके पास दवाइयों का खर्च उठाने के पैसे नहीं हैं।

इस घटना के बाद कहा जाता है कि यूपी की सरकार और स्थानीय प्रशासन ने उनके इलाज के लिए कुछ वित्तीय सहायता (Financial Aid) प्रदान की थी। साथ ही हर महीने पेंशन और चिकित्सा सहायता देने की बात भी हुई थी लेकिन परिवार के अनुसार सहायता मिलने में काफी देरी हुई।

मोहम्मद शरीफ (Mohammed Sharif) का जब निधन हुआ, तो प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ सहित कई अन्य नेताओं ने भी शोक प्रकट किया था। आज 'शरीफ चचा' हमारे बीच नहीं है लेकिन उनके नेक कार्य आज भी उनकी मौजूदगी का एहसास करवा रहे हैं।