सत्येंद्र दुबे (Satyendra Dubey) की बात करें, तो वो 'सेन्ट्रल नेशनल हाइवे अथॉरिटी ऑफ इंडिया’ में डिप्टी जनरल मैनेजर के पद पर कार्यरत थे। X
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IIT इंजीनियर की ईमानदारी की 'सजा-ए-मौत': PMO को चिट्ठी लिखना कैसे बन गया काल? जानें सत्येंद्र दुबे हत्याकांड की कहानी

जिस IIT इंजिनियर की हम बात कर रहे हैं, उसका नाम है सत्येंद्र दुबे (Satyendra Dubey)। वो बिहार के सीवान के रहने वाले थे और IIT कानपुर से पढ़े एक काबिल इंजीनियर थे।

Author : Mayank Kumar

  • सत्येंद्र दुबे, IIT इंजीनियर, ने भ्रष्टाचार के खिलाफ आवाज उठाई और PMO को चिट्ठी लिखी, जिसके बाद उनकी हत्या कर दी गई।

  • शिकायत के सिर्फ 16 दिन बाद 27 नवंबर 2003 को गया में गोली मारकर हत्या कर दी गई।

  • 2010 में दोषियों को सजा मिली, लेकिन परिवार आज भी मानता है कि असली साजिशकर्ता सामने नहीं आए।

कभी-कभी ईमानदारी की सजा मौत भी हो सकती है, ये किसी ने नहीं सोचा होगा लेकिन ऐसा होता है। जिस कहानी का जिक्र आज हम आपसे करने जा रहे हैं, वो बड़ी ही हैरान कर देने वाली है। ये कहानी एक IIT इंजिनियर की है, जिसने भ्रष्टाचार के खिलाफ आवाज़ उठाई लेकिन बदले में उसे दर्दनाक मौत मिली।

उसका कसूर बस इतना था कि उसने इसकी जानकारी प्रधानमंत्री तक पहुँचाने की कोशिश की लेकिन कुछ भ्रष्ट अफसरों ने उसके नाम का खुलासा कर दिया और इसके बाद वो दुनिया को अलविदा कह दिया। क्या है पूरा मामला आइये समझते हैं।

कौन थे इंजीनियर सत्येंद्र दुबे?

जिस IIT इंजिनियर की हम बात कर रहे हैं, उसका नाम है सत्येंद्र दुबे (Satyendra Dubey)। वो बिहार के सीवान के रहने वाले थे और IIT कानपुर से पढ़े एक काबिल इंजीनियर थे। हर इंजिनियर की तरह उनका भी सपना था कि वो देश के लिए कुछ योगदान दें लेकिन तब कुछ गुंडे-अधिकारियों को उनकी ईमानदारी रास नहीं आई। उस समय बिहार में लालू-राबड़ी का दौर था

दुबे उस समय प्रधानमंत्री की राजमार्ग योजना पर ईमानदारी से अपना काम कर रहे थे। उनके विभाग में भ्रष्टाचार और ठेकेदारी में गड़बड़ी हो रही थी। उन्हें यह बात पता चल गई। इन्हीं चीजों को लेकर उन्होंने प्रधानमंत्री कार्यालय को शिकायती पत्र भेजा, उस समय अटल बिहारी वाजपेयी पीएम थे और इसके कुछ दिन के बाद ही उनकी हत्या कर दी गई।

कौन थे सत्येंद्र दुबे?

सत्येंद्र दुबे (Satyendra Dubey) की बात करें, तो वो 'सेन्ट्रल नेशनल हाइवे अथॉरिटी ऑफ इंडिया’ में डिप्टी जनरल मैनेजर के पद पर कार्यरत थे। 1994 में उन्होंने कानपुर से सिविल इंजीनियरिंग में ग्रैजुएशन किया। जब यह घटना हुई, तब वो स्वर्णिम चतुर्भुज योजना के औरंगाबाद-बाराचट्टी हाइवे पर काम कर रहे थे। ये 60 किलोमीटर लम्बा प्रोजेक्ट था।

उन्होंने नवंबर 11, 2003 को PMO को पत्र भेजा, जिसमें उन्होंने इस बात का जिक्र किया कि कैसे जनता के पैसे लूटे जा रहे हैं। योजनाओं को जमीनी स्तर पर सही से लागू नहीं किया जा रहा है। उनसे गलती बस यह हुई थी कि उन्होंने अपना नाम उजागर कर दिया। हालांकि, दुबे ने इसे गोपनीय रखने की अपील की लेकिन बावजूद इसके उनके नाम का खुलासा कर दिया गया। उनका पत्र कुल 8 अधिकारियों के टेबल से गुजरा था लेकिन किसी ने उनके नाम को गोपनीय नहीं किया।

16 दिन बाद हुई हत्या

नवंबर 11, 2003 को उन्होंने शिकायत की थी लेकिन इसके ठीक 16 दिन बाद यानी नवम्बर 27, 2003 को उनकी गया में गोली मारकर हत्या कर दी गई। उस समय बिहार में आरजेडी की सरकार थी। ऐसे में किसी को इसकी उम्मीद नहीं थी कि राज्य सरकार की ओर से कोई ठोस

कदम उठाए जाएंगे लेकिन तत्कालीन बाजपेयी सरकार ने भी इस मामले से पल्ला ही झाड़ा। उस समय पीएमओ की ओर से कहा गया था कि रोज अनगिनत पत्र आते हैं और उन सभी को ट्रेस करना खासा मुश्किल है। पत्र की कोई कॉपी मिले, तभी कुछ कह पाएंगे।

बता दें कि साल 2013 में आई फिल्म सत्याग्रह में सत्येंद्र दुबे के हत्याकांड की झलक देखने को मिली थी। साथ ही आमिर खान के शो 'सत्यमेव जयते' के आखिरी एपिसोड में भी उनकी शहादत और ईमानदारी का जिक्र प्रमुखता से किया गया था।

7 साल बाद मिली सजा

आपको बता दें कि सत्येंद्र दुबे (Satyendra Dubey) की हत्या के दोषियों को सजा मिली। करीब 7 साल बाद 2010 में पटना की एक विशेष सीबीआई अदालत ने मुख्य आरोपी मंटू कुमार, उदय कुमार और पिंकू रविदास को हत्या और लूट के लिए उम्रकैद की सजा सुनाई। गोली मंटू ने चलाई थी।

हालांकि, जाँच के दौरान दो गवाहों की मौत भी हुई जबकि मुख्य गवाह (रिक्शा चालक) अचानक गायब हो गया। दुबे के परिवार का मानना है कि ये तीनों मामूली अपराधी जबकि असली साजिशकर्ता कोई और है। फ़िलहाल ये तीनों बिहार की जेल में बंद हैं और सजा काट रहे हैं।