27 फरवरी 2026 को कोर्ट ने अरविंद केजरीवाल, मनीष सिसोदिया समेत 23 आरोपियों को बरी किया, लेकिन CBI ने इस फैसले को दिल्ली हाईकोर्ट में चुनौती दी है।
छत्तीसगढ़, आंध्र प्रदेश और पंजाब में शराब नीति को लेकर घोटाले या अनियमितताओं के आरोप लगे और कुछ मामलों में जांच भी हुई।
यूपी में 2001 की आबकारी नीति और 2008-2018 के बीच लाइसेंस व्यवस्था में गड़बड़ी से हजारों करोड़ के राजस्व नुकसान के आरोप सामने आए।
साल 1984 में एक फिल्म आई थी, नाम था, 'शराबी', इस फिल्म में अभिनेता अमिताभ बच्चन का एक डायलॉग है, "हमारी ज़िंदगी का तंबू तीन बम्बू पे खड़ा है... शायरी, शराब और आप", कुछ ऐसी ही भारत की राजनीति भी तीन बम्बू पर खड़ी नज़र आती है, "झूठ, घोटाला और भ्रष्टाचार।" भारत में ये 3 चीजें काफी आम हो चुकी हैं। हाल ही में 27 फरवरी 2026 को दिल्ली की राउज एवेन्यू कोर्ट ने अरविंद केजरीवाल, मनीष सिसोदिया और के. कविता सहित सभी 23 आरोपियों को दिल्ली शराब नीति घोटाले के मामले में बरी कर दिया।
परन्तु, सीबीआई इनका पीछा नहीं छोड़ने वाली है और उन्होंने अब इस फैसले को दिल्ली हाई कोर्ट में चुनौती दी है। केजरीवाल सरकार पर यह आरोप था कि उन्होंने 2021-22 की शराब नीति को निजी व्यापारियों को फायदा पहुँचाने के लिए बदला। इसके लिए उन्होंने 100 करोड़ रुपये की रिश्वत ली थी। हालांकि, आपको यह जानकर हैरानी होगी कि दिल्ली पहला ऐसा राज्य नहीं है जहाँ शराब घोटाला हुआ है। भारत के 4 ऐसे राज्य हैं जहाँ शराब घोटाले की खबर ने खूब तूल पकड़ा था। इस लिस्ट में वर्तमान में रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह का नाम भी शामिल है।
छत्तीसगढ़ में शराब घोटाला का मामला 2019-2023 के बीच का है। उस समय राज्य में भूपेश बघेल की सरकार थी। इस दौरान राज्य में एक आपराधिक सिंडिकेट द्वारा शराब नीति में हेरफेर का मामला सामने आया था। ED की रिपोर्ट के अनुसार इस घोटाले में ₹2,161 करोड़ से ₹2,883 करोड़ के बीच के अवैध लेनदेन हुए, जिसमें सरकारी दुकानों को बिना रिकॉर्ड के शराब बेची गई और इसमें नकली होलोग्राम का इस्तेमाल हुआ था।
जाँच जब आगे बढ़ी तो इसमें पूर्व मुख्यमंत्री भूपेश बघेल के बेटे चैतन्य बघेल, पूर्व मंत्री कवासी लखमा, और पूर्व नौकरशाह अनिल टूटेजा व सौम्या चौरसिया जैसे हाई-प्रोफाइल नाम सामने आए थे। मौजूदा स्थति की बाद करें तो ED ने दिसंबर 2025 में 81 आरोपियों के खिलाफ 29,800 पन्नों की अंतिम चार्जशीट दायर की थी। वहीं, फ़रवरी 2026 में पूर्व मंत्री कवासी लखमा को सुप्रीम कोर्ट से राहत मिली जबकि मार्च 2026 में छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने पूर्व डिप्टी सेक्रेटरी सौम्या चौरसिया को जमानत दी। फिलहाल यह मामला अदालती प्रक्रिया से गुजर रहा है।
आंध्र प्रदेश में जब YSRCP की सरकार थी और जगनमोहन रेड्डी मुख्यमंत्री थे, तब शराब घोटाला काफी चर्चा में आया था। आरोप लगा कि शराब नीति में किए गए बदलावों के चलते राज्य को ₹3,200 करोड़ से ₹4,000 करोड़ तक का नुकसान हुआ। साथ ही यह भी बात सामने आई कि घोटाले का मुख्य कारण राष्ट्रीय ब्रांड को हटाकर स्थानीय ब्रांडों को तवज्जो देना था। इससे प्रति पेटी ₹150 से ₹600 तक का अवैध कमीशन वसूला गया। इसके साथ ही भुगतान के लिए डिजिटल के बजाय मैनुअल बिलिंग सिस्टम इस्तेमाल हुआ।
अभी हाल ही में 6 मार्च 2026 को ED ने मुख्य आरोपी केसीरेड्डी राजशेखर रेड्डी और उनके सहयोगियों की ₹441.63 करोड़ की संपत्ति कुर्क की। साथ ही देश छोड़कर भागने की कोशिश कर रहे प्रणय प्रकाश को धर दबोचा। वर्तमान में आंध्रप्रदेश में टीडीपी की सरकार है और चंद्रबाबू नायुडु की सरकार ने अक्टूबर 2024 में नई शराब नीति लागू की थी, जिससे निजी दुकानों को वापस अनुमति मिली। वहीं, फिलहाल शराब घोटाला का यह मामला अदालती प्रक्रिया से गुजर रहा है।
साल 2022-23 में पंजाब में नई शराब नीति बनाई गई। भगवंत मान सिंह की सरकार ने तर्क दिया कि इस नीति का उद्देश्य अवैध शराब की तस्करी पर रोक लगाना और राज्य के राजस्व को बढ़ाना है। इस नए नियम के तहत शराब के ठेकों की नीलामी ई-टेंडर के जरिए हुई और कई दुकानों को एक साथ ग्रुप में रखकर एक ही ठेकेदार को देने की व्यवस्था बनाई गई। सरकार ने लक्ष्य रखा था कि इससे 9,600 करोड़ रुपये राजस्व जुटाया जाएगा लेकिन इसको लेकर काफी विवाद हुआ था। विपक्षी दलों ने यह आरोप लगाया कि यह नई नीति दिल्ली से प्रेरित है, क्योंकि वहां केजरीवाल शराब घोटाले में फंसे हुए हैं।
अब भगवंत मान वही नियम यहाँ भी लागू करना चाहते हैं। विपक्षी दलों का यह भी कहना था कि नई नीति में ठेके देने और लाइसेंस जारी करने की प्रक्रिया में कुछ कंपनियों को फायदा पहुंचाया गया। इसमें पारदर्शिता नहीं रखी गई। साथ ही ग्रुप सिस्टम और नीलामी प्रक्रिया पर भी सवाल उठे। सरकार ने अपने ऊपर लगे आरोपों को ख़ारिज किया। फिलहाल यह मामला राजनीतिक बहस का मुद्दा बना हुआ है। अभी इसमें जाँच की प्रक्रिया शामिल नहीं हुई है।
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उत्तर प्रदेश की बात करें तो यहाँ एक नहीं बल्कि दो बार शराब घोटाला सामने आया है। साल 2000 से 2002 के बीच यूपी की शराब नीति विवादों में रही थी। मुख्यमंत्री राजनाथ सिंह थे और उस दौरान ₹1,500 करोड़ का घोटाला सामने आया था। 2001 में राजनाथ सिंह सरकार ने एक नई आबकारी नीति लागू की थी। इस नीति के तहत राज्य सरकार ने शराब की बिक्री पर सरकारी एकाधिकार (Monopoly) खत्म कर इसे निजी हाथों में सौंप दिया था। इसके बाद बीजेपी पर आरोप लगा कि उन्होंने शराब सिंडिकेट्स और बड़े व्यापारियों को फायदा पहुँचाने के लिए ये किया है।
मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक इस नीति के तहत सरकार को सालाना लगभग ₹500 करोड़ के राजस्व का नुकसान हो रहा था जबकि शराब बनाने वाली कंपनियों को भारी मुनाफा हुआ। मामला जब ज्यादा बढ़ा, तो राजनाथ सिंह ने अपने ही एक मंत्री अमरमणि त्रिपाठी को भ्रष्टाचार और आपराधिक गतिविधियों के आरोपों के चलते बर्खास्त कर दिया था। तब जाकर मामला शांत हुआ था।
इसके बाद ये शराब घोटाला 2008 से 2018 के बीच सुनने को मिला। इस दौरान राज्य में बहुजन समाज पार्टी (मायावती) और बाद में समाजवादी पार्टी (अखिलेश यादव) की सरकारें रहीं। इसपर कैग (CAG) की रिपोर्ट बनाई है, जिसमे यह जिक्र है कि शराब लाइसेंसों के नवीनीकरण और कोटा निर्धारण में गड़बड़ी से राज्य को लगभग ₹3,600 करोड़ के राजस्व का नुकसान हुआ था। फिलहाल यूपी में योगी आदित्यनाथ की सरकार है, जो इस मामले की जाँच कर रही है।
तो ये थे वो 4 ऐसे राज्य जहाँ से शराब घोटाले की खबर सामने आई थी।