राजस्थान के चौहान और हंगरी के हूण एक ही वंश के हो सकते हैं। इतिहासकार बर्ने के मुताबिक हूण एक योद्धा जनजाति थी और इसका जिक्र महाभारत में भी है।  X
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हंगरी से जुड़ा चौहानों का रहस्य! क्या सच में एक ही वंश से हैं भारत और यूरोप के ये योद्धा?

भारत से 5,920 km दूर एक देश है, जिसका नाम है हंगरी (Hungary), कुछ लोग इसे मिनी राजस्थान भी कहते हैं, लेकिन इसके पीछे एक गहरा राज है, जो अब भारत से लेकर यूरोप तक हलचल मचा रहा है।

Author : Mayank Kumar

  • हंगरी के इतिहासकार कोवाच इमरे बर्ने ने दावा किया कि चौहान और हूण एक ही वंश से जुड़े हो सकते हैं।

  • शाकंभरी माता मंदिर समेत मंदिरों, परंपराओं और नामों में कई समानताएं सामने आई हैं।

  • इतिहासकारों के अनुसार यह कनेक्शन 1600 साल पुराना है, जिस पर और वैज्ञानिक शोध की जरूरत बताई गई है।

भारत से 5,920 km दूर एक देश है, जिसका नाम है हंगरी (Hungary), कुछ लोग इसे मिनी राजस्थान भी कहते हैं, लेकिन इसके पीछे एक गहरा राज है, जो अब भारत से लेकर यूरोप तक हलचल मचा रहा है। कहा जाता है कि राजस्थान के चौहान और हंगरी के हूण वंश आपस में जुड़े हुए हैं। इसी बीच एक विदेशी इतिहासकार के दावे ने इस सवाल को वापस से चर्चा का विषय बना दिया है।

इसपर कई बार शोध भी हुआ, जिसमे यह सामने आया है कि हंगरी (Hungary) और राजस्थान में कुछ चौंकाने वाली समानताएं हैं, जो इस कनेक्शन को मजबूत बनाती है। मंदिर की बनावट और कई परम्पराएं भी इस रहस्य को और गहरा बना देते हैं। क्या है पूरा मामला इसे विस्तार से समझते हैं।

इतिहासकार कोवाच इमरे बर्ने ने किया बड़ा दावा

हंगरी (Hungary) देश की राजधानी बुडापेस्ट में एक योद्धा की मूर्ति है, जो घोड़े पर सवार है। इसके बारे में कहा जाता है कि इसका संबंध भारत के चौहान राजाओं से है। इतिहासकार कोवाच इमरे बर्ने (Kovach Imre Berne) ने यह दावा किया है कि राजस्थान के चौहान और हंगरी के हूण एक ही वंश के हो सकते हैं। इतिहासकार बर्ने के मुताबिक हूण एक योद्धा जनजाति थी और इसका जिक्र महाभारत में भी है।

इन्होने यूरोप के कई जगहों पर भी राज किया है। साल 2018 में इस गुत्थी को समझने के लिए बर्ने भारत आए थे। इस दौरान उन्होंने राजस्थान यूनिवर्सिटी में आयोजित एक कार्यक्रम में चौहानों और हूणों के बीच समानताओं पर बात की। उन्होंने बताया कि इसे समझने के लिए वो चौहान शासकों से जुड़े कई ऐतिहासिक स्थानों का दौरा भी कर चुके हैं। उन्होंने जयपुर जिले के सांभर स्थित शाकंभरी माता मंदिर का भी दौरा किया है।

मंदिरों में दिखी समानता

इतिहासकार कोवाच इमरे बर्ने (Kovach Imre Berne) ने यह भी बताया कि जब वो शाकंभरी माता मंदिर गए, तो उन्हें वहां हंगरी के मंदिरों से काफी समानताएं देखने को मिली। दोनों जगह देवी की मूर्ति चट्टानों से खुद उभरी हुई है, जिसे तराशा नहीं गया है। उनके मुताबिक यह खोज भारत और हंगरी के हूणों के बीच संबंध और उनके प्रवास के रास्ते को समझने में मदद करेगी।

बर्ने का यह भी मानना है कि चौहान भारत में अलचन हूण शासकों (पहली से पाँचवीं सदी) के समय आए। भारत में हूणों का सबसे पुराना वर्णन चीनी बौद्ध यात्रियों सुंग युन (6वीं सदी) और ह्वेनसांग (7वीं सदी) ने किया है, जिन्होंने अपने लेखों में “श्वेत हूण” का जिक्र किया है। चाओ’ नाम की मंगोल जनजाति और हूण मिलकर चौहान बने और 380 ईस्वी के आसपास अलग-अलग जगहों पर बसने लगे। आज के समय वे यूरेशिया के कई जगहों पर मिलते हैं।

राजस्थान और हंगरी के बीच जो समानता है, उसकी कहानी 1600 साल पुरानी है।

इतिहासकार ने यह भी बताया कि हंगरी के हूणों के पास 300 से ज्यादा टोटम अर्थात प्रतीक हैं, जो चौहान के प्रतीकों से काफी मिलते हैं। हंगरी में एक उपनाम है, ‘Csohan’ जो बहुत आम है। इसे चौहान नाम से जुड़ा हुआ माना जाता है। वहाँ कई परिवारों के नाम देवताओं, टोटम या पूर्वजों के नाम पर रखे जाते हैं। हंगरी में ‘बाबा देवी’ की पूजा होती है, जिसे भारतीय ‘अंबा देवी’ से जोड़ा जाता है, और हर साल इस देवी का त्योहार भी मनाया जाता है।

राजस्थान-हंगरी में हैं कई समानताएं

इतिहासकार कोवाच इमरे बर्ने (Kovach Imre Berne) यह भी बताते हैं कि राजस्थान और हंगरी के बीच कई समानताएं और भी हैं, जैसे :-कला, वास्तुकला और चित्रकला। उनके मुताबिक हूणों का यूरोप और एशिया के इतिहास में बड़ा योगदान रहा है, लेकिन इसे ठीक से पहचाना नहीं गया।

वहीं, जब बर्ने राजस्थान यूनिवर्सिटी में मौजूद थे, तो इस दौरान इतिहास विभाग के प्रमुख के.जी. शर्मा ने भी इस मामले पर अपनी राय रखी। उन्होंने कहा कि इस विषय पर वैज्ञानिक तरीके से और गहन शोध की जरूरत है, जिसमें खून के संबंध की भी जांच होनी चाहिए। इससे भारत और यूरोप के संबंधों पर बड़ा असर पड़ सकता है।

इतिहास विभाग के प्रमुख शर्मा का मानना है कि हूणों से जुड़े प्रमुख केंद्र पाकिस्तान के सियालकोट और अफगानिस्तान के कुंदोज थे। वे हिंदूकुश क्षेत्र (आज का उत्तर-पूर्वी अफगानिस्तान) में भी काफी प्रभावशाली थे।

क्या है हंगरी-राजस्थान का इतिहास?

आपको बता दें कि राजस्थान और हंगरी के बीच जो समानता है, उसकी कहानी 1600 साल पुरानी है। कई इतिहासकारों के मुताबिक मध्य एशिया के हूण (Huns) योद्धाओं ने दो अलग-अलग दिशाओं में प्रवास किया था। एक यूरोप पहुंचे, जो आज हंगरी है, और दूसरे भारत के राजस्थान पहुंचे। भारत जो आए, वो यही बस गए। विभिन्न राजपूत और गुर्जर समुदायों का हिस्सा बन गए। यहाँ की परंपरा अपनाई।

करीब 2 सदी तक इन्होने भारत में शासन भी किया और छोटे-छोटे समूहों में उत्तर-पश्चिमी भारत जैसे राजस्थान, पंजाब, कश्मीर में भी जाकर बस गए। कुछ ने हिंदू धर्म अपनाया, तो कुछ ने बौद्ध धर्म अपना लिया। जब उन्होंने 2 सदी तक शासन किया, तो उनकी भी परंपरा को भारत के लोगों ने अपना लिया। ऐसा कई इतिहासकारों का मानना है। जो हूण भारत आए थे, वो कभी वापस लौटे ही नहीं, ऐसे में आज जो हंगरी और राजस्थान के बीच जो समानताएं देखी जाती हैं, वो उनके वापस जाने के कारण में नहीं है बल्कि उनके एक ही प्राचीन मूल से होने के कारण हैं।