केरल विधानसभा चुनाव 2026 में कांग्रेस ने 102 सीटें जीतकर ऐतिहासिक वापसी की है। तमाम खींचतान के बाद वी.डी. सतीशन के नाम पर मुहर लगी, जिन्होंने के.सी. वेणुगोपाल जैसे दिग्गजों को पीछे छोड़ा। सतीशन 2001 से लगातार विधायक हैं। इस हार ने केरल में वामपंथ के भविष्य पर सवाल खड़े कर दिए हैं, जहाँ 1957 में विश्व की पहली लोकतांत्रिक कम्युनिस्ट सरकार बनी थी।
केरल विधानसभा चुनाव-2026 में लेफ्ट फ्रंट को करारी शिकस्त का सामना करना पड़ा है। इस बार कांग्रेस को पूर्ण बहुमत हासिल हुआ है और 10 साल बाद पार्टी ने केरल में शानदार वापसी की है। हालांकि, मुख्यमंत्री के नाम को लेकर काफी समय से पार्टी के भीतर खींचतान चल रही थी, लेकिन अब इन चर्चाओं पर विराम लगाते हुए कांग्रेस की तरफ से वी.डी. सतीशन को मुख्यमंत्री पद के लिए चुन लिया गया है। वहीं, कुछ राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि इस हार के साथ वामपंथ का भारतीय राजनीति से लगभग सफाया हो चुका है। आइए, केरल के नए मुख्यमंत्री और वामपंथ की राजनीति पर एक नजर डालते हैं।
वी.डी. सतीशन का जन्म 1964 में कोच्चि के पास नेटूर में हुआ था। के. दामोदरा मेनन और वी. विलासिनी अम्मा के घर में जन्मे सतीशन शुरू से ही बड़े होनहार थे। उन्होंने कानून की पढ़ाई केरल विश्वविद्यालय से की है। कॉलेज के दिनों से ही वे कांग्रेस की छात्र इकाई NSUI से जुड़ गए और राजनीति में सक्रिय हो गए। साल 2001 में उन्होंने केरल विधानसभा चुनाव लड़ा और परूर विधानसभा से विधायक बने। इसके बाद वे लगातार 6 बार यहाँ से विधायक चुने गए और इस क्षेत्र को कांग्रेस का मजबूत गढ़ बना दिया।
2016 से लेफ्ट फ्रंट की सरकार केरल में लगातार बनी हुई थी, लेकिन 2026 के चुनाव में कांग्रेस को केरल की 140 में से 102 सीटों पर ऐतिहासिक जीत हासिल हुई है। इस जीत में सतीशन का बहुत बड़ा रोल था। उन्होंने चुनाव प्रचार के दौरान बार-बार इस बात को दोहराया कि "कांग्रेस ही असली वामपंथ है।" लेफ्ट फ्रंट की विचारधारा से मुकाबला करने में सतीशन की प्रभावी भूमिका को नकारा नहीं जा सका, यही कारण है कि कांग्रेस के बड़े-बड़े दिग्गजों को किनारे करके आज वे मुख्यमंत्री बन गए हैं।
सतीशन के नाम के अलावा कांग्रेस में कई बड़े दिग्गजों के नाम मुख्यमंत्री पद की दौड़ में शामिल थे। शशि थरूर ने अपने नाम को पहले ही इस श्रेणी से बाहर कर दिया था, जबकि के.सी. वेणुगोपाल को लेकर चर्चा तेज थी कि उन्हें दिल्ली से केरल भेजकर मुख्यमंत्री बनाया जाएगा। वेणुगोपाल को सबसे प्रबल दावेदार माना जा रहा था, लेकिन अंततः सतीशन के नाम पर मुहर लगी।
नाम की घोषणा के बाद वेणुगोपाल ने कहा कि वे पार्टी के वफादार कार्यकर्ता हैं और हाई कमान के फैसले का स्वागत करते हैं। बता दें कि वेणुगोपाल गांधी परिवार के बेहद विश्वसनीय माने जाते हैं। संगठन की कमान संभाल रहे वेणुगोपाल को आने वाले समय में कोई बड़ी जिम्मेदारी सौंपी जा सकती है। कांग्रेस के राष्ट्रीय अध्यक्ष का चुनाव होने वाला है, ऐसे में कयास लगाए जा रहे हैं कि उन्हें संगठन में किसी बड़े पद पर देखा जा सकता है।
केरल चुनाव 2026 में करारी शिकस्त के बाद वामदलों के भविष्य पर चर्चा छिड़ गई है। केरल वह पहला राज्य है जहाँ पहली बार लोकतांत्रिक तरीके से कम्युनिस्ट सरकार चुनी गई थी। आजादी के बाद कांग्रेस को केरल में कम्युनिस्ट पार्टी ने ही सबसे बड़ी चुनौती दी थी।
बता दें कि उस समय पूरे भारत में नेहरू का प्रभाव था और कांग्रेस की लहर थी, लेकिन केरल में विपक्ष के रूप में भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी (CPI) मजबूती से उभरी। 1 नवंबर 1956 को राज्य पुनर्गठन के बाद केरल राज्य बना।
1957 के पहले चुनाव में कम्युनिस्ट पार्टी को 60 सीटें मिलीं, जबकि कांग्रेस को 43 सीटों पर सफलता मिली थी। इसके अलावा प्रजा सोशलिस्ट पार्टी को 9 और मुस्लिम लीग को 8 सीटें मिली थीं।
सीपीआई बहुमत के आंकड़े से महज 4 कदम दूर थी। तत्कालीन राज्यपाल बी. रामकृष्ण राव ने सीपीआई को सरकार बनाने का निमंत्रण दिया। निर्दलीय विधायकों के सहयोग से 5 अप्रैल 1957 को ई.एम.एस. नंबूदिरीपाद ने केरल के प्रथम मुख्यमंत्री के रूप में शपथ ली थी, जो विश्व इतिहास में एक बड़ी घटना मानी गई।
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