सोनम वांगचुक के आमरण अनशन और अभिजीत दीपके के नेतृत्व में जंतर-मंतर से संसद तक मार्च ने पेपर लीक के मुद्दे पर धर्मेंद्र प्रधान को निशाने पर ला दिया, जिससे मोदी विरोध का बड़ा हिस्सा शिक्षा मंत्री पर शिफ्ट हो गया। प्रधान के इस्तीफे को छात्रों की जीत माना जा रहा है, पर सवाल यह है कि क्या इतना जनसमर्थन सिर्फ मंत्री बदलने तक सीमित रह गया या व्यवस्था परिवर्तन की दिशा में ठोस कदम उठे।
सोनम वांगचुक (Sonam Wangchuk) के आमरण अनशन के फैसले ने पूरे देश का ध्यान अपनी तरफ खींच रखा था। अभिजीत दीपके के साथ उनके समर्थकों ने 20 जुलाई 2026 को जंतर-मंतर से संसद भवन तक शांतिपूर्वक मार्च किया। आंदोलन स्थल से निकले दो-तीन तथ्य सबके बीच चर्चा का विषय बने हुए हैं, जिनमें सोनम वांगचुक, अभिजीत दीपके और AISA के कुछ छात्र शामिल थे जो अनशन पर बैठे हुए थे।
पूरी भाजपा (BJP) सरकार के खिलाफ जो विरोध की भावना कई वर्षों से इकट्ठा हो रही थी, वह धर्मेंद्र प्रधान (Dharmendra Pradhan) के सिर पर स्थानांतरित हो गई। पिछले कई दिनों से भाजपा के धर्मेंद्र प्रधान का नाम जंतर-मंतर से चारों तरफ फैलाया जा रहा था। धर्मेंद्र प्रधान की तुलना में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी (Narendra Modi) का नाम विरोध के स्वर में धीरे-धीरे धूमिल होने लगा था। इसे आसान भाषा में कहा जाए तो नरेंद्र मोदी के ऊपर आम जनता के विरोध और दबाव के जो बादल मंडरा रहे थे, वे अब धर्मेंद्र प्रधान की राजनीतिक खेती पर ओले बनकर बरस पड़े।
साल 2024 के लोकसभा चुनाव के बाद से नरेंद्र मोदी की लोकप्रियता में गिरावट देखने को मिली है। केवल लोकप्रियता में गिरावट ही नहीं, बल्कि बहुत सारे मामलों में विरोध के स्वर भी तेज होने लगे थे। राहुल गांधी 'मोदी-अमित शाह' की जोड़ी वाले नाम को 'मोदी-अडानी' में तब्दील करने की कोशिश कर रहे थे। ईरान-अमेरिका युद्ध और एपस्टीन फाइल मामले के बाद से मोदी की व्यक्तिगत छवि को बहुत ज्यादा नुकसान होने लगा था। यहाँ तक कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी पर चारों तरफ से हमला होने लगा था। एक समय नरेंद्र मोदी (Narendra Modi) नाम को जिस तरीके से नायक के रूप में प्रस्तुत किया गया था, वह अब बदनाम गली के खलनायक में तब्दील होने लगा था।
कांग्रेस इस मुहिम को छोड़ना नहीं चाह रही थी। इसी बीच पेपर लीक के मामले ने प्रधानमंत्री के ऊपर से विरोध के भार को शिक्षा मंत्री के सिर पर उतारना शुरू कर दिया। जहाँ प्रधानमंत्री बहुत सारे मुद्दों से घिरते नजर आ रहे थे, वहीं अब जनता सिर्फ एक मुद्दे पर केंद्रित होती दिखाई दे रही है। यह सरकार के खिलाफ गूँजती आवाज को मजबूती देता दिखाई दे रहा था। आने वाले चुनावों में बीजेपी की मुश्किलें बढ़ सकती हैं। लेकिन विचार करने वाली बात यह भी है कि नरेंद्र मोदी को धर्मेन्द्र प्रधान के इस्तीफे ने बचा तो नहीं लिया?
धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफा देने के बाद से सीजेपी (CJP) गुट जश्न मना रहा है। इस्तीफे के बाद आंदोलन और व्यवस्था परिवर्तन को लेकर कई सारे सवाल खड़े हो रहे हैं-
6 जून 2026 को अभिजीत दीपके ने भारत पहुंचकर दिल्ली के जंतर-मंतर पर शक्ति प्रदर्शन किया। इसके बाद आंदोलन की धार लगातार तेज होती चली गई। इस आंदोलन से आम जनता ऐसे जुड़ रही थी मानो किसी व्यवस्था परिवर्तन की बात हो रही है। जनता भावनात्मक जुड़ाव महसूस कर रही थी। सरकार पर इतना बड़ा दबाव बनाया गया ताकि धर्मेंद्र प्रधान इस्तीफा दें। धर्मेंद्र प्रधान ने इस्तीफा दे भी दिया और नए शिक्षा मंत्री की राजनीतिक और वैचारिक पृष्ठभूमि को लेकर अब कई सवाल खड़े हो रहे हैं।
लेकिन गौर करने वाली बात यह है कि जिस तरीके का जनसमर्थन इस आंदोलन को मिल रहा था, इस प्रकार के समर्थन से महज एक मंत्री का इस्तीफा नहीं, बल्कि व्यापक परिवर्तन किया जा सकता था। सवाल यह भी है कि व्यवस्था में व्यापक परिवर्तन हेतु दोबारा आह्वान किया जाता है, तो क्या जनता का समर्थन इतनी जल्दी इतने बड़े स्तर पर मिल सकता है? अगर मान लिया जाए कि 1 या 2 वर्ष के भीतर फिर से किसी जन-आंदोलन के लिए आह्वान किया जाता है, तो क्या आम जनता फिर से आ सकती है? ये सारे सवाल इसलिए हैं क्योंकि आंदोलनों के इतिहास बताते हैं कि जनता के मन में विरोध का भाव जब चरम पर पहुँच जाता है, तभी वह सड़क पर उतरती है। सरकार के खिलाफ विरोध के स्वर एक दिन में इकट्ठा नहीं होते; इसके लिए बहुत समय तक इंतजार करना पड़ता है।
भारत में सरकार के खिलाफ पहला बड़ा आंदोलन जयप्रकाश नारायण के नेतृत्व में हुआ था, जब इंदिरा गांधी के समय पूरा विपक्ष एकजुट हो चुका था। इस आंदोलन के बाद राष्ट्रीय स्तर पर आंदोलन बहुत समय तक नहीं हो पाए थे। हालांकि, इसके बाद साल 2011 में भ्रष्टाचार विरोधी आंदोलन शुरू हुआ। इस आंदोलन को लेकर बहुत सारे मत हैं, लेकिन इस बात में कोई दो राय नहीं है कि अन्ना आंदोलन के बाद से आम जनता आंदोलन के नाम से दूरी बनाने लगी।
दूरी बनाने की वजह भी जायज थी, क्योंकि जिस मकसद से अन्ना हजारे ने आंदोलन शुरू करने का आह्वान किया था, वह मकसद अभी तक पूरा नहीं हो पाया है और लोकपाल नामक शब्द अब भारतीय राजनीति की शब्द-सूची में धूमिल हो चुका है। अन्ना आंदोलन के बाद भाजपा सरकार में कई सारे अवसर आए जब लगने लगा कि राष्ट्रीय स्तर पर आंदोलन करने की जरूरत है, जैसे नोटबंदी, पीएम केयर्स फंड, कोरोना आपदा आदि। जनता उस समय भी घुटन महसूस कर रही थी, लेकिन लोगों को किसी भी प्रकार के आंदोलन में विश्वास नहीं हो पा रहा था।
पेपर लीक की समस्या कोई नई नहीं थी उत्तर प्रदेश, बिहार एवं अन्य राज्यों में पेपर लगातार लीक हो रहे थे। राम मंदिर चंदा चोरी जैसे मसले ने आम जनता को झकझोर दिया था। घरेलू राजनीति से लेकर अंतर्राष्ट्रीय राजनीति में नरेंद्र मोदी के फैसलों से आम जनता के मन में लंबे समय बाद बहुत ज्यादा नाराजगी थी। सही मायने में कहा जाए तो जनता स्वयं सड़क पर आने के लिए तैयार थी, बस एक मौके की तलाश थी। जब खेत में गेहूं पूरी तरीके से तैयार हो जाता है, तो एक छोटी सी चिंगारी फसल से भरे खेत को जलाने में कामयाब हो जाती है।
लेकिन यहाँ मामला थोड़ा सा दूसरी तरफ चला गया है। इस बात में कोई संदेह नहीं है कि धर्मेंद्र प्रधान का इस्तीफा होना छात्रों की बड़ी जीत है, लेकिन अगर इसका असर चुनाव में नहीं पड़ता है, तो यह बहुत ही विचारणीय विषय हो सकता है और आंदोलन की सफलता और असफलता पर पुनः विचार करना पड़ सकता है।
हालांकि, अभिजीत दीपके (Abhijeet Dipke) और उनकी पूरी टीम वहीं नहीं रुकी। अब उन्होंने एक नया अभियान शुरू किया है,“स्कूल ठीक करो (School Thik Karo)” नामक नया अभियान शुरू करके वे बीजेपी सरकार को फिर से चुनौती देने की कोशिश कर रहे हैं। 12 अगस्त 2026 को अभिजीत ने बयान देते हुए कहा कि जंतर मंतर 2.0 फिर से शुरू किया जा सकता है। अब देखना यह है कि बीजेपी सरकार के खिलाफ किसी नए आंदोलन में जनता का विश्वास जीतना अभिजीत के लिए आसान होगा या कठिन, क्योंकि आंदोलनों के इतिहास बताते हैं कि जनता का विश्वास बार-बार जीत पाना बहुत कठिन काम है।
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