संसद चमक रही है, जनता ठिठुर रही है, दिल्ली AIIMS के बाहर मोदी सरकार बेनकाब! wikimedia commons
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संसद चमक रही है, जनता ठिठुर रही है, दिल्ली AIIMS के बाहर मोदी सरकार बेनकाब!

दिल्ली एम्स के बाहर मरीजों की लम्बी कतार का होना और एम्स के गेट के बाहर मरीजों और उनके परिजनों को हो रही समस्या दिल्ली की व्यवस्था पर लगातार प्रश्न खड़े कर रहा है।

Author : Pradeep Yadav
Reviewed By : Mayank Kumar

  • दिल्ली एम्स के बाहर सैकड़ों मरीज और परिजन कड़ाके की ठंड में खुले आसमान के नीचे रहने को मजबूर, रैन बसेरों की व्यवस्था नाकाफी

  • बिहार, यूपी सहित कई राज्यों से इलाज की उम्मीद लेकर आए मरीजों ने सरकारी स्वास्थ्य व्यवस्था की पोल खोली

  • एनजीओ शिविरों में भी जगह सीमित, बाहर की महंगी दवाइयों और लंबे इलाज को लेकर मरीजों की गंभीर शिकायतें

  • 15 मार्च के बाद अस्थायी शिविरों का भविष्य अनिश्चित, सरकार की दीर्घकालिक योजना पर बड़े सवाल

दिल्ली एम्स के बाहर मरीजों की लम्बी कतार का होना और एम्स के गेट के बाहर मरीजों और उनके परिजनों को हो रही समस्या दिल्ली की व्यवस्था पर लगातार प्रश्न खड़े कर रहा है। देश के अन्य राज्यों से मरीजों का और उनके परिजनों का इलाज की उम्मीद लेकर दिल्ली आना उनका शौक नहीं मज़बूरी है। पिछले दिनों दिल्ली एम्स के गेट से भारी संख्या में मरीजों और उनके परिजनों को खुले आसमान के नीचे ठंड की रात्रि में सोते हुए देखा गया था। दिल्ली सरकार इस मामले में सवालों के घेरे में दिखी। जनता की तरफ से बहुत सारे सवाल खड़े किये जाने लगे। हालांकि, सरकार ने समस्या को संज्ञान में लेते हुए कुछ रैन बसेरा की व्यवस्था की है।

इसके बाद भी दिल्ली एम्स (AIIMS-Delhi) के बाहर मरीज और उनके परिजन रात को इतनी कड़ाके की ठण्ड में रहने के लिए मजबूर है। उनकी क्या मजबूरियां हैं ,क्या समस्या है इत्यादि प्रकार के समस्या को जानने के लिए न्यूज़ग्राम की तरफ़ से हमने रात में रिपोर्टिंग की। 28 जनवरी 2026 को हुई हमारी इस कवरेज में मरीजों और उनके परिजनों ने खुलकर अपने दर्द ,तकलीफ़ को बयां किया। उनकी जो समस्याए हैं उनको जानने के लिए हमने अलग -अलग बने हुए शिविरों का भी सर्वेक्षण किया गया। इसी क्रम में जब हम दिल्ली एम्स के बाहर सब-वे (Sub Way) के नीचे लेटे हुए लोगों से रूबरू हुए तो उन्होंने दिल्ली ठहरने में हो रही समस्या को हमारे साथ साझा किया। हमारे सवाल और उनके जवाब कुछ इस प्रकार थे ।

सवाल : आप इतनी ठण्ड में यहाँ कैसे रुके हुए हैं और यहाँ कितने समय से रुके हैं ?

मरीज (दिलीप कुमार ): क्या करें साहब ! हमारी मजबूरी है। यहाँ करीब एक महीने से रुके हुए हैं। अब इलाज कराना है तो यहाँ रुकना पड़ेगा। हमारी मज़बूरी है कि हम यहाँ रुके हुए हैं। न ही पैसा है हमारे पास कि किसी नज़दीक के प्राइवेट अस्पताल में इलाज़ करा सके। अपने घर से कुछ दूरी पर इलाज़ कराने के लिए प्राइवेट अस्पताल में गया था। वहां इतना महंगा इलाज था कि हमारे बस में नहीं था कि वहां रुककर इलाज करा सकें। अब यहीं उम्मीद लेकर आए हैं और अब यहीं से इलाज कराके जाना है। अपने यहाँ के सांसद रह चुके अजय मिश्रा टेनी के पास गए थे कि कुछ मदद मिल जाएगी परन्तु कोई फायदा नहीं हुआ और खली हाथ लौटना पड़ा। जिंदगी है जब तक प्रयास कर लेते हैं इलाज के लिए, नहीं तो फिर हमारे जैसे को कौन पूछने वाला है।

फिर आगे बढ़ने पर एक शख़्स ने अपने तकलीफों को इस तरीके से साझा किया।

सवाल : क्या नाम है आपका और कब से यहाँ पर इलाज के लिए रुके हुए हैं ?

निरंजन राय (मरीज के पिता) : जी हमारा नाम निरंजन राय है। हम बिहार (पूर्णिया ) से हैं। हम अपनी बेटी की इलाज के लिए यहाँ आए हैं। हमारी बेटी को कमर के नीचे हड्डी में समस्या थी। बेटी का इलाज साल 2021 से ही चल रहा है। पटना एम्स में सर्जरी असफल होने के बाद साल 2024 में इलाज के लिए आया था। 12 जनवरी 2026 को बच्ची का इलाज शुरू हो गया और 21 जनवरी को सफल सर्जरी हुई ,अभी थोड़ी राहत है। अब ठण्ड हो या गर्मी यहाँ हमको रुकना ही पड़ेगा,बच्ची के ज़िन्दगी का सवाल है भाई साहब ! बिटिया के लिए बहुत सहना पड़ेगा। इसके लिए दो रोटी कम खाना पड़े या फिर ठंडी की मार झेलनी पड़े। हमारी मज़बूरी को यहाँ कोई नहीं समझने वाला है।

फिर यहाँ से थोड़ी ही दूरी पर एस पी वाई एम (SPYM) नामक एन जी ओ (NGO) द्वारा संचालित कैंप में जाने पर मरीजो और उनके परिजनों ने अस्पताल के अंदर और बाहर की सारी सच्चाई बताई। जब हम कैम्प के अंदर गए तो सवाल और जवाब का क्रम कुछ इस प्रकार था -

सवाल : आपकी समस्या क्या है और आप यहाँ कैम्प में कब से हैं ?

मरीज : जी हमारा नाम विभा है। हम बिहार गया जिले से आए हैं। बहुत इंतज़ार के बाद एक साल बाद ऑपरेशन हुआ। डॉक्टर से अभी फिर मिलना है, इसके लिए 30 जनवरी तक रुकना है। पिछले दो महीने से यहीं हैं। ओपीडी (OPD) में काफी समय लग जाता है जिसकी वजह से दवा नहीं ले पाती हूँ। बाहर से दवा लेने में बहुत सारी समस्या होती है। कभी-कभी कुछ डॉक्टर बाहर की दवा लेने के लिए बोलते भी हैं। जो हमारी क्षमता से बाहर है।

वहीँ पर दूसरी महिला ने अपनी बात रखते हुए अस्पताल के अंदर की बहुत सारी बात बताई। उन्होंने अस्पताल की पोल खोल दी।

नीतू कुमारी (मरीज की पत्नी ) कहती हैं कि हमारा नाम नीतू कुमारी है। मेरे पति रामजी पंडित की इलाज चल रहा है। दो महीने इंतज़ार के बाद मेरे पति के मस्तिष्क का ऑपरेशन हुआ। डाक्टर कुछ दवा बाहर से लेने के लिए बोलते हैं जो बहुत महंगे होते हैं। हमारी समस्या डॉक्टर को बिलकुल नहीं दिखती है। इतना दूर आने के बाद ऑपरेशन हुआ और अब डॉक्टर (Doctor) बोल रहा है कि उसके हाथ में कुछ नहीं है। बताइये, जब यही बोलना था कि हाथ में कुछ नहीं है, तो ऑपेरशन क्यों किया डाक्टर ने। (रोते हुए) हम क्या करें हमारी कौन सुनेगा। किसके पास हम जाएं ? बाहर की दवा इतनी महँगी रहती है, ऊपर से डॉक्टर (Doctor) बोलता है कि अब उसके हाथ में कुछ नहीं है, इस दर्द को लेकर हम कहाँ जाएं ?

कुछ अन्य प्रतिक्रियाएं

इतने सारे लोगों के अतिरिक्त और भी बहुत सारे मरीजों और और उनके परिजनों से बात हुई। कुछ महिलाओं (सबवे के नीचे ) ने कहा की रात में रुकने के लिए ट्रामा सेंटर के पास कैम्प में जाने पर पता चलता है कि वहां पर सीट खली नहीं है। इसलिए उनको सब-वे के नीचे ही ठहरकर अगले दिन सुबह का इंतज़ार करना पड़ता है।

आयुष्मान कार्ड का पैसा लेने के चक्कर में डॉक्टर ने किया गलत ऑपरेशन

28 जनवरी की रात को कवरेज के दौरान न्यूज़ग्राम (NewsGram) की तरफ़ से ट्रामा सेंटर के पास कैम्प में जाने पर एक मरीज से मुलाकात हुई। साथ में मरीज के परिजन भी थे। मरीज के लड़के राजकुमार ने बताया कि बुलंदशहर में लक्ष्मी हॉस्पिटल में अपनी माँ को भर्ती किया था। लड़के की माँ को सिर्फ उल्टी हो रही थी। डॉक्टर ने गालब्लडर (Gallbladder) का ऑपरेशन कर दिया था। अब माँ की हालत बेहद ख़राब है, ऐसे में एम्स का ही रास्ता दिखा और चला आया। राजकुमार ने बताया कि इलाज होने के पश्चात् डॉक्टर के खिलाफ शिकायत दर्ज़ कराएंगे।

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क्या सरकार मरीजों की जिंदगी से खेल रही है?

वहीं, सीआरपीएफ कैम्प (CRPF Camp) के पास वाले शिविर की कहानी यह है कि सरकार की लापरवाही जब कुछ दिन पहले सामने आई तो मात्र दो से तीन दिन में ही शिविर को खड़ा किया गया है। यह शिविर 15 मार्च तक के लिए बनाया गया है। सवाल यह है कि 15 मार्च के बाद सरकार लोगों के लिए एम्स के पास व्यवस्था को लेकर कितना चिंतित है, क्योंकि मरीजों की संख्या एम्स के बाहर लगातार बढ़ती जा रही है। 15 मार्च के बाद दिल्ली सरकार क्या प्रारूप बना रही है। क्या दिल्ली सरकार 15 मार्च तक के लिए इस मामले में आंख मूंदकर सो जाएगी ?क्या दिल्ली सरकार 15 मार्च के बाद पुनः सवालों के घेरे में आने के लिए इंतज़ार करेगी ?

वहीं दूसरी तरफ़ कुछ अन्य से बात करने पर उन्होंने कहा है कि बिहार (Bihar) जैसे राज्य में स्वास्थ्य व्यवस्था का बुरा हाल है जिसकी वजह से उनको दिल्ली आना पड़ता है। यहाँ आने पर अलग-अलग तरीके की समस्याओं का सामना करना पड़ता है। 20 साल से बिहार जैसे राज्य में बीजेपी समर्थित NDA सरकार है। वहां की इस जर्जर व्यवस्था की ज़िम्मेदारी क्या भाजपा (BJP) लेने को तैयार है? वहीं दिल्ली में जितनी बार चुनाव होता है, हर चुनाव में बिहार और पूर्वांचल के लोगों के लिए अलग ही चुनावी अखाड़ा तैयार किया जाता है।

फिर चुनाव में अपने-अपने कामों के लिए दम्भ भरने वाली पार्टियां ऐसे मुद्दों पर आंख मूंद लेती हैं। हर पांच साल पर लोकसभा चुनाव में देश के अलग-लग राज्यों में एम्स जैसे हॉस्पिटल का वादा करने वाली सरकारों से सवाल है कि अगर अन्य राज्यों में व्यवस्था अच्छी है, तो फिर दिल्ली एम्स के बाहर कतार में कौन खड़ा है ?

एक तरफ देश में चुने हुए 543 सांसदों के पंचायत करने हेतु नया संसद भवन बनकर तैयार हो गया, वहीं दूसरी तरफ आम जनता सड़कों पर सोने के लिए मज़बूर है। यह लोकतंत्र का कौन सा कालखण्ड है, जिसमें जनता के द्वारा चुनी गई सरकार के राज में जनता जमीन पर बिखरी पड़ी है।

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