राजधानी दिल्ली के जंतर-मंतर (Delhi' s Jantar Mantar) पर पिछले 26 दिनों से जारी छात्रों का आंदोलन आखिरकार एक बड़े राजनीतिक मोड़ पर पहुंच गया है। अभी हाल ही में 24 जुलाई को छात्रों के साथ खड़े सोनम वांगचुक (Sonam Wangchuk) ने अपना आमरण अनशन खत्म किया था लेकिन जंतर मंतर पर एक ही आवाज़ गूंज रही थी धर्मेंद्र प्रधान (Dharmendra Pradhan) का रेजिग्नेशन। आखिरकार छात्रों की जीत हुई और NEET-UG तथा अन्य प्रतियोगी परीक्षाओं में हुए पेपर लीक विवाद के बीच चौतरफा घिरे केंद्रीय शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान (Dharmendra Pradhan) ने अपने पद से इस्तीफा दे दिया है।
धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफे के बाद यह माना जा रहा है कि जंतर-मंतर पर पिछले तीन हफ्तों से छाए तनाव के बादल अब छंटेंगे और छात्रों का आंदोलन एक तार्किक मोड़ पर पहुंचेगा। भारतीय राजनीति का इतिहास गवाह रहा है कि जब भी जनता, छात्रों या देश की सड़कों पर आक्रोश का ज्वार उठा है, तब-तब सत्ता के गलियारों में बैठे बड़े से बड़े दिग्गजों को अपनी कुर्सी छोड़नी पड़ी है। तो लिए आज हम उन्हें बड़े नेताओं के बारे में जानेंगे जिन्होंने अपने पद से इस्तीफा दे दिया।
भारतीय राजनीति में नैतिक इस्तीफे की जब भी बात होती है, पूर्व प्रधानमंत्री लाल बहादुर शास्त्री (Former Prime Minister Lal Bahadur Sashtri) का नाम सबसे ऊपर आता है। 1956 में तमिलनाडु के अरियालूर (Ariyalur, Tamil Nadu) में एक भीषण रेल दुर्घटना हुई थी, जिसमें 140 से अधिक लोगों की जान चली गई थी। हालांकि यह हादसा तकनीकी कारणों से हुआ था, लेकिन तत्कालीन रेल मंत्री शास्त्री जी ने इसे अपनी व्यक्तिगत और नैतिक विफलता माना। संसद और देश भर में उठे सवालों के बाद उन्होंने तत्कालीन प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू को अपना इस्तीफा सौंप दिया। उनका यह कदम भारतीय लोकतंत्र में जवाबदेही का सबसे बड़ा उदाहरण बना।
1962 के भारत-चीन युद्ध में भारत को मिली अप्रत्याशित हार के बाद देश भर में भारी गुस्सा और आक्रोश था। तत्कालीन रक्षा मंत्री वी.के. कृष्ण मेनन (Defence Minister V.K. Krishna Menon) पर सेना की तैयारियों में कमी, आधुनिक हथियारों की अनदेखी और रणनीतिक चूकों के गंभीर आरोप लगे। संसद से लेकर सड़कों तक उनके खिलाफ भारी विरोध प्रदर्शन हुए। जनता और विपक्षी दलों के जबरदस्त दबाव के आगे झुकते हुए आखिरकार रक्षा मंत्री कृष्ण मेनन को युद्ध के तुरंत बाद अपने पद से इस्तीफा देना पड़ा था।
1980 के दशक के अंत में जब स्वीडिश तोप बोफोर्स सौदे में दलाली और भ्रष्टाचार के आरोप सामने आए, तो देश की राजनीति में भूचाल आ गया। तत्कालीन रक्षा मंत्री विश्वनाथ प्रताप सिंह (Vishwanath Pratap Singh) ने सरकार के भीतर से ही भ्रष्टाचार के खिलाफ आवाज उठाई। जब सरकार में उनकी अनदेखी हुई और देश भर में भ्रष्टाचार के खिलाफ विरोध प्रदर्शन तेज हो गए, तो उन्होंने अप्रैल 1987 में रक्षा मंत्री के पद से इस्तीफा दे दिया। वी.पी. सिंह (V.P Singh) का यह इस्तीफा आगे चलकर राजीव गांधी सरकार के पतन का मुख्य कारण बना।
नीतीश कुमार (Nitish Kumar) ने अगस्त 1999 में रेल मंत्री के पद से इस्तीफा दिया था। उस समय देश के प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी थे। 2 अगस्त 1999 को पश्चिम बंगाल के गैसल (Gaisal) रेलवे स्टेशन पर अवध-असम एक्सप्रेस और ब्रह्मपुत्र मेल के बीच भीषण आमने-सामने टक्कर हो गई थी। इस हादसे में 290 से अधिक लोगों की मौत हो गई थी। इस दुखद घटना से आहत होकर नीतीश कुमार ने इसे रेलवे की लापरवाही माना और नैतिक जिम्मेदारी लेते हुए 3 अगस्त 1999 को अपने पद से इस्तीफा दे दिया। प्रधानमंत्री वाजपेयी ने शुरुआत में इस्तीफा स्वीकार नहीं किया था, लेकिन उनके भारी आग्रह पर बाद में इसे मंजूर कर लिया गया।
26 नवंबर 2008 को मुंबई में हुए भीषण आतंकी हमले (26/11) ने पूरे देश को हिलाकर रख दिया था। इस हमले के बाद देश भर में सुरक्षा व्यवस्था और खुफिया तंत्र की नाकामी को लेकर अभूतपूर्व जन-आक्रोश देखने को मिला। जनता और मीडिया के तीखे सवालों के बीच तत्कालीन गृह मंत्री शिवराज पाटिल (Shivraj Patil) पर प्रशासनिक ढिलाई के गंभीर आरोप लगे। चौतरफा दबाव और जनता के भारी गुस्से को देखते हुए 30 नवंबर 2008 को शिवराज पाटिल को अपने पद से त्यागपत्र देना पड़ा।
साल 2010 में नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक (CAG) की रिपोर्ट में 2G स्पेक्ट्रम आवंटन में 1.76 लाख करोड़ रुपये के संभावित नुकसान का खुलासा हुआ। इस खुलासे के बाद संसद की कार्यवाही महीनों तक बाधित रही और देश भर में विपक्षी दलों व जनता ने उग्र प्रदर्शन किए। तत्कालीन टेलीकॉम मंत्री ए. राजा (A. Raja) के खिलाफ जांच की मांग को लेकर सड़कों पर संग्राम छिड़ गया। आखिरकार, केंद्र सरकार और पार्टी के भारी दबाव के बाद नवंबर 2010 में ए. राजा को अपने पद से इस्तीफा देना पड़ा और बाद में उन्हें कानूनी कार्रवाई का सामना भी करना पड़ा।
सितंबर 2020 में केंद्र सरकार द्वारा लाए गए तीन नए कृषि कानूनों के खिलाफ पंजाब और हरियाणा में किसानों का तीव्र विरोध-प्रदर्शन शुरू हुआ। उस समय हरसिमरत कौर (Harsimrat Kaur) बादल मोदी सरकार में शिरोमणि अकाली दल (SAD) की एकमात्र केंद्रीय खाद्य प्रसंस्करण उद्योग मंत्री थीं। किसान संगठनों को डर था कि इन कानूनों से न्यूनतम समर्थन मूल्य (MSP) और मंडी व्यवस्था खत्म हो जाएगी। अकाली दल का मुख्य जनाधार पंजाब के किसान थे। किसानों के व्यापक आंदोलन, जन-दबाव और अपनी ही राज्य की जनता के विरोध का सामना करने के कारण, संसद में विधेयक पारित होने के दौरान उन्होंने 17 सितंबर 2020 को अपने पद से इस्तीफा दे दिया।
वर्ष 2026 में NEET-UG और अन्य राष्ट्रीय प्रतियोगी परीक्षाओं में हुए ऐतिहासिक पेपर लीक कांड ने देश के करोड़ों छात्रों और उनके अभिभावकों को सड़कों पर ला खड़ा किया। जंतर-मंतर पर प्रसिद्ध इनोवेटर सोनम वांगचुक के 20 दिनों के आमरण अनशन और छात्रों के राष्ट्रव्यापी आंदोलन ने सरकार की नीव हिला दी। परीक्षा प्रणाली की नाकामी और छात्रों के टूटते भविष्य की नैतिक जिम्मेदारी लेते हुए आखिरकार केंद्रीय शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान को अपने पद से इस्तीफा देना पड़ा।
इतिहास इस बात का प्रमाण है कि लोकतंत्र में जनता की आवाज ही सबसे बड़ी ताकत होती है। चाहे रेल दुर्घटना हो, सुरक्षा में चूक हो, वित्तीय घोटाला हो या फिर युवाओं के भविष्य से जुड़ा पेपर लीक मामला जब जन-आक्रोश अपनी सीमा पार करता है, तो नैतिक और राजनीतिक दबाव के आगे सत्ता को झुकना ही पड़ता है। धर्मेंद्र प्रधान का इस्तीफा भी भारतीय लोकतंत्र के इसी अध्याय की एक नई कड़ी है। [SP]