साल 2026 में देश में होने वाले पांच राज्यों के चुनाव ने भारतीय राजनीति को एक खास चर्चा का विषय बना दिया है| इन सबमें पश्चिम बंगाल (West Bengal) के चनाव ने भारतीय राजनीति को एक उम्मीद भरे मोड़ पर लाकर खड़ा कर दिया है| कभी वामपंथ का गढ़ रहा पश्चिम बंगाल अब ममता बनर्जी (Mamta Banerjee) के माँ-माटी-मानुष से गुंजायमान है| बीजेपी जैसी पार्टी के लिए बंगाल का चुनाव उनके नाक का सवाल बनकर खड़ा हो गया है, क्योंकि बीजेपी का विजय रथ बार-बार वेस्ट बंगाल के चुनाव में ममता बनर्जी के समक्ष नतमस्तक होता जा रहा है ,जैसा की विगत चुनावों से ज्ञात है |
कभी एक मंच पर रहने वाले दल आज कैसे एक दूसरे के धुर विरोधी हो गए तथा कभी नैतिकता के नाम पर अटल बिहारी वाजपेयी को समर्थन देनी वाली ममता बनर्जी के स्वर कैसे बीजेपी के लिए तीखे होते गए, यह ममता बनर्जी तथा बीजेपी के रिश्तों के क्रमिक परिवर्तन का इतिहास रहा है| ममता बनर्जी (Mamta Banerjee) ने वैसे तो अपने राजनीतिक सफर को कांग्रेस के रथ पर सवार होकर प्रारम्भ किया था, परन्तु बंगाल में कांग्रेस के वामपंथ से लड़ने के तरीके तथा नेतृत्व को लेकर उठे सवालों ने ममता को कांग्रेस से अलग होने पर मजबूर किया |बाद में भारतीय राजनीति में एक नए अध्याय को बंगाल की तरफ से जोड़ दिया |
ममता बनर्जी ने कांग्रेस और बीजेपी के चौराहों को पार करके बंगाल की राजनीति में विजय का जो विशाल स्तम्भ स्थापित किया है, आज इसी यात्रा को समझेंगे और पश्चिम बंगाल की जनता के दृष्टिकोण को समझने का प्रयास करेंगे और जानेंगे की क्यों ममता के विजय स्तम्भ पर लगातार प्रश्न खड़े हो रहे हैं |
ममता बनर्जी (Mamta Banerjee) ने अपने राजनीतिक जीवन की शुरुआत कांग्रेस पार्टी से की थी और 1974 तथा उस दौर के प्रखर समाजवादी नेता जय प्रकाश नारायण की कलकत्ता यात्रा के दौरान उनके कार के बोनट पर चढ़कर विरोध किया|बाद में कांग्रेस के बंगाल रणनीति पर असहमति होने से कांग्रेस से इस्तीफा दिया|फिर अपनी पार्टी बनाकर उस समय की ज्योति बसु की वामपंथी सरकार की दीवार से टकरा गयीं और उस समय की वामपंथी दीवार को ध्वस्त कर दिया |
साल 1999 में अटल जी को जब समर्थन की जरुरत पड़ी तो ममता, अटल जी की बड़ी ख़ास बनकर भारतीय राजनीति में उभरकर सामने दिखाई दी थीं। ममता बनर्जी (Mamta Banerjee) ने उस समय की NDA सरकार में रेलवे मिनिस्टर पद का स्वाद भी पहली बार चखा , बाद में पेट्रोल की कीमतों में उछाल से परेशान होकर अटल जी के नेतृत्व को इंकार कर दिया और NDA से अलग हो गयी |
एक बार पुनः 2003 में NDA को समर्थन दिया ,यह समर्थन 2004 तक रहा और फिर ममता और NDA के रास्ते बिल्कुल अलग हो गए |
साल 2011 में पश्चिम बंगाल में वामपंथ की दीवार को धराशायी करके विजय स्तम्भ स्थापित किया|इसी विजय स्तम्भ को बीजेपी कई बार धराशायी करने का प्रयास कर चुकी है परन्तु अभी तक यह विजय स्तम्भ अविभंजनीय साबित हुआ है।
ममता (Mamta Banerjee) के इस विजय स्तम्भ पर बहुत सारे प्रश्न विपक्षी दलों ने खड़े कर दिए हैं। कई बार जनता से भी ममता का आमना सामना हुआ है, पर ममता ने संभालने का प्रयास किया है। इस चुनाव में यह देखना दिलचस्प रहेगा कि क्या पश्चिम बंगाल की जनता अभी भी उसी दीदी को सत्ता की कमान सौंपती है या बंगाल इस बार परिवर्तन का रुख़ अख्तियार करता है।
कई राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि ममता बनाम मोदी के चुनाव में जो परिणाम निकलकर सामने आएंगे उससे देश की राजनीति को एक नयी दिशा मिलेगी | पिछले कई आयोजनों तथा कई अवसरों पर ममता को इंडिया गठबंधन की कमान सौंपने की बात भी बहुत सारे वरिष्ठ नेताओं तथा घटक दलों की तरफ से की जा चुकी है।
भारतीय राजनीति के भविष्य का पन्ना इंतज़ार कर रहा है कि ममता बनर्जी (Mamta Banerjee) के बंगाल की राजनीति की गूंज, दिल्ली के राजनीतिक गलियारों तक पहुंच पाती है, या फिर दिल्ली तथा बिहार से उठी बीजेपी की लहर ममता की राजनीति को बंगाल की खाड़ी में विलीन कर देगी|
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