भारत पर टैंक लेकर हमला करने आ रहा था चीन, मगर मोदी सरकार ने सेना के बांधे हाथ, राहुल गाँधी ने खोली पोल wikimedia commons
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भारत पर टैंक लेकर हमला करने आ रहा था चीन, मगर मोदी सरकार ने सेना के बांधे हाथ, राहुल गाँधी ने खोली पोल

लोकसभा में 2 फरवरी 2026 को राहुल गाँधी ने जब से जनरल नरवणे की किताब को सदन में बहस का मुद्दा बनाया है, तब से जनरल नरवणे एक बार फिर से चर्चा का विषय बन गए हैं।

Author : Pradeep Yadav
Reviewed By : Mayank Kumar

  • संसद में नरवणे की किताब को लेकर टकराव: राहुल गांधी ने लोकसभा में जनरल मुकुंद नरवणे के लद्दाख संस्मरण का हवाला देना चाहा, लेकिन किताब के अप्रकाशित होने का हवाला देकर राजनाथ सिंह, अमित शाह और स्पीकर ओम बिरला ने चर्चा की अनुमति नहीं दी, जिससे सदन में तीखी बहस हुई।

  • कैलाश रेंज–लद्दाख घटना का खुलासा: Caravan मैगज़ीन में प्रकाशित अंश के अनुसार 31 अगस्त 2020 की रात चीन के टैंक कैलाश रेंज के पास भारतीय ठिकानों से कुछ सौ मीटर दूर पहुंच गए थे, स्पष्ट राजनीतिक निर्देश न मिलने पर निर्णय की पूरी जिम्मेदारी तत्कालीन सेना प्रमुख नरवणे पर आ गई थी।

  • 1996 समझौते और नरवणे की भूमिका: भारत-चीन के 1996 समझौते के कारण LAC पर हथियारों के इस्तेमाल पर रोक थी; ऐसे में नरवणे ने हालात की गंभीरता को देखते हुए गोली न चलाने का फैसला लिया, जिससे बड़ा सैन्य टकराव टल गया।

लोकसभा में 2 फरवरी 2026 को राहुल गाँधी ने जब से जनरल नरवणे की किताब को सदन में बहस का मुद्दा बनाया है, तब से जनरल नरवणे एक बार फिर से चर्चा का विषय बन गए हैं। राहुल गाँधी ने लोकसभा में स्पीकर के समक्ष जैसे ही नरवणे के लद्दाख संस्मरण का ज़िक्र किया और यह कहा कि चीन की चार टैंक कैलाश रेंज से महज़ कुछ ही दूरी पर थ....... इसके आगे राहुल गाँधी कुछ कह पाते इससे पहले रक्षामंत्री राजनाथ सिंह अपनी सीट से उठ खड़े हुए और बहुत ही तल्ख़ लहज़े में कहा कि क्या यह पुस्तक प्रकाशित हुई है ? यदि यह पुस्तक प्रकाशित नहीं हुई है तो इस पुस्तक के ज़िक्र करने का कोई औचित्य नहीं है।

दूसरी तरफ गृह मंत्री अमित शाह (Amit Shah) अपने सीट से खड़े हुए और बहुत तल्ख़ लहज़े में पूछ कि क्या पुस्तक प्रकाशित हुई है? अगर यह पुस्तक प्रकाशित नहीं हुई है तो फिर इसपर कैसे चर्चा हो सकती है। दूसरी तरफ लोकसभा सांसद अखिलेश यादव ने कहा चीन का मुद्दा बहुत ही संवेदनशील है। नेताप्रतिपक्ष का यदि कोई सुझाव हो तो इन्हे पढ़ने देना चाहिए। संसद की दीवारों के बीच कुछ इस तरीके से देश के जनप्रतिनिधियों की तीखी बहस और नोकझोंक देखने को मिली।

क्या है पूरा मामला ?

दरअसल भारतीय जनता पार्टी (BJP) के सांसदों ने कांग्रेस पार्टी के देशभक्ति पर सवाल खड़ा किया था। बातों को कुछ इस तरीके से कहा गया था कि कांग्रेस पर देश विरोधी होने का आरोप लग रहा था। इसके जवाब में राहुल गाँधी (Rahul Gandhi) ने सदन के पटल पर जनरल मुकुंद नरवणे के संस्मरण को रखने की कोशिश की थी, जिसे एक मैगज़ीन में छापा गया था, जिसका नाम कारवां है।

राहुल गाँधी (Rahul Gandhi) ने जैसे ही कैलाश रेंज का नाम लेते हुए नरवणे के संस्मरण को पढ़ने की कोशिश की, सत्तापक्ष की तरफ से राजनाथ सिंह, अमित शाह तथा अन्य सांसदों ने विरोध किया और किताब के प्रकाशित न होने का हवाला देते हुए कहा कि इस बात का ज़िक्र ऐसे नहीं किया जा सकता। वहीं लोकसभा अध्यक्ष ओम बिड़ला ने कहा कि इस तरीके के किसी मैगज़ीन या अन्य वस्तु का ज़िक्र नहीं किया जा सकता जिनका सदन की कार्यवाही से कुछ भी सम्बन्ध नहीं है।

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क्या था मैगज़ीन में,जो बना बवाल का कारण ?

बता दें कि कारवां मैगज़ीन (Caravan Magazine) में पूर्व सेना प्रमुख की किताब के एक अंश का ज़िक्र था, जिसमें चीन द्वारा कैलाश रेंज के पास की जा रही गतिविधियों पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी (Narendra Modi) और रक्षामंत्री राजनाथ सिंह से नरवणे की बातचीत का ज़िक्र है। मैगज़ीन के अनुसार, नरवणे ने लेफ्टिनेंट जनरल योगेश जोशी, जो भारतीय सेना की नॉर्दर्न कमांड के प्रमुख हैं, को 31 अगस्त 2020 को रात 8.15 बजे एक फोन कॉल आया। उन्हें जो जानकारी मिली, उससे वे चिंतित हो गए। इन्फैंट्री के सपोर्ट से चार चीनी टैंक पूर्वी लद्दाख में रेचिन ला की ओर एक खड़ी पहाड़ी के रास्ते आगे बढ़ने लगे थे।

जोशी ने इस मूवमेंट की जानकारी आर्मी चीफ जनरल मनोज मुकुंद नरवणे को दी, जिन्होंने तुरंत स्थिति की गंभीरता को समझ लिया। टैंक कैलाश रेंज पर भारतीय ठिकानों से कुछ सौ मीटर की दूरी पर थे।

यह एक रणनीतिक ऊंची जगह थी, जिस पर भारतीय सेना ने कुछ घंटे पहले ही कब्जा किया था। विवादित लाइन ऑफ एक्चुअल कंट्रोल- जो दोनों देशों के बीच असल सीमा है -के इस इलाके में ऊंचाई का हर मीटर रणनीतिक दबदबे में बदल जाता है।

भारतीय सैनिकों ने एक illuminating round फायर किया, जो एक तरह की चेतावनी थी। इसका कोई असर नहीं हुआ। चीनी आगे बढ़ते रहे। नरवणे ने भारत के राजनीतिक और सैन्य प्रतिष्ठान के नेताओं को ताबड़तोड़ फोन करना शुरू कर दिया, जिनमें रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह; राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार अजीत डोभाल; चीफ ऑफ डिफेंस स्टाफ जनरल बिपिन रावत; और विदेश मंत्री एस जयशंकर शामिल थे।

'फोर स्टार्स ऑफ डेस्टिनी' में नरवणे लिखते हैं, 'मेरा हर किसी से एक ही सवाल था, 'मेरे लिए आदेश क्या हैं?'

स्थिति तेजी से बिगड़ रही थी और स्पष्टता की जरूरत थी। मौजूदा प्रोटोकॉल के मुताबिक नरवणे को साफ आदेश थे कि "जब तक ऊपर से मंजूरी न मिले, तब तक गोली न चलाएं।" ऊपर से कोई स्पष्ट निर्देश नहीं आए।

मिनट बीतते गए। रात 9.10 बजे, लेफ्टिनेंट जनरल जोशी ने फिर फोन किया। चीनी टैंक आगे बढ़ते हुए दर्रे से एक किलोमीटर से भी कम दूरी पर आ गए थे। रात 9.25 बजे, नरवणे ने राजनाथ को फिर फोन किया, "स्पष्ट निर्देशों" के लिए पूछा। कोई निर्देश नहीं मिला।

इसी बीच, PLA कमांडर, मेजर जनरल लियू लिन का एक मैसेज आया। उसने हालात को शांत करने का एक प्रस्ताव दिया; दोनों पक्षों को आगे बढ़ना बंद कर देना चाहिए और अगले दिन सुबह 9.30 बजे, पास पर स्थानीय कमांडर अपने तीन-तीन प्रतिनिधियों के साथ मिलेंगे। यह एक उचित प्रस्ताव लग रहा था। एक पल के लिए ऐसा लगा कि कोई रास्ता निकल रहा है।

रात 10 बजे, नरवणे ने यही मैसेज देने के लिए राजनाथ और डोभाल को फोन किया। दस मिनट बाद, नॉर्दर्न कमांड ने फिर से फोन किया। चीनी टैंक नहीं रुके थे। वे अब टॉप से ​​सिर्फ पांच सौ मीटर दूर थे।

नरवणे को याद है कि लेफ्टिनेंट जनरल जोशी ने कहा था कि "चीनी सेना को रोकने का एकमात्र तरीका हमारी अपनी मीडियम आर्टिलरी से फायरिंग करना था, जो तैयार थी और आदेश का इंतजार कर रही थी।"

पाकिस्तान के साथ लाइन ऑफ कंट्रोल पर आर्टिलरी की लड़ाई आम बात थी, जहां डिवीजनल और कोर कमांडरों को ऊपर किसी से पूछे बिना हर दिन सैकड़ों राउंड फायर करने का अधिकार दिया गया था। लेकिन यह चीन था। यहां बात अलग थी। PLA के साथ आर्टिलरी की लड़ाई बहुत नाजुक स्थिति में बदल सकती थी।

"मेरी स्थिति नाज़ुक थी," नरवणे लिखते हैं। 'कमांड -जो सभी संभावित तरीकों से फायरिंग शुरू करना चाहता था' और 'एक सरकारी समिति -जिसने अभी तक स्पष्ट आदेश नहीं दिए थे'। इनके बाच नरवणे फंसे हुए थे। सेना मुख्यालय के ऑपरेशन रूम में, विकल्पों पर विचार किया जा रहा था और उन्हें खारिज किया जा रहा था। पूरा नॉर्दर्न फ्रंट हाई अलर्ट पर था।

टकराव की संभावित जगहों पर नज़र रखी जा रही थी। लेकिन फैसले का पॉइंट रेचिन ला था। नरवणे ने रक्षा मंत्री को एक और फोन किया, जिन्होंने वापस फोन करने का वादा किया। समय बीतता गया। हर मिनट, चीनी टैंक टॉप पर पहुंचने के एक मिनट करीब आ रहे थे।

राजनाथ सिंह ने रात 10.30 बजे वापस फोन किया। उन्होंने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से बात की थी, जिनके निर्देश एक ही वाक्य में थे: "जो उचित समझो, वह करो" यानी 'जो आपको ठीक लगे, वह करो'।

यह 'पूरी तरह से एक सैन्य फैसला' होने वाला था। मोदी से सलाह ली गई थी। उन्हें ब्रीफ किया गया था। लेकिन उन्होंने फैसला लेने से मना कर दिया था। नरवणे याद करते हैं कि "मुझे एक गर्म आलू पकड़ा दिया गया था और अब पूरी ज़िम्मेदारी मुझ पर थी।"

बता दें कि चीन (China) और भारत के बीच 1996 में समझौता हुआ था कि चीन-भारत बॉर्डर (LAC ) पर एक दूसरे के ख़िलाफ़ किसी भी प्रकार के गोली, बंदूक, तोप, मिसाइल, विस्फोटक हथियारों का इस्तेमाल नहीं किया जाएगा। अगर उस समय विवाद सैन्य हथियारों (गोली, बंदूक, तोप, मिसाइल, विस्फोटक हथियारों) में तब्दील हो जाता तो परिदृश्य काफी भयानक हो सकती थी। नरवणे के अनुसार, उन्होंने खुद से निर्णय लेते हुए पहले गोली न चलाने का आदेश अपनी सेना को दिया।

कौन हैं मनोज मुकुंद नरवणे ?

मनोज मुकुंद नरवणे (Manoj Mukund Naravane) भारतीय सेना के 28वें थलसेना अध्यक्ष (Chief of Army Staff) रहे हैं। उन्होंने 31 दिसंबर 2019 से 30 अप्रैल 2022 तक थलसेना प्रमुख के रूप में सेवा दी। वे 1980 बैच के अधिकारी थे और सिख लाइट इन्फैंट्री रेजिमेंट (Sikh Light Infantry Regiment) से उनका सम्बन्ध रहा है। नरवणे ने 31 दिसंबर 2019 से 30 अप्रैल 2022 तक यह पद संभाला। उन्होंने 2020 के गलवान घाटी संघर्ष के दौरान सेना प्रमुख की भूमिका निभाई थी।

पूर्वी लद्दाख, डोकलाम (2017) जैसे जटिल सैन्य मामलों को सुलझाने में काफी योगदान रहा है। मनोज मुकुंद नरवणे ने अपनी किताब (आत्मकथा ) फोर स्टार्स ऑफ़ डेस्टिनी (Four Stars of Destiny) लिखा है। यही किताब काफी समय से चर्चा में है। इस किताब में उन्होंने अग्नवीर योजना का भी ज़िक्र करते हुए बताने का प्रयास किया है कि इस फैसले के पक्ष में तीनों सेनाएं पूरी तरीके से तैयार नहीं थी।