बहुजन समाज पार्टी, जो कभी उत्तर प्रदेश की सबसे प्रभावशाली दलित-बहुजन शक्ति मानी जाती थी, आज अपने सबसे बुरे दौर से गुजर रही है। मायावती के नेतृत्व में 2007 में पूर्ण बहुमत की सरकार बनाने वाली बसपा के पास अब लोकसभा में एक भी सांसद नहीं है और यूपी विधानसभा में सिर्फ एक विधायक बचा है, जिससे उसके राष्ट्रीय पार्टी का दर्जा खतरे में पड़ गया है।
उत्तर प्रदेश की पूर्व मुख्यमंत्री मायावती की पार्टी बहुजन समाज पार्टी (बसपा) इस समय अपने सबसे कठिन और बुरे दौर से गुजर रही है। हालांकि तकनीकी रूप से अभी भी उसका राष्ट्रीय पार्टी का दर्जा बरकरार है। राजनीतिक गलियारों में आजकल इस बात की सबसे ज्यादा चर्चा हो रही है कि क्या बसपा से राष्ट्रीय पार्टी होने का दर्जा अब छिन सकता है। यह चर्चा तेज हो गई है क्योंकि पार्टी का राजनीतिक प्रभाव उत्तर प्रदेश सहित देश के अन्य राज्यों में लगातार घटता जा रहा है। गिरता जनाधार पार्टी के भविष्य पर गंभीर सवाल खड़े कर रहा है।
बहुजन समाज पार्टी के संस्थापक मान्यवर कांशीराम ने 14 अप्रैल 1984 के दिन दिल्ली से औपचारिक रूप से बहुजन समाज पार्टी के गठन का ऐलान किया था। बसपा के गठन से पहले कांशीराम ने 'डीएस-4' (DS4) नाम का एक मजबूत सामाजिक संगठन बनाया था और इसके माध्यम से पूरे देश में लगभग 7,000 से अधिक जनसभाएं की थीं। बहुजन समाज पार्टी को भारतीय राजनीति में एक नई पहचान मिले, इसके लिए उन्होंने पंजाब, उत्तर प्रदेश और देश के अन्य हिस्सों में विशेष चुनावी रणनीति बनाना शुरू कर दिया।
साल 1992 में बसपा का सपा से ऐतिहासिक गठबंधन हुआ। साल 1993 के उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव में बसपा को 67 सीटों पर शानदार सफलता हासिल हुई। इसके बाद कांशीराम ने मुलायम सिंह को सीएम के रूप में स्वीकार किया। हालांकि, वैचारिक मतभेदों के चलते इसके कुछ ही समय बाद साल 1995 में बसपा ने सरकार से अपना समर्थन वापस ले लिया।
गठबंधन टूटने के बाद साल 1995 में ही बीजेपी ने बसपा को अपना बाहर से समर्थन दिया और बसपा की तरफ से मायावती पहली बार उत्तर प्रदेश की मुख्यमंत्री बनीं। मायावती के मुख्यमंत्री बनने पर भारत के तत्कालीन प्रधानमंत्री नरसिम्हा राव ने इसे 'भारतीय लोकतंत्र का चमत्कार' बोला था। उन्होंने इस घटनाक्रम पर कहा था कि उत्तर प्रदेश जैसे सबसे बड़े राज्य का सीएम कोई दलित महिला बनी है, यह बहुत बड़ी बात है और यह किसी चमत्कार से कम नहीं है। इसके बाद से बीएसपी की नींव यूपी में सामाजिक और राजनैतिक तौर पर मजबूत होने लगी थी।
साल 2007 के यूपी विधानसभा चुनाव में बसपा ने अकेले 206 सीटें जीतकर पूर्ण बहुमत से अपनी सरकार बनाई और मायावती चौथी बार उत्तर प्रदेश की सीएम बनीं। हालांकि, इस सुनहरे दौर के बाद से बसपा का ग्राफ लगातार गिरता ही चला गया।
वर्तमान राजनीतिक स्थिति की बात करें तो आज संसद के निचले सदन (लोकसभा) में बसपा का एक भी सांसद नहीं है। खुद उत्तर प्रदेश विधानसभा में पार्टी के पास सिर्फ एक विधायक बचा है। इसके अलावा एक विधायक उत्तराखंड में और महज एक विधायक पंजाब में है।
जिस राजनीतिक दल का उत्तर प्रदेश में इतना विशाल जनाधार था और जिसे एक मजबूत राष्ट्रीय पार्टी का दर्जा प्राप्त हो, वह आज इतने बुरे दौर से गुजर रही है कि उसके अस्तित्व पर ही खतरा मंडरा रहा है। ऐसे में यह सवाल उठना लाजिमी है कि क्या बसपा से राष्ट्रीय पार्टी का दर्जा हमेशा के लिए छिन जाएगा।
भारतीय चुनाव आयोग (ECI) के 'चुनाव चिह्न (आरक्षण और आवंटन) आदेश, 1968' के तहत तय की गई कानूनी शर्तों के अनुसार कोई भी राजनीतिक दल अपना राष्ट्रीय पार्टी का दर्जा खो सकता है, यदि वह आयोग की तीन मुख्य शर्तों को पूरा नहीं करता है।
पहली शर्त: नियम के अनुसार, यदि कोई राजनीतिक दल देश के कम से कम चार राज्यों में 'क्षेत्रीय दल' (राज्य स्तरीय पार्टी) होने की जरूरी शर्तों पर खरा नहीं उतरता है, तो उसका राष्ट्रीय पार्टी का दर्जा समाप्त हो सकता है।
दूसरी शर्त: दूसरी शर्त यह है कि किसी भी राजनीतिक दल को राष्ट्रीय पार्टी का दर्जा बनाए रखने के लिए आम चुनाव में तीन अलग-अलग राज्यों से लोकसभा की कम से कम 2 प्रतिशत सीटें जीतना पड़ता है। लेकिन अगर कोई दल यह शर्त पूरा नहीं करता, तो राष्ट्रीय पार्टी का दर्जा खत्म किया जा सकता है।
तीसरी शर्त: इसके अलावा आयोग की तीसरी शर्त यह है कि किसी भी राजनीतिक दल को लोकसभा या विधानसभा चुनाव में कम से कम 4 राज्यों में कुल वैध वोटों का 6% वोट हासिल करना होता है। साथ ही साथ में लोकसभा की कम से कम 4 सीटें जीतनी होती हैं। यदि कोई राजनीतिक दल यह आंकड़ा छूने में असफल होता है, तो उसका राष्ट्रीय पार्टी का दर्जा समाप्त किया जा सकता है।
बता दें कि साल 2016 से पहले हर पांच साल पर चुनाव आयोग राजनीतिक दलों के प्रदर्शन की समीक्षा करता था। लेकिन साल 2016 में चुनाव आयोग ने एक बड़ा फैसला किया कि अब हर पांच साल के बजाय हर दस साल पर दलों के प्रदर्शन की समीक्षा की जाएगी। राजनैतिक गलियारों में यह कयास लगाए जा रहे हैं कि चुनाव आयोग जल्द ही इस समीक्षा कार्य को पूर्ण करके राजनीतिक दलों की एक नई संशोधित सूची जारी कर सकता है। यही कारण है कि बसपा सहित कुछ अन्य राष्ट्रीय पार्टियों के भविष्य और उनके अस्तित्व को लेकर राजनीतिक गलियारों में चर्चाओं का बाजार गर्म है।
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