महाराष्ट्र के बीड जिले में गन्ना खेतों में काम करने वाली हजारों महिलाओं द्वारा मजदूरी और आजीविका न रुके, मासिक धर्म व शारीरिक बाधाओं से बचने और कम उम्र में विवाह से उपजी समस्याओं के कारण बड़े पैमाने पर गर्भाशय निकलवाने की भयावह सच्चाई सामने आई है।  AI Generated
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गन्ने की मिठास में औरतों का खून: महाराष्ट्र के वो खेत जहाँ कोख काटकर फेंकी जाती है!

बीड की गन्ना मजदूर महिलाएं: मजदूरी और जीविका बचाने के लिए गर्भाशय तक कुर्बान, 13,861 ऑपरेशन ने उजागर की भयावह हकीकत

Author : Pradeep Yadav

  • महाराष्ट्र के बीड जिले में गन्ना खेतों में काम करने वाली हजारों महिलाओं द्वारा मजदूरी और आजीविका न रुके, मासिक धर्म व शारीरिक बाधाओं से बचने और कम उम्र में विवाह से उपजी समस्याओं के कारण बड़े पैमाने पर गर्भाशय निकलवाने की भयावह सच्चाई सामने आई है। रिपोर्ट बताती है कि यह आर्थिक मजबूरी, स्वास्थ्य उपेक्षा और सामाजिक शोषण का संगठित रूप है।

महाराष्ट्र के बीड जिले से महिलाओं के स्वास्थ्य और उनकी स्थिति से जुड़ी एक ऐसी विचलित करने वाली खबर सामने आ रही है, जिसने सभ्य समाज की नींव हिला दी है। डॉ. नीलम गोर्हे की अध्यक्षता में गठित सात सदस्यीय टीम ने एक विस्तृत रिपोर्ट तैयार कर इस भयावह स्थिति का खुलासा किया है। यह रिपोर्ट राज्य में महिलाओं की दुर्दशा पर गहरा प्रकाश डालती है।

क्या है पूरा मामला?

दरअसल, जून 2019 में महाराष्ट्र विधानसभा द्वारा डॉ. नीलम गोर्हे की अध्यक्षता में सात सदस्यों वाली एक विशेष टीम का गठन किया गया था। इस टीम ने लगभग 140 पन्नों की अपनी रिपोर्ट में महिलाओं के बारे में जो खुलासे किए हैं, वे बेहद चिंतनीय हैं। रिपोर्ट के अनुसार, पिछले एक दशक में लगभग 13,861 महिलाओं का गर्भाशय निकाला गया। जिन महिलाओं का गर्भाशय निकाला गया है, उनमें से ज्यादातर की उम्र 35 से 40 वर्ष के बीच है। वहीं, कुछ ऐसी महिलाएं भी हैं जिनकी उम्र 30 वर्ष से कम है और वे भी इस प्रक्रिया से गुजरी हैं।

क्या है मजबूरी?

जब महिलाओं द्वारा गर्भाशय निकलवाने (Hysterectomy) की वजह को जानने की कोशिश की गई, तो इसके पीछे के सामाजिक और आर्थिक कारण सामने आए। डॉ. नीलम गोर्हे बताती हैं कि इन महिलाओं को गन्ने के खेत में काम करने के बदले मजदूरी मिलती है। अधिक काम करने के बदले अधिक पैसा मिलता है। प्रवासी गन्ना मजदूरों से हर साल यह वादा किया जाता है कि उन्हें 1 से 1.5 लाख रुपये मिलेंगे। ऐसे में महिलाओं को दिन में लगभग 12-12 घंटे काम करना पड़ता है। मासिक धर्म या अन्य शारीरिक बाधाओं के कारण काम न रुके, यही कारण है कि महिलाएं अपना गर्भाशय निकलवा देती हैं। हालांकि, ऐसा करने के कारण उन्हें बाद में कई गंभीर बीमारियों का सामना करना पड़ता है।

इसके अलावा, डॉ. नीलम गोर्हे के अनुसार, इस इलाके की महिलाओं का विवाह बहुत कम उम्र में ही कर दिया जाता है। कम उम्र में विवाह होने के कारण उन्हें कई शारीरिक समस्याओं का सामना करना पड़ता है। इन समस्याओं से निदान पाने के लिए भी महिलाएं अपना गर्भाशय निकलवा देती हैं।

रिपोर्ट में क्या निकलकर आया सामने

रिपोर्ट के अनुसार, बीड जिले में लगभग 82,309 महिलाओं से जमीनी स्तर पर बातचीत की गई, जिसमें यह पाया गया कि 13,861 महिलाओं ने अपना गर्भाशय निकलवा दिया है। जब उनसे यह पूछा गया कि क्या किसी दबाव में आकर उन्हें ऐसा करना पड़ता है, तो उन्होंने बताया कि उन पर किसी प्रकार का बाहरी दबाव नहीं दिया जाता, बल्कि वे स्वयं की इच्छा से ऐसा करती हैं ताकि उनकी आजीविका प्रभावित न हो।

इस पूरा मामला 2019 का है। इस पूरे मामले पर तत्कालीन फडणवीस सरकार में स्वास्थ्य मंत्री एकनाथ शिंदे ने यह बयान दिया था कि निजी अस्पतालों पर जांच बैठाई जाएगी। अगर डॉक्टरों ने ठेकेदारों के दबाव में आकर इस घटना को अंजाम दिया है तो उनपर सख्त कार्रवाई की जाएगी। 2019 में केंद्र की मोदी सरकार से जब मामले पर सवाल किया गया तो उन्होंने ‘राज्य का मामला है’ ऐसा बोलकर पल्ला झाड़ लिया। अभी तक इस मामले पर कोई विशेष कार्रवाई नहीं हुई है।

नारी शक्ति वंदन अधिनियम और जमीनी चुनौतियां

आज जब देश में 'नारी शक्ति वंदन अधिनियम' के माध्यम से महिला आरक्षण की बात हो रही है, ऐसे समय में इस प्रकार का सामाजिक संकट सामने आना कई गंभीर प्रश्न खड़े करता है। सवाल यह है कि क्या महज विधानसभा और लोकसभा में आरक्षण मिल जाने से इस तरह की बुनियादी और भयावह समस्याओं का समाधान हो जाएगा?

आलोचकों का तर्क है कि 'नारी शक्ति वंदन अधिनियम' जैसे कानून केवल राजनीतिक प्रतीकात्मकता (Tokenism) तक सीमित रह सकते हैं। यदि महिलाओं को आरक्षण मिल भी जाए, तो क्या बीड जैसे जिलों की वे महिलाएं सदन तक आसानी से पहुँच पाएंगी जो आज भी जागरूकता के अभाव और आर्थिक मजबूरी में अपनी देह को नुकसान पहुँचाने को विवश हैं? जब तक समाज के अंतिम पायदान पर खड़ी महिला की स्वास्थ्य सुरक्षा और आर्थिक स्वतंत्रता सुनिश्चित नहीं होती, तब तक ऐसे आरक्षण कानून इन शोषित महिलाओं के लिए केवल कागजी साबित होंगे। असली चुनौती इन महिलाओं को उस व्यवस्था से बाहर निकालने की है जहाँ उन्हें चंद रुपयों के लिए अपना मातृत्व और स्वास्थ्य दांव पर लगाना पड़ता है।

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