क्या कोई साधु परमाणु वैज्ञानिक बन सकता है? यह सवाल सुनते ही मन में जिज्ञासा भी जागती है और थोड़ा आश्चर्य भी होता है। आमतौर पर हम अध्यात्म और विज्ञान को दो अलग-अलग रास्ते मानते हैं, एक अंदर की दुनिया को समझने का, और दूसरा बाहरी दुनिया के रहस्यों को जानने का। लेकिन जब ये दोनों एक ही व्यक्ति के जीवन में मिल जाएं, तो कहानी साधारण नहीं रहती, बल्कि असाधारण बन जाती है।
यह कहानी है स्वामी ज्ञानानंद (Swami Jnanananda) की, जिन्होंने हिमालय की गहराइयों में वर्षों तक ध्यान और तपस्या की, और फिर उसी एकाग्रता और जिज्ञासा को लेकर विज्ञान की दुनिया में कदम रखा। उनकी यात्रा रहस्यमय भी है और प्रेरणादायक भी, क्योंकि उन्होंने साबित किया कि सच्चा ज्ञान किसी एक दिशा में सीमित नहीं होता। अध्यात्म और विज्ञान का यह अनोखा संगम ही उनकी कहानी को खास और यादगार बनाता है।
स्वामी ज्ञानानंद (Swami Jnanananda) का जन्म 5 दिसंबर 1896 को गोरगनामुडी (Goraganamudi) में हुआ था। उनका असली नाम भूपतिराजु लक्ष्मीनरसिंहा राजू था। बचपन से ही उनका मन सामान्य जीवन से ज्यादा अध्यात्म, वेदों और जीवन के गहरे रहस्यों को समझने में लगता था। 1916 में परिवार ने उनका विवाह कराया, लेकिन सांसारिक जीवन उन्हें ज्यादा समय तक बांध नहीं सका। 1917 में उन्होंने घर-परिवार छोड़ दिया और लुंबिनी (Lumbini) होते हुए हिमालय की यात्रा पर निकल पड़े। अगले लगभग 10 वर्षों तक उन्होंने ऋषिकेश, गंगोत्री, बद्रीनाथ और हिमालय के कई क्षेत्रों में योग, ध्यान और कठोर तपस्या की।
इसके बाद 1927 में वे जर्मनी (Germany) पहुंचे, जहां उन्होंने आध्यात्मिक प्रवचन दिए और साथ ही भौतिकी की पढ़ाई शुरू की। 1929 में उन्होंने ड्रेसडेन विश्वविद्यालय से गणित और भौतिकी की पढ़ाई पूरी की। इसके बाद वे 1930 में पुरुगवे गए, जहां एक्स-रे रिसर्च की और 1936 में डी.एससी. की उपाधि प्राप्त की।
द्वितीय विश्व युद्ध के दौरान वे यूनाइटेड किंगडम (United Kingdom) और बाद में संयुक्त राज्य अमेरिका (United States) गए, जहां उन्होंने परमाणु भौतिकी पर शोध किया। 1947 में भारत लौटकर उन्होंने देश में परमाणु विज्ञान की मजबूत नींव रखने में अहम योगदान दिया।
साल 1947 में स्वामी ज्ञानानंद (Swami Jnanananda) जब विदेश से वापस लौटे, तब देश आजादी के बाद अपने वैज्ञानिक भविष्य को आकार देने में जुटा था। ऐसे समय में उन्होंने राष्ट्रीय भौतिक प्रयोगशाला (National Physical Laboratory) में वरिष्ठ वैज्ञानिक अधिकारी के रूप में काम शुरू किया और भारत के शुरुआती वैज्ञानिक ढांचे को मजबूत करने में महत्वपूर्ण योगदान दिया।
साल 1954 में वे आंध्र विश्वविद्यालय (Andhra University) से जुड़े, जहां उनके जीवन का सबसे बड़ा वैज्ञानिक अध्याय शुरू हुआ। केवल दो वर्षों के भीतर, 1956 में उन्होंने विश्वविद्यालय में परमाणु भौतिकी विभाग की स्थापना कर इतिहास रच दिया। उस दौर में जब भारत वैज्ञानिक संसाधनों के मामले में अभी विकास के चरण में था, यह उपलब्धि बेहद खास थी। उन्होंने रेडिएशन रिसर्च लैब स्थापित कीं, छात्रों के लिए प्रायोगिक प्रशिक्षण शुरू किया और कई युवा वैज्ञानिकों को मार्गदर्शन दिया। उनके प्रयासों ने विश्वविद्यालय को भारत में परमाणु भौतिकी अनुसंधान का एक महत्वपूर्ण केंद्र बना दिया।
स्वामी ज्ञानानंद (Swami Jnanananda) का जीवन जितना प्रेरणादायक था, उनकी उपलब्धियां भी उतनी ही असाधारण रहीं। दिलचस्प बात यह है कि उन्हें भारत सरकार की ओर से पद्म श्री या पद्म भूषण जैसे बड़े नागरिक सम्मान मिलने का कोई आधिकारिक रिकॉर्ड नहीं मिलता, लेकिन विज्ञान, शिक्षा और शोध के क्षेत्र में उनके योगदान को राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर विशेष सम्मान मिला।
साल 1936 में उन्होंने चार्ल्स यूनिवर्सिटी (Charles University) से एक्स-रे स्पेक्ट्रोस्कोपी (X-Ray Spectroscopy) पर अपने महत्वपूर्ण शोध कार्य के लिए Doctor of Science (D.Sc.) की उपाधि प्राप्त की। यह उनके वैज्ञानिक जीवन की पहली बड़ी अंतरराष्ट्रीय उपलब्धि मानी जाती है, जिसने उन्हें विश्व वैज्ञानिक समुदाय में पहचान दिलाई। इसके बाद 1940 के दशक में उन्होंने लिवरपूल विश्वविद्यालय (University of Liverpool) में परमाणु भौतिकी और बीटा विकिरण (Beta Radiation) पर शोध किया और उच्च वैज्ञानिक प्रशिक्षण प्राप्त किया।
साल 1956 में आंध्र विश्वविद्यालय में उनके नेतृत्व में परमाणु भौतिकी विभाग (Nuclear Physics Department) की स्थापना हुई, जो अपने आप में एक बड़ी उपलब्धि थी। बाद में विश्वविद्यालय ने उनके सम्मान में रिसर्च सेंटर का नाम स्वामी ज्ञाननंद परमाणु अनुसंधान प्रयोगशालाएँ (Swami Jnanananda Laboratories of Nuclear Research) रखा। उनके निधन के बाद भी आंध्र प्रदेश में उनकी प्रतिमा स्थापित की गई और भारतीय विज्ञान में उनके योगदान को आज भी सम्मानपूर्वक याद किया जाता है।
स्वामी ज्ञानानंद (Swami Jnanananda) का निधन 21 सितंबर 1969 को हुआ था। उस समय उनकी उम्र लगभग 72 वर्ष थी। जीवन के अंतिम वर्षों में उन्होंने खुद को पूरी तरह विज्ञान, शोध और विद्यार्थियों के मार्गदर्शन के लिए समर्पित कर दिया था। आंध्र विश्वविद्यालय (Andhra University) में परमाणु भौतिकी के विकास में उनका योगदान लगातार जारी रहा। उनके जाने के साथ भारत ने एक ऐसे वैज्ञानिक-संत को खो दिया, जिसने आध्यात्म और विज्ञान दोनों दुनियाओं को एक साथ जीकर दिखाया। आज भी उनका नाम भारतीय वैज्ञानिक इतिहास में गहरे सम्मान के साथ लिया जाता है| [SP]