धरती की हलचल, सिस्मिक वेव्स और मापने की पूरी प्रक्रिया, जानें भूकंप का विज्ञान IANS
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धरती की हलचल, सिस्मिक वेव्स और मापने की पूरी प्रक्रिया, जानें भूकंप का विज्ञान

जापान में 7.5 तीव्रता और भारत के मणिपुर में 5.2 तीव्रता के हाल ही में आए भूकंप ने एक बार फिर लोगों का ध्यान इस प्राकृतिक घटना की ओर खींचा है। ऐसे में यह समझना जरूरी हो जाता है कि भूकंप आखिर होता क्या है, यह क्यों आता है और वैज्ञानिक इसे कैसे मापते हैं?

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जापान में 7.5 तीव्रता और भारत के मणिपुर में 5.2 तीव्रता के हाल ही में आए भूकंप ने एक बार फिर लोगों का ध्यान इस प्राकृतिक घटना की ओर खींचा है। ऐसे में यह समझना जरूरी हो जाता है कि भूकंप आखिर होता क्या है, यह क्यों आता है और वैज्ञानिक इसे कैसे मापते हैं?

भूकंप दरअसल पृथ्वी की सतह यानी क्रस्ट के अचानक हिलने को कहा जाता है। जब धरती के अंदर जमा ऊर्जा एकाएक बाहर निकलती है, तो जमीन में कंपन पैदा होता है, जिसे हम भूकंप के रूप में महसूस करते हैं। यह कंपन कभी हल्का तो कभी बेहद तेज हो सकता है, जिससे बड़े पैमाने पर नुकसान भी हो सकता है।

पृथ्वी की संरचना को समझना भूकंप के कारणों को जानने में मदद करता है। हमारी पृथ्वी चार मुख्य परतों से बनी है- क्रस्ट, मेंटल, बाहरी कोर और आंतरिक कोर। क्रस्ट और मेंटल का ऊपरी हिस्सा मिलकर एक ठोस परत बनाते हैं, जिसे लिथोस्फीयर कहा जाता है। यह परत एकसार नहीं होती, बल्कि कई बड़े-बड़े टुकड़ों में बंटी होती है, जिन्हें टेक्टोनिक प्लेट्स कहा जाता है।

ये प्लेट्स लगातार बहुत धीमी गति से खिसकती रहती हैं। जब ये प्लेट्स आपस में टकराती हैं, अलग होती हैं या एक-दूसरे के पास से गुजरती हैं, तो धरती के अंदर दबाव बढ़ता है। जब यह दबाव ज्यादा हो जाता है, तो चट्टानों में दरारें पड़ती हैं, जिन्हें फॉल्ट लाइन कहा जाता है। इसी फॉल्ट पर अचानक हलचल होने से भूकंप आता है।

भूकंप जिस स्थान से शुरू होता है, उसे एपिसेंटर यानी अधिकेंद्र कहा जाता है। सबसे तेज झटके इसी क्षेत्र के आसपास महसूस होते हैं, लेकिन इनका असर सैकड़ों किलोमीटर दूर तक भी पहुंच सकता है।

भूकंप के दौरान जो ऊर्जा निकलती है, वह तरंगों के रूप में फैलती है, जिन्हें सिस्मिक वेव्स कहा जाता है। ये तरंगें धरती के अंदर और सतह पर यात्रा करती हैं और अलग-अलग जगहों पर कंपन पैदा करती हैं। इन्हीं तरंगों के जरिए वैज्ञानिक भूकंप का अध्ययन करते हैं।

भूकंप को मापने के लिए सीस्मोमीटर नामक यंत्र का इस्तेमाल किया जाता है। यह उपकरण जमीन के भीतर होने वाली हलचल को रिकॉर्ड करता है और उसे ग्राफ के रूप में दिखाता है। इन रिकॉर्ड्स की मदद से वैज्ञानिक यह पता लगाते हैं कि भूकंप कब आया, उसका केंद्र कहां था और उसकी तीव्रता कितनी थी।

दिलचस्प बात यह है कि भूकंप सिर्फ पृथ्वी तक सीमित नहीं हैं। वैज्ञानिकों ने चंद्रमा और अन्य ग्रहों पर भी सिस्मिक गतिविधियों के संकेत पाए हैं। अमेरिकी स्पेस एजेंसी नासा के इनसाइट मिशन ने मंगल ग्रह पर सिस्मोमीटर भेजकर वहां होने वाले ‘मार्सक्वेक’ का अध्ययन किया है। इन अध्ययनों से वैज्ञानिकों को यह समझने में मदद मिल रही है कि अन्य ग्रहों की आंतरिक संरचना कैसी है।

वहीं, विशेषज्ञों का मानना है कि भूकंप को पूरी तरह रोकना संभव नहीं है, लेकिन इसके कारणों और पैटर्न को समझकर नुकसान को कम जरूर किया जा सकता है। जागरूकता और वैज्ञानिक अध्ययन ही इस प्राकृतिक आपदा से बचाव का सबसे बड़ा उपाय हैं। (MK)

(यह रिपोर्ट IANS न्यूज़ एजेंसी से स्वचालित रूप से ली गई है। न्यूज़ग्राम इस कंटेंट की कोई ज़िम्मेदारी नहीं लेता।)