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रमज़ान में होली मनाना पड़ा भारी? अकबर खान राणा के साथ रास्ते में हुआ बड़ा विवाद

कहतें हैं कि त्योहारों का कोई धर्म नहीं होता, त्यौहार तो बस खुशियां मनाने का एक जरिया है। कुछ ऐसा ही विचार रखते हैं भारतीय लिबरल पार्टी के महासचिव और वरिष्ठ नेता अकबर खान राणा।

Author : Sarita Prasad

कहतें हैं कि त्योहारों का कोई धर्म नहीं होता, त्यौहार तो बस खुशियां मनाने का एक जरिया है। कुछ ऐसा ही विचार रखते हैं भारतीय लिबरल पार्टी के महासचिव और वरिष्ठ नेता अकबर खान राणा। अब चूंकि एक तरफ मुस्लिम धर्म के लोगों के लिए रमजान का पावन महीना चल रहा है वहीं दूसरी तरफ हिंदू पर्व होली भी इसी बीच आ गई तो ऐसे में कई लोगों को लग रहा था कि शायद अकबर खान राणा रमजान के इस पवन महीने में होली की खुशियां नहीं मनाएंगे लेकिन उन्होंने बड़ी खुशी के साथ होली मना कर सभी को ग़लत साबित कर दिया। इतना ही नहीं होली के दौरान अकबर ख़ान राणा जी को एक बड़े ही अचंभित सी घटना का भी सामना करना पड़ा। आइए थोड़े विस्तार से जानतें इसके बारे में।

कौन हैं अकबर खान राणा?

जहां एक तरफ भारत में लोगों को हिंदू और मुस्लिम कहकर बांट दिया गया है वही अकबर खान राणा का विचार है की भारत में रहने वाला हर एक व्यक्ति भारतीय है उसे किसी धर्म या जाति से नहीं पहचाना जाना चाहिए बल्कि एक भारतीय होने से उसकी पहचान है। आपको बता दें कि अकबर खान राणा पत्रकारिता के क्षेत्र में एक बहुत बड़ा नाम है। इसके अलावा वह भारतीय लिबरल पार्टी के महासचिव भी हैं। अकबर खान राणा के विचार और उनकी सोच भारतीय समाज के लिए एक बड़े बदलाव लाने की ओर काम करता है। उन्होंने किसी एक धर्म की कट्टरता को ना करते हुए मनुष्य कल्याण और एक भारतीय होने की सोच पर हमेशा समर्थन जताया है।

कॉलेज में चढ़ा गुलाल का रंग

अकबर ख़ान राणा ने न्यूजग्राम को दिए साक्षात्कार में एक घटना के बारे में बताया। होली के क़रीब 3 दिन पहले अकबर खान राणा अपने बेटे जुनैद जो मेरठ में डॉक्टर की पढ़ाई कर रहें हैं, उन्हें होली त्यौहार के कारण घर वापस लाने पहुंचे। अब चूंकि होली का त्यौहार था तो कॉलेज की तरफ से होली का समारोह आयोजित किया गया था और डॉ जुनैद उस समारोह में शामिल थें। उन्होंने भी बड़े उत्साह से अपने सहपाठियों के साथ गुलाल का रंग लगाया। अकबर खान राणा और उनका परिवार बड़े ही खुले विचार के हैं। वे लोगों को खुशियां देना ही सबसे बड़ा धर्म मनातें है। लेकिन कहते हैं न कि हर किसी की सोच समान नहीं होती।

मेरठ से आते वक्त एक अजीब घटना घटी

जब अकबर खान राणा अपनी पत्नी और बेटे जुनैद के साथ मेरठ से वापस आ रहे थे तो वे एक होटल में खाना खाने के लिए ठहरे। तभी उनके समुदाय के कुछ लोग वहां पहुंचे और उन्होंने अकबर खान राणा को पहचान लिया, यहां तक कि उनके परिवार के बारे में भी उन्हें जानकारी थी। वे पॉलीटिकल बैकग्राउंड से संबंध रखते थे। पहले तो उन्होंने बड़े प्यार से बातचीत की लेकिन फिर उनकी नजर गाड़ी में बैठे अकबर खान राणा के बेटे डॉक्टर जुनैद पर पड़ी जिनके चेहरे पर गुलाल लगा था और तब उनके तेवर बदले और उन्होंने सवाल पूछना शुरू कर दिया। उनका मुख्य मुद्दा यह था कि रमजान के पावन अवसर पर वे होली का रंग कैसे लगा सकतें हैं?

पहले तो अकबर खान राणा ने उन्हें समझाने की कोशिश की और बताया कि इस्लाम में लोगों को खुशियां बांटना सिखाया गया है। इंसान के हर खुशी में शामिल होना सिखाया गया है न कि कट्टरता। उन्होंने समझाया कि इंसानियत भूखे को खाना खिलाने में है और हर धर्म में यह सिखाया जाता है। अकबर खान राणा के लाख समझाने पर भी जब बहस नहीं रुकी तो अकबर ख़ान ने उन लोगों के स्कॉलर से बात की, वे भी राणा को जानतें थें और उनकी बात हुई। आखिर में जिन लोगों ने बहस शुरू की थी, उन्होंने अकबर ख़ान राणा से माफ़ी मांगी और वहां से चले गए।

दिया भाईचारे का संदेश

अकबर ख़ान राणा ने बताया कि धर्म या जाति बड़ी नहीं होती है बल्कि इंसानियत बड़ी होती है। यदि एक इंसान दूसरे के काम आ जाए तो इस से बड़ा धर्म क्या है। अंत में अकबर खान राणा ने भाईचारे का संदेश दिया और बताया कि हम भारतीय हैं और हमें एक भारतीय होने से ही पहचान मिलनी चाहिए ना कि हमारे धर्म या जाति या फिर नाम से।