प्राचीन ग्रंथों में शरीर और मन की शुद्धि के लिए योग परंपरा का वर्णन मिलता है, उनमें पश्चिमोत्तानासन का विशेष स्थान है। यह आसन पूरे शरीर के पीछे वाले हिस्से यानी रीढ़, कमर और पैरों की मांसपेशियों को खींचकर लचीला बनाता है।
संस्कृत में 'पश्चिम' का अर्थ है, शरीर का पिछला हिस्सा, उत्तान का अर्थ खिंचाव होता है और आसन का अर्थ मुद्रा होता है। यानी यह आसन शरीर के पिछले हिस्से को गहराई से खींचता है।
इस आसन में हम बैठकर आगे की ओर झुकते हैं, जिससे पूरी रीढ़ की हड्डी, पेट के अंग और नसों पर सकारात्मक असर पड़ता है। यह आसन हठ योग की 12 मूल आसनों में गिना जाता है। उनके अनुसार, यह आसन पीठ और पैरों को अच्छा खिंचाव देता है और पाचन तंत्र को मजबूत बनाता है। यही नहीं, पेट की चर्बी को भी कम करता है।
आयुष मंत्रालय के अनुसार, पश्चिमोत्तानासन (बैठकर आगे झुकने वाला आसन) शरीर के पिछले हिस्से में तीव्र खिंचाव पैदा करता है। यह आसन पाचन अंगों को सक्रिय करता है, पेट की चर्बी घटाने में मदद करता है और रीढ़ की हड्डी को लचीला बनाता है।
इस आसन के नियमित अभ्यास से शरीर लचीला बनता है, कुंडलिनी ऊर्जा जागृत होने में मदद मिलती है। आयुर्वेद और आधुनिक विज्ञान दोनों ही इसे डायबिटीज, कब्ज और मानसिक तनाव दूर करने के लिए लाभकारी मानते हैं।
पश्चिमोत्तानासन करने का सबसे सही समय सुबह का माना गया है। अहले सुबह खाली पेट इस योगासन को करना सबसे अच्छा माना जाता है। यह शरीर को पूरे दिन ऊर्जावान और तनाव मुक्त बनाए रखने में मदद करता है। हालांकि, इस योगासन को शाम के समय भी खाने के 4-5 घंटे बाद किया जा सकता है लेकिन सुबह में इसे करना ज्यादा फायदेमंद बताया गया है। वहीं, शुरुआती समय में इसे किसी विशेषज्ञ की देखरेख में ही करने की सलाह दी गई है।
साथ ही, जिन्हें गंभीर पीठ दर्द, स्लिप डिस्क या हर्निया की समस्या हो, वे इसे न करें। पेट की सर्जरी या गंभीर चोट होने पर भी इस आसन से बचें।(VR)
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(यह रिपोर्ट IANS न्यूज़ एजेंसी से स्वचालित रूप से ली गई है। न्यूज़ग्राम इस कंटेंट की कोई ज़िम्मेदारी नहीं लेता।)