भारत एक कृषि प्रधान देश है और भारत में इसको लेकर चुनौतियां भी काफी हैं। इसी पर वर्तमान समस्याओं, एमएसपी (MSP) की मांग, हरित क्रांति के असमान प्रभाव, छुट्टा पशुओं की जमीनी हकीकत और नीति निर्माण में किसानों की भागीदारी जैसे अहम मुद्दों पर विस्तार से चर्चा की गई है। भारतीय अर्थव्यवस्था की रीढ़ कहे जाने वाले किसान आज भी कई बुनियादी और आर्थिक समस्याओं से जूझ रहे हैं।
जंतर-मंतर से लेकर देश की सड़कों तक किसान लगातार अपनी मांगों को लेकर मुखर रहे हैं। इन्हीं समसामयिक मुद्दों पर न्यूज़ग्राम (NewsGram) के पत्रकार प्रदीप यादव ने कृषि मामलों के अनुभवी पत्रकार रामजी मिश्रा से सीधी बातचीत की। प्रस्तुत हैं इस बातचीत के मुख्य अंश:-
प्रदीप: वर्तमान में भारत के किसान आर्थिक रूप से बहुत संपन्न नहीं हैं। काफी समय से एमएसपी (MSP) और किसान आंदोलन की बातें चल रही हैं। इस वर्तमान स्थिति पर आपकी क्या राय है?
रामजी: देखिए, मुख्य मसला यह है कि नीति निर्माता, सरकार या विपक्ष कई बार असली मुद्दे से भटक जाते हैं। कहावत है ना 'घायल की गति घायल जाने'। किसान का दर्द सिर्फ किसान ही समझ सकता है।
सबसे बड़ी खामी नीति निर्माण (Policy Making) प्रक्रिया में है। जो नीतियां बनाई जा रही हैं, क्या उनमें किसानों को शामिल किया गया? महंगाई बढ़ रही है, खेती की लागत बढ़ रही है, लेकिन नीति बनाते समय किसानों की व्यावहारिक चिंताओं को अनदेखा कर दिया जाता है।
जब तक आप उस वर्ग को प्रक्रिया में शामिल नहीं करेंगे, जिसके लिए नीति बन रही है, तब तक परिणाम बेहतर नहीं आ सकते। आंदोलन चाहे पंजाब-हरियाणा में हुआ हो या लखीमपुर-सीतापुर जैसे क्षेत्रों में, इसका असर पूरे देश की कृषि अर्थव्यवस्था पर पड़ता है। भारत का विकास किसान की उन्नति के बिना संभव नहीं है।
प्रदीप : हरित क्रांति के बाद पंजाब और हरियाणा के किसान आर्थिक रूप से काफी समृद्ध हुए, जबकि पूर्वांचल और बिहार के किसान पिछड़ गए। क्या इसका कारण वहां के किसानों का परंपरागत तरीकों से जुड़े रहना था या हरित क्रांति का लाभ हर जगह समान रूप से नहीं पहुंच पाया?
रामजी: क्रांति का मतलब है कि क्या तकनीक और साधन जन-जन तक और हर राज्य तक पहुंच पाए? और अगर पहुंचे, तो क्या वहां का किसान उन्हें अपनाने के लिए आर्थिक रूप से सक्षम था? पंजाब और हरियाणा आर्थिक रूप से तुलनात्मक रूप से मजबूत राज्य रहे हैं। पूर्वांचल और बिहार के कई इलाकों में जोत (भूमि का आकार) छोटी है और भौगोलिक चुनौतियाँ अलग हैं। उस दौर में बैंक से लोन या साधन जुटाना आज जितना आसान (ATM या मोबाइल ऐप जैसा) नहीं था। दूसरी बात, ट्रैक्टर और बिजली से खेती आसान तो हुई, लेकिन हमने हरित क्रांति के चक्कर में परंपरागत खेती और पशुपालन के संतुलन को खो दिया। अत्यधिक रासायनिक उर्वरकों (Chemical Fertilizers) के इस्तेमाल से आज कुछ राज्यों में कैंसर जैसी बीमारियों के आंकड़े बढ़ रहे हैं। आधुनिक तकनीक (जैसे ट्रैक्टर) खेत तो जोत सकती है, लेकिन मिट्टी को जैविक या देसी खाद नहीं दे सकती। इसके लिए पशुपालन बेहद अनिवार्य है।
प्रदीप: उत्तर प्रदेश और बिहार में छुट्टा/बेसहारा पशु किसानों की फसलें बर्बाद कर रहे हैं। किसान रात-रात भर जागकर खेत बचाने को मजबूर हैं। इस समस्या का क्या व्यावहारिक समाधान हो सकता है?
रामजी: यह समस्या भी अधूरी नीतियों का नतीजा है। पहले गांवों में बड़े-बड़े चरागाह (Grasslands), पोखर और तालाब होते थे। एक व्यक्ति पूरे गांव के 20-30 पशुओं को बाहर चरा लाता था। संयुक्त परिवार थे, तो श्रम की कमी नहीं थी। अब चरागाह खत्म हो गए, परिवार छोटे हो गए और बाजार में पशु आहार (Fodder) इतना महंगा हो गया है कि एक पशु का खान-पान इंसान के भोजन से महंगा पड़ रहा है।
जब किसान के लिए पशु का खर्च उठाना मुश्किल हो जाता है, तो वह मजबूरी में उसे छोड़ देता है। इसका समाधान केवल गौशालाएं खोलना नहीं है।
डायरेक्ट सपोर्ट: सरकार जैसे किसान सम्मान निधि देती है, वैसे ही सीधे पशुपालकों को वित्तीय सहायता (डायरेक्ट सब्सिडी) दे।
ऊर्जा और खाद में इस्तेमाल: यदि किसान को पशु के गोबर से बायोगैस और जैविक खाद का सीधा लाभ मिलेगा (जैसे पहले लोग बायोगैस से ईंधन और बिजली बचाते थे), तो वह पशु को कभी नहीं छोड़ेगा। पशु जब तक किसान के लिए आय का स्रोत नहीं बनेगा, तब तक छुट्टा पशुओं की समस्या बनी रहेगी।
प्रदीप: इतिहास में चौधरी चरण सिंह, महेंद्र सिंह टिकैत और मुलायम सिंह यादव जैसे बड़े किसान नेता उभरे। इसके बावजूद आज भी किसानों की दशा में बहुत बड़ा सकारात्मक बदलाव क्यों नहीं दिख पा रहा है?
रामजी : जब कोई संघर्ष शुरू होता है, तो धीरे-धीरे उसके मुख्य मुद्दे बदल जाते हैं। जैसे छुट्टा पशुओं के आंदोलन का समाधान केवल 'एक और गौशाला' बना देना मान लिया जाता है, जबकि मूल कारण पर ध्यान नहीं दिया जाता। समय बहुत तेजी से बदलता है। जब तक एक पुरानी समस्या का हल निकलता है, तब तक तकनीक और वक्त बदलने के साथ चार नई चुनौतियाँ सामने खड़ी हो जाती हैं। इसलिए संघर्ष की नौबत आने देने के बजाय सरकार और किसान नेताओं के बीच निरंतर संवाद (Continuous Dialogue) होना चाहिए। नियम ऐसे बनने चाहिए जो समय और तकनीक के साथ लचीले (Flexible) हों।
प्रदीप: एक ग्रामीण और कृषि मामलों के पत्रकार के तौर पर काम करते हुए आपके क्या अनुभव रहे हैं?
रामजी : ग्रामीण पत्रकारिता में हमारे सामने ढेरों चुनौतियाँ होती हैं, चाहे वह बजट की कमी हो, संसाधनों का अभाव हो या ट्रेनिंग की कमी। हम किसान की बात को बिना मिर्च-मसाला लगाए, एक डाकिये (Postman) की तरह ईमानदार रूप में संस्थान तक पहुंचाना चाहते हैं। कई बार ग्राउंड स्टोरीज कवर करने में जेब से भी पैसे खर्च करने पड़ते हैं।
किसान आंदोलनों के दौरान एक पत्रकार के तौर पर निष्पक्ष रहना सबसे बड़ी परीक्षा होती है। अगर आप सिर्फ एक पक्ष दिखाते हैं, तो दूसरा असंतुष्ट होता है। मैंने मशहूर कार्टूनिस्ट कीर्ति भट्ट जी का एक कार्टून देखा था, जिसमें एक तरफ 'जवान' (पुलिस) था और दूसरी तरफ 'किसान', और बीच में रेखा खींचकर लिखा था "जय जवान, जय किसान"। संघर्ष के दौरान चोटिल होने वाला पुलिसकर्मी भी किसी गरीब परिवार का बेटा है और अपनी हक की लड़ाई लड़ने वाला किसान भी इसी देश का अन्नदाता है। एक सच्चे पत्रकार का काम दोनों की तकलीफों को संवेदनशीलता और ईमानदारी के साथ सामने लाना है।
कृषि क्षेत्र को संकट से उबारने के लिए कागजी नीतियों के बजाय धरातल पर उतरकर किसानों की असल व्यावहारिक समस्याओं को समझना होगा। जब तक किसान को उसकी फसल का सही दाम और पशुपालन का आर्थिक संबल नहीं मिलेगा, तब तक देश की कृषि व्यवस्था को पूर्णतः आत्मनिर्भर नहीं बनाया जा सकता।