वेटिकन सिटी में पोप लियो चौदहवें से मिलकर पाकिस्तानी कैथोलिक बिशपों के एक उच्च स्तरीय प्रतिनिधिमंडल ने पाकिस्तान में ईसाई अल्पसंख्यकों पर हो रहे संस्थागत भेदभाव, ईशनिंदा कानून के दुरुपयोग और जबरन धर्म परिवर्तन का मुद्दा उठाया। 1947 में विभाजन के बाद से ही पाकिस्तान में अल्पसंख्यकों का दमन बढ़ा है। अब अल्पसंख्यक अधिकार संगठनों ने सुरक्षा और आरक्षित सीटों पर प्रत्यक्ष चुनाव की मांग की है। AI
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पाकिस्तान : इस्लामिक राष्ट्र में नहीं सुरक्षित अल्पसंख्यक ! मामला पहुंचा रोम के पोप तक, यहाँ जानिए पूरा मामला

पाकिस्तानी कैथोलिक बिशपों ने वेटिकन में पोप लियो चौदहवें से मुलाकात कर ईशनिंदा कानूनों के दुरुपयोग, जबरन धर्म परिवर्तन, नाबालिग लड़कियों के विवाह और समान अधिकारों के अभाव पर अंतरराष्ट्रीय दखल और पाकिस्तान दौरे की अपील की

Author : Pradeep Yadav

  • पाकिस्तान में ईसाई अल्पसंख्यकों पर बढ़ते उत्पीड़न और भेदभाव को लेकर कैथोलिक बिशपों के उच्च स्तरीय प्रतिनिधिमंडल ने वेटिकन में पोप लियो चौदहवें से मुलाकात की। प्रतिनिधिमंडल ने ईशनिंदा कानूनों के दुरुपयोग, जबरन धर्म परिवर्तन, नाबालिग लड़कियों के जबरन विवाह और समान अधिकारों की कमी पर गंभीर चिंता जताते हुए पोप को पाकिस्तान आने का निमंत्रण दिया।

इस्लामिक राष्ट्र पाकिस्तान में गैर-इस्लामिक संप्रदायों और अल्पसंख्यकों की स्वतंत्रता पर लगाए जा रहे प्रतिबंधों का मामला अब रोम के पोप तक पहुँच चुका है। पाकिस्तान के कैथोलिक बिशपों के एक उच्च स्तरीय प्रतिनिधिमंडल ने वेटिकन सिटी में पोप लियो चौदहवें से मुलाकात कर देश में ईसाई समुदाय के सामने मौजूद गंभीर चुनौतियों, उत्पीड़न और भेदभाव के मुद्दों को प्रमुखता से उठाया। इस पाकिस्तानी प्रतिनिधिमंडल में तीन आर्चबिशप, चार बिशप और एक कार्डिनल शामिल थे।

क्या है पूरा मामला ?

पाकिस्तान में लंबे समय से अल्पसंख्यकों के अधिकारों का हनन हो रहा है। विशेषकर अल्पसंख्यकों में ईसाई समुदाय के बीच वहां की सरकार के प्रति भारी नाराजगी देखने को मिल रही है। धार्मिक स्वतंत्रता और अवसरों में समानता जैसे बुनियादी मुद्दों को लेकर पाकिस्तान सरकार को अल्पसंख्यक संगठनों ने बार-बार चेताया था। इसी सिलसिले में, 15 मई 2026 को पाकिस्तान के एक ईसाई प्रतिनिधिमंडल ने वेटिकन में पोप से मुलाकात की। इस प्रतिनिधिमंडल ने पोप को पाकिस्तान में ईसाई अल्पसंख्यकों की वास्तविक और दयनीय स्थिति से अवगत कराया। बता दें कि पाकिस्तान में विगत कई सालों से लगातार यह आरोप लगते रहे हैं कि वहां की सरकार अल्पसंख्यकों के हितों को पूरी तरह से नजरअंदाज कर रही है।

मुलाकात के दौरान प्रतिनिधिमंडल ने कथित तौर पर ईशनिंदा कानूनों (Blasphemy Laws) के बढ़ते दुरुपयोग, संस्थागत भेदभाव तथा ईसाई समुदाय की नाबालिग और युवा लड़कियों के जबरन धर्म परिवर्तन और जबरन विवाह की बढ़ती घटनाओं पर गहरी चिंता जताई। प्रतिनिधिमंडल में शामिल कार्डिनल ने कहा कि पाकिस्तान में ईसाइयों को समान अधिकार नहीं मिल रहे हैं और उन्हें सामाजिक व प्रशासनिक, दोनों स्तरों पर कड़े भेदभाव का सामना करना पड़ता है। इस गंभीर चर्चा के दौरान बिशपों ने पोप लियो चौदहवें को पाकिस्तान आने का आधिकारिक निमंत्रण भी दिया।

पाकिस्तान में अल्पसंख्यक अधिकारों के लिए उठती मांगें

गौरतलब है कि पिछले सप्ताह कई अल्पसंख्यक अधिकार संगठनों ने पाकिस्तान की संघीय सरकार से प्रस्तावित 28वें संविधान संशोधन विधेयक के तहत धार्मिक अल्पसंख्यकों, महिलाओं और बच्चों की सुरक्षा को मजबूत करने के लिए ठोस संवैधानिक सुधारों की मांग की थी। इन संगठनों का कहना है कि प्रस्तावित सुधारों का मुख्य उद्देश्य कानून के समक्ष समानता और सभी नागरिकों के लिए बराबर अवसर सुनिश्चित करना है। साथ ही, बच्चों को जबरन धर्म परिवर्तन और बाल विवाह जैसी कुप्रथाओं से बचाने के लिए संवैधानिक और कानूनी सुरक्षा को मजबूत करने की सख्त आवश्यकता है।

इन प्रस्तावों में विशेष रूप से 18 वर्ष से कम आयु के बच्चों के धर्म परिवर्तन पर पूर्ण रोक लगाने की मांग की गई है। इसके तहत यह सुझाव भी दिया गया है कि किसी भी धर्म परिवर्तन को तब तक कानूनी मान्यता न दी जाए, जब तक कि न्यायिक मजिस्ट्रेट के समक्ष पीड़ित की स्वतंत्र और सूचित सहमति दर्ज न हो जाए।

इसके साथ ही, अल्पसंख्यक अधिकार संगठनों ने राजनीतिक सुधारों की भी मांग की है। वर्तमान में पाकिस्तान में अल्पसंख्यकों के लिए सीटें आरक्षित तो हैं, लेकिन इन सुरक्षित सीटों पर जनता सीधे वोट नहीं डालती है। ऐसे में संगठनों ने मांग की है कि इन सीटों पर भी आम जनता द्वारा मतदान होना चाहिए, अर्थात इन सीटों पर प्रत्यक्ष चुनाव कराया जाए ताकि लोकतंत्र और पारदर्शिता को मजबूती मिल सके।

पाकिस्तान में अल्पसंख्यकों के अधिकार

1947 में भारत का विभाजन करके एक अलग देश के रूप में पाकिस्तान का निर्माण हुआ था। पाकिस्तान के संस्थापक मोहम्मद अली जिन्ना ने 11 अगस्त 1947 को अपने प्रसिद्ध भाषण में कहा था कि पाकिस्तान में सभी नागरिक स्वतंत्र होंगे, चाहे वे किसी भी धर्म, जाति या पंथ के हों। उन्होंने वादा किया था कि राज्य में मंदिरों व चर्चों की सुरक्षा की जाएगी, लेकिन जिन्ना की मृत्यु के बाद ही पाकिस्तान अपने इस रास्ते से पूरी तरह भटक गया। विभाजन के समय पश्चिमी पाकिस्तान (वर्तमान पाकिस्तान) की कुल आबादी में गैर-मुस्लिम अल्पसंख्यकों (हिंदू, ईसाई, सिख, बौद्ध) की हिस्सेदारी लगभग 14 से 15 प्रतिशत के बीच थी। लेकिन आज यह घटकर महज 3.5 प्रतिशत के आसपास सिमट कर रह गई है जिसे चिंता का विषय बताया जा रहा है।

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