15 मार्च 2026 को हिंदुस्तान में जन्में जोशी पोटाकल की नियुक्ति जर्मनी में एक बिशप के तौर पर होगी।  Schreenshots from DW
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केरल में जन्मे जोशी पोटाकल बनेंगे जर्मनी के बिशप, चर्च सुधार की मांग के बीच बड़ा फैसला

हाल ही में जर्मनी में एक बिशप की नियुक्ति ने पूरी दुनिया का ध्यान फिर से ईसाई धर्म की तरफ खींच लिया है। 15 मार्च 2026 को हिंदुस्तान में जन्में जोशी पोटाकल की नियुक्ति जर्मनी में एक बिशप के तौर पर होगी।

Author : Pradeep Yadav
Reviewed By : Mayank Kumar

  • केरल में जन्मे जोशी पोटाकल को 15 मार्च 2026 को जर्मनी के माइंज (Mainz) कैथेड्रल में बिशप के रूप में नियुक्त किया जाना प्रस्तावित है, जिससे अंतरराष्ट्रीय स्तर पर चर्चा बढ़ गई है।

  • जर्मनी में चर्च के भीतर सुधार की मांग तेज है, खासकर महिलाओं को पादरी और बिशप बनाने को लेकर। परंपरावादी इसका विरोध करते हैं और चर्च की पारंपरिक व्यवस्था को बनाए रखने की बात करते हैं।

  • कैथोलिक चर्च में बिशप की अंतिम नियुक्ति का अधिकार पोप के पास होता है। पहले संभावित नामों की सूची वेटिकन भेजी जाती है, फिर चयनित व्यक्ति पर पोप अंतिम मुहर लगाते हैं।

हाल ही में जर्मनी में एक बिशप की नियुक्ति ने पूरी दुनिया का ध्यान फिर से ईसाई धर्म की तरफ खींच लिया है। 15 मार्च 2026 को हिंदुस्तान में जन्में जोशी पोटाकल की नियुक्ति जर्मनी में एक बिशप के तौर पर होगी।

जर्मनी में हाल के समय में चर्च में सुधार की मांग की जा रही है,इसी बीच किसी भारतीय मूल के शख्स की नियुक्ति एक बिशप के रूप में करना बहुत बड़ी बात है और जर्मनी के लिए यह काफी जोखिम भरा कार्य भी साबित हो सकता है।

क्या है पूरा मामला?

दरअसल, जर्मनी एक ईसाई (Christian) बहुल देश है। भारतीय मूल के एक व्यक्ति की नियुक्ति बिशप के रूप में की जा रही है। फिलहाल 15 मार्च 2026 को जोशी पोटाकल की नियुक्त होना तय हुआ है। जर्मनी में एक तरफ चर्च में सुधार की मांग तेज होती जा रही है। जर्मनी में काफी समय से मांग की जा रही है कि पादरी के नियुक्ति में महिलाओं को भी जगह मिलनी चाहिए।

सुधारवादियों का मानना है कि चर्च में महिलाएं अलग-अलग रूप में अपना योगदान दे रहीं हैं, इसलिए पादरी और बिशप की नियुक्ति में महिलाओं को भी जगह मिलनी चाहिए।

वहीं कुछ परंपरावादियों का कहना है कि चर्च में बिशप और पादरी की नियुक्ति में फेरबदल करना और आधुनिक मांग के अनुरूप सब कुछ तय करना सही नहीं होगा, क्योंकि चर्च का अपना एक सिद्धांत है, जो पारंपरिक रूप से प्रभु यीशु और कैथोलिक धर्म से जुड़ा है। ऐसे समय में भारत में जन्मे किसी शख्स को बिशप नियुक्त करना चर्चा का केंद्र बन गया है।

कौन हैं जोशी पोटाकल?

जोशी पोटाकल मूल रूप से केरल (Kerala) के रहने वाले हैं। इनका जन्म केरल के, मीनकुन्नम में 30 अप्रैल 1977 को हुआ था। इन्होंने प्रारम्भिक शिक्षा पूर्ण करने के पश्चात, 1992 में कार्मेलाइट माइनर सेमिनरी (Carmelite Minor Seminary) में प्रवेश लिया। यहाँ से इनकी धार्मिक यात्रा असल में शुरू हो गई।

कार्मेलाइट माइनर सेमिनरी (Carmelite Minor Seminary), द्वारा कैथोलिक धर्म में उन युवाओं को शिक्षा दी जाती है जो आगे चलकर बिशप या पादरी बनते हैं।

दिसंबर 2003 में पादरी के रूप में इनकी नियुक्ति केरल के त्रिशूर में की गई। इसके बाद साल 2004 में जोशी पोटाकल जर्मनी चले गए। यहाँ उन्होंने जर्मन भाषा का ज्ञान अर्जित किया। इसके साथ ही उन्होंने यहाँ पर पादरी बनने का प्रशिक्षण भी लिया।

साल 2025 में इनको पॉप लियो चौदहवें ने माइंज (Mainz) चर्च का सहायक बिशप नियुक्त किया। इसके बाद अब इनको 15 मार्च 2026 को माइंज (Mainz) कैथेड्रल में बिशप के रूप में नियुक्त किया जाना प्रस्तावित है।

क्या है बिशप नियुक्ति के नियम?

वैसे तो कैथोलिक धर्म में बिशप नियुक्त करने का अधिकार अंतिम रूप से पॉप फ्रांसिस को होता है। जर्मनी में बिशप नियुक्त करने के लिए सबसे पहले पापल नुनसियो (Papal Nuncio) सबसे पहले गुप्त तरीके से बिशप उम्मीदवारों की जानकारी एकत्रित करते हैं।

इसके बाद संभावित उम्मीदवारों में से तीन के नाम वेटिकन भेजा जाता है। हालांकि जर्मनी के कई धर्म प्रांतों के कैथेड्रल परिषद को इन नामों में से चुनने की छूट होती है। इसके बाद चुने हुए व्यक्ति के नाम पर अंतिम मुहर पॉप के द्वारा लगाया जाता है।

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महिलाओं को बिशप बनने का अधिकार नहीं है!

कैथोलिक धर्म में महिलाओं को बिशप बनने का कोई अधिकार नहीं है। चूंकि बिशप बनने के लिए पादरी बनना आवश्यक है और महिलाओं को पादरी नहीं बनाया जा सकता है।

इसका कारण कैथोलिक चर्च द्वारा बताया जाता है कि पॉप जॉन पॉल द्वितीय (Pope John Paul II) ने साल 1994 में अपने ऑर्डिनेसियो सकेरडोटलीस (Ordinatio Sacerdotalis) में बताया कि महिलाओं को पादरी बनाने का अधिकार चर्च के पास नहीं है।

चर्च का कहना है कि प्रभु यीशु ने प्रारंभ में केवल 12 पुरुषों को ही चुना था। यह परंपरा वहीं से चली आ रही है, इसलिए चर्च स्वयं इस परंपरा को तोड़ नहीं सकता है।