बांग्लादेश में 12 फरवरी 2026 में चुनाव होने जा रहा है। बांग्लादेश के इस चुनाव में अलग -अलग विचारधाराओं के साथ पार्टियां चुनाव के मैदान में खड़ी हैं। AI Generated
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चीन या भारत ....जानें चुनाव के बाद किस पाले में जाएगा बांग्लादेश? बदलेगा एशिया का खेल!

बांग्लादेश में 12 फरवरी 2026 में चुनाव होने जा रहा है। शेख हसीना के जाने के पश्चात बांग्लादेश की कमान मोहम्मद युनुस (Muhammad Yunus) संभाल रहे हैं।

Author : Pradeep Yadav
Reviewed By : Mayank Kumar

  • बांग्लादेश में सत्ता परिवर्तन और चुनावी माहौल: शेख हसीना के सत्ता से हटने के बाद मोहम्मद यूनुस के नेतृत्व वाली अंतरिम सरकार के दौरान बांग्लादेश में 12 फरवरी 2026 को चुनाव होने जा रहे हैं। अवामी लीग पर प्रतिबंध और हिंसक आंदोलन के बाद बने हालात ने चुनाव को अत्यंत संवेदनशील बना दिया है।

  • भारत-बांग्लादेश संबंध और क्षेत्रीय असर: सत्ता परिवर्तन के बाद भारत-बांग्लादेश रिश्तों में तनाव बढ़ा है, जिसका संकेत भारत द्वारा विकास सहायता में 50% कटौती से मिलता है। वहीं बांग्लादेश की चीन के साथ बढ़ती नज़दीकियाँ (तीस्ता परियोजना) हिंद-प्रशांत और दक्षिण एशिया की राजनीति को प्रभावित कर सकती हैं।

  • चुनाव परिणाम और भविष्य की दिशा: सर्वेक्षणों में BNP के नेतृत्व वाले गठबंधन को बढ़त दिखाई जा रही है, जिसकी विचारधारा बांग्लादेशी राष्ट्रवाद और इस्लामी झुकाव पर आधारित रही है। ऐसे में चुनाव के बाद भारत-बांग्लादेश संबंध, चीन का प्रभाव और बांग्लादेश में पंथनिरपेक्षता का भविष्य निर्णायक मोड़ पर खड़ा है।

बांग्लादेश में चुनावी माहौल गर्म है। शेख हसीना के जाने के पश्चात बांग्लादेश की कमान मोहम्मद यूनुस (Muhammad Yunus) संभाल रहे हैं। बांग्लादेश में जिस तरीके से हिंसक आंदोलन के माध्यम से सत्तापरिवर्तन किया गया और उसके पश्चात भारत जैसे पड़ोसी देशों पर बांग्लादेश के राजनीति का असर देखने को मिला। दक्षिण एशिया में बांग्लादेश एक अहम् किरदार निभाने वाला देश है।

भारत जैसे देश के साथ बांग्लादेश के काफी पुराने सम्बन्ध रहे हैं। लम्बे समय तक बांग्लादेश में अवामी लीग की शेख हसीना का बांग्लादेश की सत्ता में बने रहना, भारत से सम्बन्ध मजबूत बनाने में काफी कारगर रहा था। हालांकि सत्तापरिवर्तन के पश्चात् दोनों देशों के संबंधों में कड़वाहट भी देखने को मिली।

भारत (India) ने केंद्रीय बजट 2026 से बांग्लादेश को दी जाने वाली विकास सहायता राशि में 50% की भारी कटौती करते हुए इसे 120 करोड़ रुपये से घटाकर 60 करोड़ रुपये कर दिया है। यह निर्णय दोनों देशों के बीच मौजूदा राजनयिक तनाव और बांग्लादेश में अल्पसंख्यकों के खिलाफ हिंसा के मद्देनजर लिया गया है। वहीं बांग्लादेश की तरफ से भी कुछ तीखी बयानबाजियां हुईं थी, जिसका असर दोनों देशों के संबंधों पर भी पड़ा। अब बांग्लादेश में चुनाव होने जा रहा है चुनाव के पश्चात् दक्षिण एशिया की रजनीति पर इसका जो प्रभाव पड़ने वाला है ,वो बड़ा ही विचारणीय विषय है।

बांग्लादेश में चुनाव-चीन,भारत सहित दक्षिण एशिया पर असर

बांग्लादेश में 12 फरवरी 2026 में चुनाव होने जा रहा है। बांग्लादेश के इस चुनाव में अलग -अलग विचारधाराओं के साथ पार्टियां चुनाव के मैदान में खड़ी हैं। बता दें कि बांग्लादेश (Bangladesh) में लम्बे समय से अवामी लीग (Awami League) की सरकार थी। साल 1972 में आज़ादी के पश्चात् बांग्लादेश में कुछ समय के लिए शेख मुजीबुर्रहमान (Sheikh Mujibur Rahman) की सरकार बनी थी। शेख मुजीबुर्रहमान (Sheikh Mujibur Rahman) की सरकार के साथ भारत के सम्बन्ध मज़बूत होते चले गए क्योंकि पाकिस्तान से बांग्लादेश को अलग करने में और वैश्विक शक्तियों की चुनौतियों को स्वीकार करते हुए भारत और भूटान ने बांग्लादेश को सबसे पहले मान्यता देने में अहम् भूमिका निभाई थी। मुजीबुर्रहमान के बाद, काफी समय तक बांग्लदेश के अंदर सत्ता का स्वरुप बदलता रहा। परन्तु जब बांग्लादेश में लोकतांत्रिक सरकार के रूप में, लम्बे समय तक स्थाई रूप से अवामी लीग की सरकार बनी, तो बांग्लादेश की विदेशनीति का असर भी वैश्विक राजनीति में दिखने लगा ।

बांग्लादेश में सत्ता परिवर्तन के पश्चात् अंतरिम सरकार का नेतृत्व कर रहे मोहम्मद यूनुस की नज़दीकियां चीन के साथ बढ़ने लगी हैं। मोहम्मद यूनुस (Muhammad Yunus) ने साल 2025 में चीन का दौरा भी किया था। बांग्लदेश ने चीन के साथ तीस्ता नदी प्रोजेक्ट पर सहमति दर्ज़ की। इससे पता चलता है कि बांग्लादेश में चीन का प्रभाव भविष्य में दिख सकता है। हिन्द-प्रशांत क्षेत्र (Indo-Pacific region) में चीन के प्रभुत्व को कम करने के लिए वैश्विक स्तर पर गठजोड़ जारी है। भारत ने हिन्द-प्रशांत क्षेत्र (Indo-Pacific region) में तथा दक्षिण एशिया के देशों को साधने के लिए एक्ट ईस्ट नीति (Act East Policy-2015) को अपने विदेश नीति की सूचि में समाहित किया है।

एक्ट ईस्ट नीति (Act East Policy-2015 ) के माध्यम से भारत ने आसियान (Association of Southeast Asian Nations - ASEAN) देशों के साथ संबंधों को मजबूत करने की कोशिश की है। इसी के साथ हिन्द-प्रशांत क्षेत्र में चीन के प्रभुत्व को भी कम करने की रणनीति पर भारत काम कर रहा है। बांग्लादेश भारत की इस रणनीति का हिस्सा भी रहा है। अब देखना है कि बांग्लादेश के चुनाव में किस पार्टी को बहुमत मिलता है। मुख्य रूप से बांग्लादेश में बीएनपी का असर दिख रहा है।

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बांग्लादेश में किस पार्टी का क्या प्रभाव ?

बीएनपी की विचारधारा में अभी तक यही नज़र आया है कि बीएनपी (BNP) बांग्लादेशी राष्ट्रवाद साथ इस्लामवाद को अंगीकार करती है। बीएनपी (BNP) के राजनीतिक सिद्धांत में भारत से दूरी बनाए रखने की बात जाती रही है। अब देखना है कि अगर बीएनपी इस चुनाव में बहुमत हासिल करती है तो फिर भारत के सम्बन्धो पर इसका सकारात्मक असर पड़ता है या फिर नकारात्मक। दोनों देशों के रिश्तों में मधुरता आती है या फिर चीन (China) प्रभाव में आकर बांग्लादेश कोई दूसरा कदम उठता है।

बता दें कि इस चुनाव में शेख हसीना की पार्टी आवामी लीग (Awami League) को चुनाव लड़ने से रोक दिया गया है। बांग्लादेश के चुनाव आयोग ने शेख हसीना की पार्टी, अवामी लीग पर प्रतिबन्ध लगा दिया है। इसका असर भी चुनाव में देखने को मिल सकता है।

बांग्लादेशी अखबार द डेली स्टार के मुताबिक, एमिनेंस एसोसिएट्स फॉर सोशल डेवलपमेंट (EASD) के एक सर्वे में दावा किया गया है कि बीएनपी (BNP) के नेतृत्व वाला गठबंधन 13वें आम चुनाव में करीब 208 सीटें जीत सकता है।

वहीं जमात-ए-इस्लामी (Jamaat-e-Islami) के नेतृत्व वाला गठबंधन लगभग 46 सीटों पर जीत दर्ज कर सकता है। सर्वे के मुताबिक जातीय पार्टी को तीन सीटें, अन्य दलों को चार सीटें और निर्दलीय उम्मीदवारों को करीब 17 सीटें मिल सकती हैं।

कुछ अन्य सर्वे में दोनों के बीच कांटे की टक्कर मानी जा रही है। हालांकि दोनों ही पार्टियां इस्लाम की कट्टरता को बढ़ावा देते रहे हैं। अब देखना यह है कि नई सरकार बनाने के पश्चात् बांग्लादेश में पंथनिरपेक्षता के लिए कोई जगह मिलती है या फिर नहीं।