अमेरिका ने भेजा गाज़ा शांति बोर्ड का निमंत्रण; ट्रम्प के फैसले से बदल जाएगी भविष्य के वैश्विक राजनीति की दिशा wikimedia commons
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अमेरिका ने भेजा गाज़ा शांति बोर्ड का निमंत्रण; ट्रम्प के फैसले से बदल जाएगी भविष्य के वैश्विक राजनीति की दिशा

अभी अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प ने गाज़ा मे पूर्ण शांति की स्थापना हेतु शांति बोर्ड के निर्माण में विभिन्न राष्ट्रों को अपनी तरफ से निमंत्रण भेजा है।

Author : न्यूज़ग्राम डेस्क

साल 1991 में सोवियत संघ का विघटन हो जाने और उदारवाद बनाम साम्यवाद का संघर्ष समाप्त होने के पश्चात् नई विश्व व्यवस्था में अमेरिका का प्रभुत्व स्थापित हुआ, उसको काफी समय तक किसी दूसरी विचारधारा से मजबूती से चुनौती नहीं मिल सकी। इसी घटना को फ्रांसिस फुकुयामा ने एन्ड ऑफ़ हिस्ट्री (The End of History and the Last Man) में विचारधाराओं के संघर्ष में उदारवाद का विजय बताया।

जैसे -जैसे 21वीं सदी का काल आगे बढ़ता है, दुनिया बहुध्रुवीय व्यवस्था की तरफ बढ़ने लगती है। क्षेत्रीय शक्तियों के उभरने से बहुध्रुवीय व्यवस्था की स्वीकार्यता बढ़ती चली गयी। बढ़ते समय के साथ अमेरिका को चीन जैसी उभरती शक्ति से खतरा महसूस होने लगा।

एशिया महाद्वीप के देशों में चीन ,भारत ,जापान, दक्षिण कोरिया जैसे देशों के उभरने से वैश्विक व्यवस्था में पश्चिम के प्रभुत्व को चुनौती महसूस होने लगी परन्तु ,अमेरिका आज भी वैश्विक व्यवस्था में विचारणीय विषय है कि कैसे कोई राष्ट्र प्रमुख निर्णय लेकर विश्व व्यवस्था में अपने प्रभुत्व को बरकरार रखने का संकेत दे सकता है।

क्या है पूरा मामला

पिछले कुछ वर्षों से अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प (Donald Trump) ने समय-समय पर निर्णय लेकर वैश्विक राजनीति को अचंभित कर दिया है। कभी भारत से मजबूत सम्बन्ध बताते हुए भारतीय प्रधानमंत्री को अपना एक अच्छा मित्र भी बोल देते हैं, तो कभी राष्ट्रीय हित का हवाला देते हुए भारत पर टैरिफ़ लगा देते हैं।

अभी अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प ने गाज़ा मे पूर्ण शांति की स्थापना हेतु गाज़ा शांति बोर्ड (Gaza Peace Board) के निर्माण में विभिन्न राष्ट्रों को अपनी तरफ से निमंत्रण भेजा है। यह मामला अब वैश्विक राजनीति (Global Politics) में राष्ट्रों के समक्ष एक रणनीतिक दुविधा के रूप में खड़ा हो चुका है। राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प के इस रणनीतिक कदम में भारत को भी शामिल होने के लिए अमेरिका की तरफ से निमंत्रण आया हुआ है।

भारत में अमेरिका के राजदूत सर्जियो गोरे (Sergio Gor) ने कहा है , "मुझे गर्व है कि मैं राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप का आमंत्रण प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को दे रहा हूं ताकि वे बोर्ड ऑफ पीस में भाग लें, जो गाजा में स्थायी शांति लाएगा. यह बोर्ड प्रभावशाली शासन का समर्थन करेगा जिससे स्थिरता और समृद्धि प्राप्त होगी." हांलाकि भारत की तरफ़ से अभी तक अगले कदम को लेकर स्थिति को उजागर नहीं किया गया है।

क्या है गाज़ा शांति बोर्ड में

डोनाल्ड ट्रम्प ने इज़रायल-हमास युद्ध के दौरान गाज़ा में ख़राब हो चुके माहौल पर नियंत्रण एवं शान्ति की स्थापना के लिए एक शांति बोर्ड की स्थापना की है। यह बोर्ड ट्रम्प के 20 सूत्रीय कार्यक्रम का हिस्सा है जिसे संयुक्त राष्ट्र संघ के सुरक्षा परिषद् का भी आंशिक समर्थन प्राप्त है। बता दें कि बोर्ड, गाज़ा में युद्ध विराम की निगरानी ,तकनीकि विकास ,पुनर्निर्माण और निवेश के लिए कार्य करेगा। इस बोर्ड की संरचना को तार्किक तरीके से देखने पर यह प्राप्त होता है कि इसके अध्यक्ष हमेशा के लिए डोनाल्ड ट्रम्प ही रहेंगे।

इज़रायल की तरफ़ से बयान

इज़रायल (Israel) के प्रधानमंत्री कार्यालय की तरफ से खबर है कि समिति का गठन इज़रायल की सरकार के समन्वय के बिना हुआ है। यह उनकी नीति के विपरीत है, हांलाकि इसपर होने वाली आपत्ति को ठीक से स्पष्ट नहीं किया गया है। वहीं इज़रायल के राष्ट्रीय सुरक्षा मंत्री इतामार बेन-गवीर (National Security Minister, Itamar Ben-Gvir) ने कहा है , "मैं प्रधानमंत्री नेतन्याहू के उनके महत्वपूर्ण बयान का समर्थन करता हूँ। ग़ाज़ा पट्टी को उसके “पुनर्वास” की निगरानी के लिए किसी भी “प्रशासनिक समिति” की आवश्यकता नहीं है—उसे हमास आतंकवादियों से मुक्त किया जाना चाहिए, जिन्हें नष्ट किया जाना आवश्यक है, साथ ही राष्ट्रपति ट्रंप की मूल योजना के अनुरूप बड़े पैमाने पर स्वैच्छिक प्रवासन होना चाहिए। मैं प्रधानमंत्री से आग्रह करता हूँ कि वे इज़राइली रक्षा बलों (IDF) को ग़ाज़ा पट्टी में अत्यधिक बल के साथ युद्ध में पुनः लौटने की तैयारी का आदेश दें, ताकि युद्ध का केंद्रीय उद्देश्य—हमास का विनाश—प्राप्त किया जा सके।"

संयुक्त राष्ट्र संघ की सर्वोच्चता पर सवाल

अमेरिका (America) के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प के गाज़ा शांति बोर्ड की स्थापना और बोर्ड की संरचना को लेकर भारत समेत अन्य राष्ट्रों के समक्ष यह दुविधा है कि क्या यह बोर्ड संयुक्त राष्ट्र संघ के सामानांतर एक दूसरी व्यवस्था है। अगर ऐसा है, तो फिर बोर्ड में शामिल होने से पहले भारत समेत अन्य राष्ट्र, जिनका संयुक्त राष्ट्र संघ में विश्वास है ,उनको यह विचार करना होगा कि ऐसी किसी समानांतर व्यवस्था में शामिल होना भविष्य के लिए ठीक होगा या नहीं।

शांति बोर्ड के निमंत्रण पत्र का भविष्य के वैश्विक राजनीति पर असर

गाज़ा शांति बोर्ड (Gaza Peace Board) में भारत को शामिल करने के लिए आए निमंत्रण ने यह स्थिति साफ़ कर दिया है कि, हिन्द-प्रशांत क्षेत्र और एशिया में भारत, एक प्रमुख उभरती शक्ति है। वैश्विक राजनीति में भारत अब निर्णायक भूमिका निभा सकता है। सवाल यह उभरकर आ रहा है कि भारत को इस बोर्ड में शामिल होना चाहिए या नहीं।

बता दें की भारत की विदेश नीति में शुरू से ही यह स्थिति स्पष्ट रही है कि भारत कभी भी ऐसे गुट का हिस्सा नहीं बनेगा जिसमें राष्ट्रों की सम्प्रभुता को प्रभावित करने की बात की गयी हो। भारत हमेशा वैश्विक संघर्षों को युद्ध के माध्यम से नहीं बल्कि शांतिपूर्वक बातचीत के माध्यम से समाधान निकालने के पक्ष में रहा है। अगर यह बोर्ड संयुक्त राष्ट्र संघ के समानांतर एक व्यवस्था है भी, तो भारत इसमें शामिल होने के बारे में बहुत गहनता से विचार करेगा।

देखना यह है कि अमेरिका (America) की तरफ से भेजे गए इस निमंत्रण पर कितने राष्ट्र सकारात्मक जवाब देते हैं। अगर ऐसा होता है कि राष्ट्रों द्वारा इस निमंत्रण पर कोई सकारात्मक निर्णय या जवाब अमेरिका के पक्ष में नहीं आता है तो, उससे वैश्विक राजनीति में अमेरिका के वर्चस्व पर कोई प्रभाव पड़ता है या नहीं। अर्थात वैश्विक राजनीतिक व्यवस्था में कोई परिवर्तन होता है या नहीं, क्योंकि जिस तरीके से वैश्विक राजनीति (Global Politics) में उठा पटक चल रहा है वह भविष्य के वैश्विक व्यवस्था (World Order) की तरफ़ बहुत कुछ इशारा कर रहा है ,ऐसा राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है।

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