1975 के आपातकाल के दौरान अभिनेत्री स्नेहलता रेड्डी को बड़ौदा डायनामाइट कांड में MISA के तहत गिरफ्तार कर बेंगलुरु सेंट्रल जेल में रखा गया, जहाँ उन्हें अस्थमा की गंभीर बीमारी के बावजूद गंदी, तंग कोठरी, खराब भोजन, चिकित्सा से वंचित रखना, एकांत कारावास और अन्य महिला कैदियों पर हो रही बर्बरता की चीखें सुनने जैसी अमानवीय यातनाएँ झेलनी पड़ीं।
इंदिरा गांधी के शासन काल में जब 1975 में आपातकाल लागू किया गया, तो पूरे मुल्क में अजीब तरीके से संदेश गया। यह पहली बार था जब भारत के नागरिकों को लगा कि उनके अधिकारों पर सरकार अंकुश लगा रही थी। 1975 के आपातकाल में बहुत सारी घटनाओं का जिक्र किया जाता है। इन्हीं में एक कहानी है स्नेहलता रेड्डी की। रेड्डी ने आपातकाल के दौरान बहुत सारी यातनाओं का सामना किया और अंत में जब जेल से बाहर निकलीं, तो कुछ ही दिनों में उनका देहांत हो गया।
स्नेहलता रेड्डी का जन्म कन्नड़ परिवार में हुआ था। वह एक प्रसिद्ध अभिनेत्री थीं। अभिनय की दुनिया में उनकी बहुत ख्याति थी। साल 1975 के दौर की राजनीति में उनके चमकते करियर पर ग्रहण लग गया। जिस समय आपातकाल लगा, उस समय बड़ी-बड़ी हस्तियाँ गिरफ्तार कर ली गई थीं। जयप्रकाश नारायण सहित बिहार के लालू यादव, नीतीश कुमार, मुलायम सिंह यादव, अटल बिहारी वाजपेयी, लालकृष्ण आडवाणी आदि को गिरफ्तार किया गया था। गिरफ्तार होने वालों की कड़ी में स्नेहलता रेड्डी का नाम भी जुड़ता है। 2 मई 1976 को जब स्नेहलता रेड्डी को MISA कानून के तहत गिरफ्तार किया गया, तो उनको एहसास नहीं था कि उनके साथ जेल में क्या-क्या हो सकता था।
बड़ौदा डायनामाइट कांड मामले में गिरफ्तार स्नेहलता रेड्डी जब गिरफ्तार हुईं, तो उनको बेंगलुरु सेंट्रल जेल (Bangalore Central Jail) में बंद करके रखा गया। यहीं पर उनके साथ जुर्म की सारी हदें पार की गईं। ऐसा कहा जाता है कि जिस जेल में रेड्डी बंद थीं, उसी जेल में अटल बिहारी वाजपेयी को भी बंद किया गया था। कुछ रिपोर्ट्स के मुताबिक, जेल के जिस कमरे में उनको बंद किया गया था, वह कमरा बहुत ही छोटा था। रेड्डी को अस्थमा की बीमारी थी। इतने छोटे से कमरे में बंद किया जाना उनके जीवन के प्रतिकूल था।
उन्होंने अपनी आत्मकथा 'ए प्रिजन डायरी' (A Prison Diary) में उन सारी घटनाओं का जिक्र किया है जो जेल में हो रहा था। उन्होंने बताया है कि वहाँ गरीब महिलाओं को असहनीय पीड़ा दी जाती थी। इसके अलावा खाने-पीने को लेकर कोई गंभीरता नहीं थी। खाना ऐसा होता था कि जल्दी गले से नहीं उतरता था।
स्नेहलता को लगभग 8 महीने जेल में रखा गया था। धीरे-धीरे उनकी तबीयत में लगातार गिरावट आ रही थी। इसी वजह से उनको 15 जनवरी 1977 को जेल से बाहर निकाला गया। जेल से बाहर निकलने के बाद उनकी स्थिति ठीक नहीं थी। जानकारी के मुताबिक, मात्र 5 दिनों के भीतर ही उन्होंने दुनिया को अलविदा कह दिया।
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जेल में स्नेहलता रेड्डी को केवल शारीरिक ही नहीं बल्कि भीषण मानसिक यातनाएं भी दी गईं। उन्हें 'सॉलिटरी कन्फाइनमेंट' (एकांत कारावास) में रखा गया था, जहाँ उन्हें किसी से भी बात करने की अनुमति नहीं थी। वे अपनी कोठरी में अकेली रहती थीं और रात के सन्नाटे में उन्हें जेल में अन्य महिला कैदियों को पीटे जाने की आवाजें सुनाई देती थीं। इन आवाजों और चीखों ने उन्हें मानसिक रूप से तोड़ दिया था। अस्थमा की गंभीर मरीज होने के बावजूद उन्हें गंदी और धूल भरी कोठरी में रखा गया और आपातकालीन चिकित्सा सहायता से भी वंचित रखा गया।
अटल बिहारी वाजपेयी ने स्नेहलता रेड्डी की इस दुर्दशा पर गहरा दुख व्यक्त किया था। उन्होंने बाद में अपने संस्मरणों में जिक्र किया कि स्नेहलता रेड्डी को जब जेल में यातनाएं दी जाती थीं, तो उनके चीखने की आवाजें उनके पास तक पहुँचती थीं। अटल जी ने यहाँ तक कहा था कि जेल के भीतर उनके साथ जो अमानवीय व्यवहार हुआ, उसने उन्हें मौत के मुहाने पर लाकर खड़ा कर दिया। अटल जी ने उन्हें 'आपातकाल की पहली शहीद' के रूप में सम्मान दिया और सत्ता की उस क्रूरता की कड़ी निंदा की जिसने एक कोमल हृदय कलाकार का बलिदान ले लिया।
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