भारतीय संविधान के अनुच्छेद 371A के तहत नागालैंड कि भूमि को नागा समुदाय के लिए संरक्षित किया गया। आज नागालैंड ईसाई बहुल राज्य के रूप में स्थापित है। X
इतिहास

नागालैंड में हिंदू-साधू संतों के प्रवेश पर रोक! जवाहर लाल नेहरू ने क्यों लिया था ये फैसला? जानें पूरा सच

आज नागालैंड ईसाई बहुल राज्य के रूप में स्थापित है। कुछ समय से नागालैंड की डेमोग्राफी में परिवर्तन की आशंका जताई जा रही है।

Author : Pradeep Yadav
Reviewed By : Mayank Kumar

  • नागालैंड ब्रिटिश काल से स्वतंत्र जनजातीय क्षेत्र रहा है। 1826 की यांडबू संधि के बाद अंग्रेजों का प्रवेश हुआ और कर-प्रणाली व प्रशासन के विरोध में संघर्ष बढ़ा। आज़ादी के बाद नागा नेशनल काउंसिल के नेतृत्व में अलग राष्ट्र की माँग तेज हुई, जिसके परिणामस्वरूप सशस्त्र बल विशेष अधिकार अधिनियम लागू किया गया।

  • 16-सूत्रीय समझौते के आधार पर 1963 में नागालैंड का गठन हुआ। जवाहरलाल नेहरू के नेतृत्व में अनुच्छेद 371A के तहत नागा जनजातियों को भूमि, संसाधन, संस्कृति और परंपराओं पर विशेष अधिकार दिए गए तथा इनर लाइन परमिट (ILP) व्यवस्था को बनाए रखा गया।

  • 19वीं शताब्दी से ईसाई मिशनरियों (विशेषकर अमेरिकी बैपटिस्ट) के प्रभाव से ईसाई आबादी बढ़ती गई। ILP और भूमि-संरक्षण के कारण बाहरी बसावट सीमित रही, परिणामस्वरूप नागालैंड की जनसंरचना धीरे-धीरे बदली और आज यह भारत का सबसे अधिक ईसाई बहुल राज्य बन गया (लगभग 88–90%)।

भारत के उत्तर-पूर्व का हिस्सा काफी संवेदनशील हिस्सा माना जाता है। आजादी के बाद से लगातार उत्तर-पूर्व क्षेत्र में सुरक्षा को लेकर अलग-अलग समय पर कानून बनते चले गए। इसमें से एक राज्य नागालैंड है,जहां समय समय पर संघर्ष देखने को मिलते रहे हैं। ब्रिटिश काल से लेकर आजादी के बाद तक नागालैंड में अलग-अलग रूप में संघर्ष दिखाई पड़े हैं। नागालैंड पहला राज्य है जो जाति की पहचान पर बना राज्य है। कुछ समय से नागालैंड की डेमोग्राफी में परिवर्तन की आशंका जताई जा रही है। नागालैंड के बदलते डेमोग्राफी को इतिहास सहित कुछ इस प्रकार समझ सकते हैं।

नागालैंड का संक्षिप्त इतिहास कुछ इस प्रकार है -

ब्रिटिश (British) लोगों के आने के नागालैंड (Nagaland) पहले प्राचीन काल से ही एक स्वतंत्र जीवन यापन करने वाली जनजातियों का क्षेत्र था। अंग्रेजों के द्वारा 1826 के यांडबू संधि के माध्यम से असम क्षेत्र पर अधिकार कर लिया गया। इसके बाद अंग्रेजों का परिचय नागा क्षेत्रों से हुआ। अंग्रेज अधिकारियों कैप्टन जेनकिंस और कैप्टन पेम्बर्टन के द्वारा जब सर्वेक्षण किया जा रहा था तो उनका सामना इन नागा जनजातियों के पहाड़ी क्षेत्रों से हुआ। इन नागा क्षेत्रों का अंग्रेजों ने बहुत फायदा उठाया और नागा क्षेत्र को असम में धीरे-धीरे मिलाने का सिलसिला चलता रहा। साल 1878 तक नागा पहाड़ी क्षेत्रों को असम का जिला घोषित कर दिया गया और जी. एच. डेमन्ट को पहला डिप्टी कमिश्नर नियुक्त किया गया। अंग्रेजों द्वारा नए कर प्रणाली लागू करने के पश्चात इस क्षेत्र के नागा लोगों ने अंग्रेजों से असहमति जताई। बाद में यह असहमति प्रत्यक्ष संघर्ष में तब्दील हो गया। मामला आगे बढ़ने पर जी. एच. डेमन्ट (पहला डिप्टी कमिश्नर), की हत्या खोनोमा गाँव के पास में अंगामी नागा लोगों द्वारा कर दी गई। 

अंग्रेजों से नागा (Naga) लोगों का संघर्ष लम्बे समय तक जारी रहा। बीतते समय के साथ नागा जनजातियों में राजनीतिक चेतना बढ़ती चली गई। साल 1929 तक नागा लोगों की अपनी एक क्लब बन चुकी थी। इस समय तक नागा लोगों ने अंग्रेजों से स्वायतत्ता की मांग शुरू कर दी थी। भारत के स्वतंत्रता की लड़ाई के साथ में नागा संघर्ष भी आगे बढ़त चला गया। 

परिणामस्वरूप साल 1946 तक  नागा नेशनल काउंसिल का गठन किया जा चुका था। इस काउंसिल का नेतृत्व ए. ज़ेड. फ़िज़ो कर रहे थे। 

 नागा नेशनल काउंसिल की मांग उस समय यही थी कि भारत से अलग राष्ट्र के रूप में नागालैंड को पहचान दी जाए। आजादी के समय नागालैंड असम का हिस्सा था। अतः आसानी से भारत का हिस्सा बन गया। परंतु कुछ जनजातियों ने इसे स्वीकार करने से इनकार कर दिया।

आजादी के बाद नेहरू और नागालैंड 

आजादी के बाद देश के पहले प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू (Jawahar Lal Nehru) बने। दूसरी तरफ नागा नेशनल काउंसिल (Naga National Council) ने साल 1950 तक सशस्त्र संघर्ष छेड़ दिया। 1951 तक NNC ने तो जनमत संग्रह कराकर इसको अलग करने कि मांग कि धार को और तेज कर दिया।

1956 तक यह संघर्ष काफी भयानक रूप ले चुका था। परिणामस्वरूप नागालैंड पर भारत सरकार ने 11 सितंबर 1958 सशस्त्र बल विशेष अधिकार अधिनियम (AFSPA) लागू कर दिया। साल 1957 में एनपीसी (NPC) गठित कि जा चुकी थी। जिसने इस मामले के समाधान हेतु शांति का रास्ता ढूंढा। साल 1960 तक नागा लोगों की एनपीसी (NPC) द्वारा, 16 सोलह सूत्रीय समझौता के आधार पर भारत के प्रधानमंत्री नेहरू ने 1963 में नागा जनजातियों के लिए एक अलग राज्य नागालैंड का गठन किया। उनकी मांग के आधार पर भारतीय संविधान के अनुच्छेद 371A के तहत उनको विशेष संवैधानिक अधिकार नेहरू सरकार से मिले। इसके आधार पर नेहरू ने  नागालैंड में नागा जनजातियों कि पहचान,उनकी संस्कृति,भूमि और प्राकृतिक संसाधन इत्यादि के संरक्षण कि बात दोहराई। 

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नागालैंड में अब तक किसकी आबादी और कैसे बढ़ी?

19 वीं शताब्दी में जब अंग्रेज भारत के नागालैंड से परिचित हुए तो वहाँ पर ईसाई मिशनरियों के आगमन भी हुए। बता दें कि चार्टर एक्ट 1813 के तहत ईसाई मिशनरियों को भारत में आकर धर्म के प्रचार-प्रसार कि अनुमति मिल चुकी थी।

इसके बाद जब असम पर अंग्रेजों का अधिकार 1826 में  हुआ तो बहुत सारे ईसाई मिशनरी नागा क्षेत्रों में आए। इनमे अमेरिकी बैपटिस्ट मिशनरी प्रमुख थे। इसी का प्रभाव रहा कि जब तक नागालैंड का गठन हुआ नागालैंड में ईसाइयों कि संख्या लगभग 60% के आस-पास हो गई। नागालैंड  में ईसाइयों कि संख्या लगातार बढ़ती चली गई।

आज नागालैंड ईसाई बहुल राज्य है। यहाँ पर ईसाइयों कि जनसंख्या लगभग 88%-90% है। आज नागालैंड पूरे भारत में सबसे अधिक ईसाई जनसंख्या वाला राज्य है।

कैसे बदल गई नागालैंड कि डेमोग्राफी? 

बता दें कि नागालैंड के लिए  सोलह सूत्रीय समझौता के तहत इंनर लाइन परमिट कि व्ययस्था को बरकरार रखा गया था। नागालैंड में इनर लाइन परमिट (ILP) प्रणाली कि शुरुआत, बंगाल ईस्टर्न फ्रंटियर रेगुलेशन एक्ट , 1873 के तहत की गई थी। इस व्यवस्था को साल 1963 में नागालैंड के निर्माण के समय प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू ने यह कहकर बनाए रखा कि नागालैंड में बाहरी विकास कि मुख्यधारा को अनावश्यक रूप से नहीं थोपा जा सकता है। नागालैंड में नागा जनजातियों कि संस्कृति, उनकी पहचान को बरकरार रखने के लिए बाहरी हस्तक्षेप को प्रतिबंधित होना चाहिए। 

भारतीय संविधान के अनुच्छेद 371A के तहत नागालैंड कि भूमि को नागा समुदाय के लिए संरक्षित किया गया। इसका परिणाम यह हुआ कि नागालैंड में कोई बाहरी  व्यक्ति आसानी से जमीन लेकर वहाँ स्थाई रूप से बस नहीं सकता है। अन्य बाहरी लोगों  के लिए वहाँ सीमित समय के लिए नौकरी करने,घूमने इत्यादि कि व्यवस्था कि गई है। शायद यह एक बहुत बड़ा कारण रहा कि नागालैंड कि डेमोग्राफी धीरे-धीरे बदलती रही और आज नागालैंड ईसाई बहुल राज्य के रूप में स्थापित है।