क्या आप जानते हैं भारत का पहला बैंक कौन सा था? और क्या सच में उस बैंक में भारतीयों को प्रवेश की अनुमति नहीं थी? यह सवाल सुनकर हैरानी होना लाज़मी है, लेकिन 18वीं सदी के ब्रिटिश काल में ऐसा ही एक बैंक अस्तित्व में आया था, जिसने इतिहास में कई सवाल खड़े किए और उस दौर में भारत की अर्थव्यवस्था पर अंग्रेजों का पूरा कंट्रोल था।
साल 1770 में कलकत्ता में ‘बैंक ऑफ हिंदुस्तान’ की स्थापना ब्रिटिश एजेंसी हाउस अलेक्जेंडर एंड कंपनी (Alexander and Company) द्वारा की गई। इसे भारत का पहला बैंक माना जाता है। लेकिन समय के साथ यह आरोप लगने लगें कि इसकी सेवाएं मुख्य रूप से अंग्रेज अधिकारियों और व्यापारियों तक ही सीमित हैं, जिससे भेदभाव की भावना झलकती थी। तो सवाल यह उठता है कि क्या सच में भारतीयों की एंट्री पर यहां रोक लगा दी गई थी? आइए जानते है।
बैंक ऑफ हिंदुस्तान (‘Bank of Hindustan’) को भारत के इतिहास में पहला बड़ा बिज़नस बैंक माना जाता है। इसकी स्थापना 1770 में तब की गई थी जब भारत ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कंपनी के कंट्रोल में था। उस समय भारत में कोई व्यवस्थित बैंकिंग सिस्टम नहीं था, अधिकांश लोग साहूकारों, बर्तनों और पारंपरिक लेन-देन पर ही निर्भर रहते थे। ऐसे में बैंक जैसे एक संस्था की स्थापना खुद में सवाल बनी हुई थी। आपको बता दें कि इस बैंक की स्थापना ब्रिटिश एजेंसी हाउस “Alexander and Company” ने की थी, जो उस समय व्यापार और वित्त से जुड़ी कई गतिविधियों में लगी हुई थी।
बैंक ऑफ हिंदुस्तान ने भारत में आधुनिक बैंकिंग की नींव रखी और कुछ वर्षों के लिए सफलतापूर्वक काम किया। लेकिन आर्थिक समस्याओं के कारण 1832 में इस बैंक को बंद कर दिया गया। अब चूंकि भारत के लोगों को बैंक जैसी व्यवस्था के बारे में न जानकारी थी और न ही कोई शिक्षा इसलिए अनपढ़ लोग तो इस व्यवस्था से जुड़ने को डरते थे। बैंक मुख्य रूप से ब्रिटिश हितों के लिए ही काम कर रहा था, भारतीयों के लिए नहीं।
18वीं सदी में स्थापित बैंक ऑफ हिंदुस्तान (‘Bank of Hindustan’) उस दौर में काम कर रहा था जब भारत पर पूरी तरह अंग्रेजों का राजनीतिक और आर्थिक नियंत्रण था। यह बैंक ब्रिटिश एजेंसी हाउस Alexander and Company द्वारा चलाया जाता था और इसका मुख्य उद्देश्य अंग्रेज अधिकारियों, सैनिकों और व्यापारियों को वित्तीय सेवाएं देना था। उस समय की व्यवस्था ऐसी थी कि बैंक की सेवाएं लगभग पूरी तरह यूरोपीय ग्राहकों तक सीमित थीं। भारतीयों को आम तौर पर बड़े खाताधारक बनने या बैंक से व्यापारिक ऋण लेने की अनुमति नहीं दी जाती थी। यदि किसी भारतीय को सेवा मिलती भी थी, तो वह सीमित और सख्त शर्तों के साथ होती थी। आई जानतें हैं कि भारतीयों को किन किन चीजों की अनुमति नहीं थी ।
भारतीय को ग्राहक के रूप में बराबरी का अधिकार नहीं था। भारतीय व्यापारियों को उस स्तर की बैंकिंग सुविधा नहीं मिलती थी, जो अंग्रेजों को मिलती थी। बड़े ऋण, व्यापारिक क्रेडिट और विशेष वित्तीय सुविधाएं सिर्फ़ अंग्रेजों के लिए आरक्षित रहती थीं।
भारतीयों को उच्च पदों पर नौकरी नहीं तक नहीं दी जाती थी। बैंक के प्रबंधक, अधिकारी और निर्णय लेने वाले पद लगभग पूरी तरह अंग्रेजों के हाथ में थे। भारतीयों को केवल निचले स्तर की नौकरियों तक सीमित रखा जाता था।
उन्हें निर्णय प्रक्रिया में भागीदारी नहीं मिलती थी। बैंक की नीतियां और फैसले अंग्रेज अधिकारियों द्वारा तय किए जाते थे। भारतीयों की इसमें कोई भूमिका नहीं थी।
यहां तक कि भारतीयों पर विश्वास तक नहीं किया जाता था और उनके साथ भेदभाव जैसी घटनाएं भी सामने आई। उस समय अंग्रेजों की सोच यह थी कि भारतीय आर्थिक मामलों में “विश्वसनीय” नहीं हैं। जिसके कारण भारतीयों को महत्वपूर्ण वित्तीय संस्थानों से दूर रखा गया।
भारत का पहला बैंक, बैंक ऑफ हिंदुस्तान 1832 में बंद हो गया। इसके बंद होने की मुख्य वजह यह थी कि इसे ईस्ट इंडिया कंपनी का आधिकारिक समर्थन नहीं मिला, क्योंकि कंपनी अपने नियंत्रण में बैंकिंग सिस्टम चाहती थी। इसके अलावा बैंक के पास पर्याप्त पूंजी (Capital), मजबूत मैनजमेंट (Management) और साफ़ नियम (Banking Rules) नहीं थे, जिससे व्यापारियों और सरकार का भरोसा नहीं बन पाया। युद्धों और व्यापारिक घाटे ने भी इसकी आर्थिक हालत कमजोर कर दी थी। इस कमी को पूरा करने के लिए अंग्रेजों ने सरकारी नियंत्रण वाले बैंक बनाए, जैसे बैंक ऑफ कलकत्ता, बैंक ऑफ बॉम्बे और बैंक ऑफ मद्रास। इन बैंकों को मिलाकर प्रेसीडेंसी बैंक (Presidency Banks) कहा गया, जिन्होंने आगे चलकर भारत की आधुनिक बैंकिंग व्यवस्था की नींव रखी। [SP/MK]