भारत के इतिहास में कुछ ऐसे महान लोग हुए हैं, जिन्होंने समाज को बदलने के लिए अपनी पूरी जिंदगी समर्पित कर दी। उन्हीं में से एक थे धोंडो केशव करवे (Dhondo Keshav Karve), जिन्हें महर्षि करवे (Maharshi Karve) के नाम से जाना जाता है। उनकी कहानी संघर्ष, त्याग और दृढ़ संकल्प की मिसाल है। कहा जाता है कि उन्होंने 175 किलोमीटर की कठिन यात्रा सिर्फ परीक्षा देने के लिए तय की, लेकिन असफल होने के बाद भी उन्होंने हार नहीं मानी। यही जज्बा उन्हें आगे बढ़ाता रहा। उस समय जब महिलाओं की शिक्षा को समाज में महत्व नहीं दिया जाता था, तब करवे जी ने इसे अपना मिशन बना लिया। उनका सपना था कि महिलाएं भी पढ़-लिखकर आत्मनिर्भर बनें। यही सोच उन्हें भारत का पहला महिला विश्वविद्यालय (First Women's University) स्थापित करने की ओर ले गई। उनकी यह यात्रा आसान नहीं थी, लेकिन उनके हौसले ने इतिहास रच दिया। तो लिए थोड़ी और विस्तार से हम महर्षी करवे के बारे में जानते हैं।
धोंडो केशव करवे (Dhondo Keshav Karve) एक महान समाज सुधारक, शिक्षक और महिला शिक्षा के प्रबल समर्थक थे। उनका जन्म 18 अप्रैल 1858 में महाराष्ट्र में हुआ था। साधारण परिवार से आने वाले करवे जी ने अपने जीवन में कई कठिनाइयों का सामना किया, लेकिन उन्होंने कभी अपने लक्ष्य से समझौता नहीं किया। 1891 में वे फर्ग्यूसन कॉलेज (Fergusson College) में गणित के प्रोफेसर बने और शिक्षा के क्षेत्र में अपनी पहचान बनाई। उनकी पहली पत्नी राधाबाई के निधन के बाद उन्होंने विधवाओं की स्थिति को करीब से समझा और उनके उत्थान के लिए काम करने का निर्णय लिया। उस समय समाज में विधवाओं के साथ भेदभाव होता था, लेकिन करवे जी ने इसके खिलाफ आवाज उठाई। वे मानते थे कि शिक्षा ही महिलाओं को सशक्त बना सकती है।
महर्षि करवे (Maharshi Karve) सिर्फ सोचने वाले नहीं थे, बल्कि बदलाव को जीने वाले इंसान थे। उस दौर में जब विधवाओं को समाज में सम्मान नहीं मिलता था, उन्होंने 1893 में विधवा विवाह (Widow Marriage) को बढ़ावा देने के लिए संगठन की स्थापना की और एक नई सोच की शुरुआत की। सबसे खास बात यह रही कि उन्होंने सिर्फ दूसरों को समझाया ही नहीं, बल्कि खुद एक विधवा से विवाह कर समाज के सामने एक मजबूत उदाहरण पेश किया।
उनकी नजर में असली बदलाव शिक्षा से ही संभव था। इसलिए उन्होंने महिलाओं के लिए स्कूल और आश्रम खोले, जहां उन्हें पढ़ने-लिखने के साथ आत्मनिर्भर बनने की सीख दी जाती थी। उस समय यह कदम किसी क्रांति से कम नहीं था। करवे जी मानते थे कि जब तक महिलाएं शिक्षित और सशक्त नहीं होंगी, तब तक समाज आगे नहीं बढ़ सकता।
1916 में, 57 वर्ष की उम्र में, महर्षि करवे ने एक ऐसा कदम उठाया, जिसने इतिहास बदल दिया। उन्होंने भारत का पहला महिला विश्वविद्यालय स्थापित किया, जिसे आज एसएनडीटी महिला विश्वविद्यालय (SNDT Women's University) के नाम से जाना जाता है। इसकी शुरुआत बेहद साधारण थी, सिर्फ 5 छात्राओं के साथ, लेकिन इसके पीछे सपना बहुत बड़ा था। महिलाओं को शिक्षा के जरिए आत्मनिर्भर बनाना।
शुरुआती दौर आसान नहीं था। समाज का विरोध, पैसों की कमी और सीमित संसाधनों के बावजूद करवे जी ने हार नहीं मानी। वे खुद गांव-गांव जाकर लोगों को समझाते थे कि बेटियों को पढ़ाना क्यों जरूरी है। उन्होंने इस मिशन के लिए यूरोप, अमेरिका और जापान तक का सफर किया, वहां व्याख्यान दिए और दान जुटाया। धीरे-धीरे यह पहल एक आंदोलन बन गई। आज इस विश्वविद्यालय के कई कैंपस मुंबई, पुणे और अन्य शहरों में हैं जहां हजारों नहीं, बल्कि लाखों महिलाएं पढ़ चुकी हैं। अपने जीवन के अंतिम वर्षों में भी, 100 साल की उम्र पार करने के बाद, वे इस मिशन से जुड़े रहे, और तब इस संस्थान में 70,000 से अधिक छात्राएं शिक्षा ले रही थीं। यह सिर्फ एक यूनिवर्सिटी नहीं, बल्कि महिलाओं की आज़ादी और आत्मनिर्भरता का प्रतीक बन चुकी है।
महर्षि करवे के असाधारण कार्यों को न सिर्फ भारत, बल्कि पूरी दुनिया ने सम्मान दिया। उनके जीवनभर के योगदान के लिए उन्हें 1958 में भारत का सर्वोच्च नागरिक सम्मान भारत रत्न (Bharat Ratna) से नवाजा गया। इससे पहले उन्हें पद्म विभूषण (Padma Vibhushan) जैसे प्रतिष्ठित पुरस्कार भी मिल चुके थे। कई विश्वविद्यालयों ने उन्हें मानद उपाधियां देकर उनके कार्यों को सराहा। यह उनके काम की वैश्विक पहचान को दर्शाता है। 4 नवंबर 1962 को, 104 वर्ष की आयु में उनका निधन हुआ, लेकिन उनके द्वारा शुरू किया गया बदलाव आज भी जीवित है। महर्षि करवे का जीवन हमें सिखाता है कि एक मजबूत इरादा और निस्वार्थ सेवा से इतिहास बदला जा सकता है। [SP]