फ़िजी में 1879–1916 के बीच भारतीय गिरमिटिया मजदूरों को Indian Emigration Act of 1870 और Indian Emigration Act of 1883 के तहत लाया गया। उत्तर प्रदेश और बिहार से आए मजदूर अपने साथ चैता, फगवा, बिरहा और कजरी जैसे लोकगीत भी लाए, जो होली के समय सामूहिक रूप से गाए जाते थे।
गिरमिटिया मजदूरों का जीवन कठोर था, समय पर काम पूरा नहीं होने पर कठोर सजा दी जाती थी।
पाकिस्तान में 2023 में Higher Education Commission of Pakistan ने विश्वविद्यालय परिसरों में होली समारोहों पर रोक संबंधी नोटिस जारी किया था।
फ़िजी एक ऐसा देश है जहां पर भारतीय मजदूरों का अपना एक लंबा इतिहास है। औपनिवेशिक काल में भारतीय नागरिकों को मजदूरी कराने के लिए अन्य देशों में भेजा जाता था। फ़िजी में भारतीय संस्कृति की छाप देखी जा सकती है। आज भी फ़िजी में भारतीय त्यौहारों को मनाने की परंपरा बरकरार है। लेकिन फ़िजी में होली में मनाने की शुरुआत कैसे हुई, यहाँ उसी की चर्चा की जा रही है।
दरअसल, औपनिवेशिक काल में ब्रिटिश (British) साम्राज्य के दूसरे उपनिवेशों में काम करने के लिए मजदूरों की आवश्यकता थी। फ़िजी भी उस समय ब्रिटिश साम्राज्य का हिस्सा था। वहाँ पर बागानों की रखवाली, खेतों में काम करने के लिए बहुत सारे मजदूरों की आवश्यकता थी।
भारतीय प्रव्रजन अधिनियम 1870 और 1883 (Indian Emigration Act of 1870 and 1883) के तहत भारत से बहुत सारे लोगों को गिरमिटिया मजदूर के रूप में फ़िजी ले जाने का सिलसिला शुरू हुआ। मुख्य रूप से उत्तर भारत के बिहार और उत्तर प्रदेश से काफी संख्या में लोगों को फ़िजी लाया गया। बिहार और उत्तर प्रदेश के लोग अपने साथ में भारत देश की संस्कृति को भी अपने साथ ले गए। वहाँ काम करने के दरमियान अक्सर बिहार और उत्तर प्रदेश से गए मजदूर लोकगीतों को गाया करते थे।
उस समय जब होली का समय आता, तो गिरमिटिया मजदूर समूह में इकट्ठा होकर एक साथ चैता,फगवा, बिरहा, कजरी जैसे परंपरागत गीतों को मनोरंजन के लिए गाते थे।
दरअसल, गिरमिटिया मजदूर जब इन लोकगीतों को गाते थे, तो ब्रिटिश अधिकारियों को भी काफी आनंद आता था। सामान्य तौर पर गिरमिटिया मजदूरों का जीवन काफी कठिन था। सप्ताह भर काम करना होता था। दिए गए कार्य को समय पूरा न करने पर सजा का प्रावधान भी था।
परंतु इन सबके अलावा, इस तरीके के परंपरागत त्यौहारों पर, उनके द्वारा इस तरीके से जो लोकगीत गाए जाते थे, वो ब्रिटिश अधिकारियों को काफी पसंद आते थे। इसलिए इस तरीके के त्यौहारों पर स्थानीय अधिकारी की तरफ से छूट दी जाती थी। स्थानीय अधिकारी भी इन गीतों का आनंद लेते थे।
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फ़िजी के बारे में और गिरमिटिया मजदूरों के बारे में शोध करने वाले प्रवीण कुमार का कहना है कि बहुत सारे गिरमिटिया मजदूरों को मजदूरी नहीं मिलती थी। उनका कहना है कि नावा में बहुत सारे गिरमिटिया मजदूर मर गए थे। उनके बच्चे जो पैदा होते थे, वे भी वहीं द्वीप के पास में दफना दिए गए।
प्रवीण कुमार आगे बताते हैं कि काफी समय हो गए, लगभग 140 साल का समय बीत गया है, अभी तक किसी की नजर यहाँ दफनाए गए बच्चों पर नहीं पड़ी है। वैनकवा शुगर मिल 1923 के आसपास बंद किया गया तो गन्ना की खेती करने वाले मजदूरों को आधे दिन काम करने और आधा दिन चैता गाने के लिए कहा गया, क्योंकि गोरे लोगों को इस चैता से बहुत आनंद मिलता था। उनका कहना है कि फ़िजी में यहीं से होली के दिन सार्वजनिक रूप से अवकाश की शुरुआत होती है।
भारतीय संस्कृति से जुड़े लोग जहां भी रहते हैं, उनके द्वारा होली बड़ी धूमधाम से मनाई जाती है। अमेरिका, कनाडा, ब्रिटेन सहित कई देशों में होली मनाई जाती है। होली के अवसर पर एनआरआई भी कोशिश करते हैं कि अपने देश आ जाएं, पर जब यह संभव नहीं हो पाता तो वे लोग वहीं पर होली मनाते हैं।
बहुत सारे मुस्लिम देशों (Muslim Countries) में भी होली मनाई जाती है जैसे- बांग्लादेश,पाकिस्तान,संयुक्त अरब अमीरात,कतर कुवैत, ओमान जैसे देशों में भारतीय संस्कृति से जुड़ाव रखने वाले लोग होली को बड़ी संजीदगी से मनाते हैं। हालांकि मुस्लिम देशों में प्रायः देखा जाता है कि सार्वजनिक रूप से मनाने की अनुमति लेनी पड़ती है, इसलिए इन देशों में सीमित मात्रा में होली का प्रभाव दिखाई पड़ता है।
पाकिस्तान की उच्च शिक्षा आयोग (Higher Education Commission of Pakistan) ने साल 2023 में एक नोटिस निकाला था कि होली जैसे किसी रंग वाले त्यौहार से देश की संस्कृति पर नकारात्मक प्रभाव पड़ता है इसलिए विश्वविद्यालय के परिसर में इस तरीके के रंग वाले त्यौहार पर प्रतिबंध है। बाद में इसमें थोड़े बहुत सुधार हुए और कहा गया कि पूरे देश में होली पर प्रतिबंध नहीं है।