मुगल-ए-आज़म' के लिए उस्ताद बड़े ग़ुलाम अली खान साहब गाना नहीं चाहते थे। एक निर्देशक की जिद ने उनको फिल्म में खींच लिया।  X
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मुगल-ए-आज़म: अनारकली और सलीम का प्रेम ! 'खान साहब गाना तो आप ही गाएंगे' के. आसिफ के सामने पस्त हो गए थे बड़े ग़ुलाम अली खान

5 अगस्त 1960 का दिन भारतीय सिनेमा के लिए एक ऐतिहासिक दिन था। इस तारीख को भारतीय सिनेमाघरों में एक फिल्म रिलीज हुई थी, जिसका नाम 'मुगल-ए-आज़म' था। मुगल-ए-आज़म का वह जादुई गाना जिसने भारतीय सिनेमा पर अमिट छाप छोड़ा। इस फिल्म में उस्ताद बड़े ग़ुलाम अली खान की आवाज़ ने फिल्म में चार चाँद लगा दिए थे।

Author : Pradeep Yadav

  • संगीत की कोई सीमा नहीं होती, और उस्ताद बड़े ग़ुलाम अली खान साहब की आवाज़ इसका सबसे बड़ा प्रमाण है। 'मुगल-ए-आज़म' का वह जादुई गाना जिसने भारतीय सिनेमा पर अमिट छाप छोड़ा । इस फिल्म में उस्ताद बड़े ग़ुलाम अली खान की आवाज़ ने फिल्म में चार चाँद लगा दिए थे। लेकिन ग़ुलाम अली खान इस फिल्म में गाना नहीं चाहते थे। के. आसिफ की जिद ने उनको फिल्म में खींच लिया।

5 अगस्त 1960 का दिन भारतीय सिनेमा के लिए एक ऐतिहासिक दिन था। इस तारीख को भारतीय सिनेमाघरों में एक फिल्म रिलीज हुई थी, जिसका नाम 'मुगल-ए-आज़म' था। यह फिल्म भारतीय सिनेमा के इतिहास में एक अमिट छाप छोड़ गई। इस फिल्म को बनाने के लिए निर्देशक के. आसिफ ने दिलीप कुमार, मधुबाला सहित अन्य कलाकारों को इकट्ठा करने में बहुत मेहनत की थी।

इस फिल्म के कई गाने आज भी जीवंत हैं। इस फिल्म में उस्ताद बड़े ग़ुलाम अली खान की आवाज़ ने फिल्म में चार चाँद लगा दिए थे। लेकिन ग़ुलाम अली खान इस फिल्म में गाना नहीं चाहते थे। के. आसिफ की जिद ने उनको फिल्म में खींच लिया, और इस घटनाक्रम की कहानी बड़ी रोमांचक है।

के. आसिफ ने ग़ुलाम अली खान को कैसे मनाया ?

संगीत निर्देशक नौशाद अली ने इस घटना को बहुत बेहतरीन तरीके से साझा किया है। उनके अनुसार, के. आसिफ 'तानसेन' की धुन को गाने वाले एक ऐसे गायक की तलाश कर रहे थे, जो उस शास्त्रीयता को जीवंत कर सके।

जब के. आसिफ ने नौशाद अली से पूछा कि तानसेन के गाने को कौन गा सकता है, तो उन्होंने उस्ताद बड़े ग़ुलाम अली खान के नाम का सुझाव दिया। नौशाद अली की बात से सहमत होकर के. आसिफ, ग़ुलाम अली से मिलने निकल पड़े।

जब वे दोनों ग़ुलाम अली के घर पहुंचे, तो नौशाद अली ने के. आसिफ का परिचय उनसे करवाया। इसके बाद उन्होंने ग़ुलाम अली से कहा कि एक ऐसी फिल्म बन रही है जो दोबारा कभी नहीं बन सकती। इस फिल्म में तानसेन का एक गाना प्रयोग किया गया है, और हम इस गाने में आपकी आवाज़ चाहते हैं।

ग़ुलाम अली तुरंत बोले, मैं यह नहीं कर सकता। इस पर के. आसिफ ने मुंह में सिगरेट का धुआं छोड़ते हुए राहत भरी आवाज़ में कहा, खान साहब ! गाना तो आप ही गाएंगे।

इसके बाद ग़ुलाम अली, नौशाद अली को एक तरफ ले गए। नौशाद अली ने ग़ुलाम अली से कहा, साहब, वे बड़ी उम्मीद से आपके पास आए हैं। अगर आप तैयार नहीं हुए तो हमारी बेइज्जती हो जाएगी। ग़ुलाम अली ने कहा, ऐसा काम करते हैं कि आपकी इज्जत भी बच जाए और के. आसिफ मुझे इनकार कर दें। उन्होंने मन में सोचा कि इतनी बड़ी रकम मांगेंगे कि आसिफ खुद ही पीछे हट जाएंगे। ग़ुलाम अली ने कहा, आसिफ साहब, हम गाने के लिए तैयार हैं, लेकिन इसकी रकम बहुत महंगी है।

के. आसिफ ने कहा, खान साहब, इस फिल्म में गाना आप ही गाएंगे, आप सिर्फ कीमत बताइए। ग़ुलाम अली ने कहा कि इस गाने के लिए 25 हजार लगेंगे। उस दौर में यह एक बहुत बड़ी रकम थी। के. आसिफ ने तुरंत जेब से 10 हजार निकालकर ग़ुलाम अली के सामने रखते हुए कहा, खान साहब! ये आपके लिए छोटी सी अमानत है, बाकी आपको जल्द मिल जाएंगे।

नौशाद अली बताते हैं कि उस जमाने में बड़े से बड़ा पार्श्व गायक पांच सौ या हजार रुपये में गाना गाने की कीमत लेता था, लेकिन के. आसिफ और ग़ुलाम अली खान साहब दोनों के जिद ने इस गाने को इतना महंगा बना दिया।

इसके बाद ग़ुलाम अली ने 'मुगल-ए-आज़म' फिल्म में गाना गाया। यह वही गाना था जिसमें दिखाया गया है कि अनारकली और शहजादा सलीम एक-दूसरे के प्रेम में लीन हैं।

ग़ुलाम अली ने 'मुगल-ए-आज़म' फिल्म में गाना गाया। यह वही गाना था जिसमें दिखाया गया है कि अनारकली और शहजादा सलीम एक-दूसरे के प्रेम में लीन हैं। इस फिल्म के इस भाग को लोगों काफी पसंद किया। फिल्म में दिखाया गया है कि अनारकली और सलीम एकदूसरे के प्रेम में खो गए थे। यह कहानी बहुत ही मनमोहक साबित हुई थी।

मुगल-ए-आज़म और खान साहब की आवाज़ !

'मुगल-ए-आज़म' फिल्म अपने आप में भारतीय सिनेमा का एक ऐतिहासिक गौरव है। इसकी भव्यता, अभिनय और संगीत ने इसे अमर बना दिया। इस फिल्म में उस्ताद बड़े ग़ुलाम अली खान का गायन न केवल तकनीकी रूप से उत्कृष्ट था, बल्कि उसमें एक ऐसी रूहानी गहराई थी जो आज भी श्रोताओं को मंत्रमुग्ध कर देती है। उनकी आवाज़ की मिठास और शास्त्रीय गायन की बारीकियों ने फिल्म के दृश्य को एक अलग ही ऊंचाई प्रदान की।

आज इतने सालों के बाद भी, जब यह गाना बजता है, तो उस्ताद जी का प्रभाव स्पष्ट महसूस होता है। उन्होंने अपनी कला से साबित कर दिया कि संगीत की कोई सीमा नहीं होती और एक कलाकार का योगदान फिल्म को किस प्रकार इतिहास के पन्नों में अमर कर देता है।