लीला सैमसन ने 9 साल की उम्र में चुना नृत्य का रास्ता, बचपन का फैसला बना जिंदगी की पहचान IANS
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लीला सैमसन ने 9 साल की उम्र में चुना नृत्य का रास्ता, बचपन का फैसला बना जिंदगी की पहचान

भारतीय शास्त्रीय नृत्य की दुनिया में लीला सैमसन एक ऐसा नाम है, जिन्होंने भरतनाट्यम को सिर्फ एक कला नहीं, बल्कि जीवन का हिस्सा बना लिया।

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भारतीय शास्त्रीय नृत्य की दुनिया में लीला सैमसन एक ऐसा नाम है, जिन्होंने भरतनाट्यम को सिर्फ एक कला नहीं, बल्कि जीवन का हिस्सा बना लिया। उन्होंने बहुत छोटी उम्र में नृत्यांगना बनने की ठान ली थी। उनका यह फैसला आगे चलकर उनकी पहचान बन गया।

लीला सैमसन का जन्म 6 मई 1951 को तमिलनाडु के कूनूर में हुआ था। उनके पिता बेंजामिन अब्राहम सैमसन भारतीय नौसेना में अधिकारी थे और उनकी मां लैला को कला और संगीत से बेहद लगाव था। परिवार का माहौल ही ऐसा था कि बचपन से ही लीला का झुकाव कला की ओर हो गया। उनकी मां ने ही उन्हें इस दिशा में आगे बढ़ने के लिए प्रेरित किया।

जब लीला सिर्फ 9 साल की थीं, तब उनके पिता ने उन्हें चेन्नई के प्रसिद्ध संस्थान 'कलाक्षेत्र' में भेजा। यहीं से उनके जीवन की असली शुरुआत हुई। उन्होंने महान गुरु रुक्मिणी देवी अरुंडेल से भरतनाट्यम सीखा। इस दौरान उन्होंने अपनी पूरी जिंदगी इसी कला को समर्पित करने का फैसला भी लिया।

पढ़ाई के साथ-साथ लीला सैमसन ने नृत्य की साधना जारी रखी। उन्होंने अपनी पढ़ाई पूरी करने के बाद भी भरतनाट्यम सीखना नहीं छोड़ा। समय के साथ उनकी मेहनत रंग लाने लगी और वह एक बेहतरीन नृत्यांगना के रूप में पहचानी जाने लगीं।

अपने करियर की शुरुआत में उन्होंने दिल्ली के श्रीराम भारतीय कला केंद्र और गंधर्व महाविद्यालय में छात्रों को भरतनाट्यम सिखाया। धीरे-धीरे उन्होंने भारत ही नहीं, बल्कि विदेशों में भी अपनी कला का प्रदर्शन किया। यूरोप, अफ्रीका और अमेरिका जैसे देशों में भी उन्होंने मंच पर अपनी प्रस्तुति दी और भारतीय नृत्य को वैश्विक पहचान दिलाई।

1995 में लीला सैमसन ने 'स्पंदा' नाम का एक डांस ग्रुप बनाया। इसका मकसद भरतनाट्यम को नए तरीके से प्रस्तुत करना था, ताकि नई पीढ़ी भी इस कला से जुड़ सके। उन्होंने कई छात्रों को प्रशिक्षित किया, जो आगे चलकर खुद अच्छे कलाकार बने।

लीला सैमसन ने कला के साथ-साथ प्रशासनिक जिम्मेदारियां भी निभाईं। वह 2005 से 2012 तक कलाक्षेत्र की डायरेक्टर रहीं। इसके अलावा, वह संगीत नाटक अकादमी की चेयरपर्सन और सेंट्रल बोर्ड ऑफ फिल्म सर्टिफिकेशन (सीबीएफसी) की प्रमुख भी रहीं। इन पदों पर रहते हुए उन्होंने कला और संस्कृति के क्षेत्र में कई महत्वपूर्ण फैसले लिए।

उनके योगदान को देखते हुए उन्हें पद्मश्री सम्मान से नवाजा गया। इसके अलावा, उन्हें संगीत नाटक अकादमी पुरस्कार सहित कई बड़े सम्मान मिले।

हालांकि उनके करियर में कुछ विवाद भी सामने आए, लेकिन इसके बावजूद उनकी पहचान एक समर्पित कलाकार और शिक्षक के रूप में बनी रही। उन्होंने हमेशा कला को सबसे ऊपर रखा और अपनी पूरी जिंदगी इसी के लिए समर्पित की। [SP]

(यह रिपोर्ट IANS न्यूज़ एजेंसी से स्वचालित रूप से ली गई है। न्यूज़ग्राम इस कंटेंट की कोई ज़िम्मेदारी नहीं लेता।)