

मई 2009 को नितिन गडकरी के नागपुर स्थित घर के परिसर में खड़ी कार से 7 वर्षीय योगिता ठाकरे का शव मिला। पोस्टमार्टम में मौत का कारण दम घुटना बताया गया।
मामले की जांच पहले पुलिस और बाद में महाराष्ट्र सीआईडी को सौंपी गई। योगिता के माता-पिता अशोक ठाकरे और विमल ठाकरे ने हत्या और यौन शोषण की आशंका जताई तथा बॉम्बे हाई कोर्ट में CBI जांच की मांग की।
सामाजिक कार्यकर्ता किशोर समरिते ने भी सुप्रीम कोर्ट ऑफ इंडिया में PIL दायर की, लेकिन 10 मई 2013 को न्यायमूर्ति आर. एम. लोढ़ा की पीठ ने CBI जांच की मांग खारिज कर दी। मामले में अंतिम न्यायिक निष्कर्ष आज तक स्पष्ट नहीं हो पाया।
साल 2009 की बात है जब भाजपा के पूर्व राष्ट्रीय अध्यक्ष नितिन गडकरी की कार में एक नाबालिग बच्ची के शव को बरामद किया गया। उस समय मामले को लेकर बच्ची के माँ और पिता ने न्याय के लिए हर किसी का दरवाजा खटखटाया लेकिन बच्ची को न्याय अभी भी नहीं मिल पाया है। आइये पूरा मामला समझते हैं।
दरअसल, साल 2009 में नितिन गडकरी भारतीय जनता पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष रह चुके थे। उस समय नितिन गडकरी काफी चर्चित चेहरों में गिने जाते थे। 19 मई 2009 की रात को नितिन गडकरी के कार में एक नाबालिग बच्ची के शव को देखा गया। उस समय महाराष्ट्र (Maharashtra) पुलिस ने शव को बरामद किया और पोस्टमार्टम के लिए भेजा गया। पोस्टमार्टम के तहत पता चला कि बच्ची की उम्र करीब सात वर्ष थी। बच्ची का नाम योगिता के रूप में सामने आया। पोस्टमार्टम में यह सामने निकालकर आया कि बच्ची की मौत दम घुटने से हुई है।
इस मामले के बारे में जब नितिन गडकरी से सवाल किया गया कि बच्ची की रहस्यमयी मौत थी या कोई साजिश, तो नितिन गडकरी (Nitin Gadkari) का कहना था कि बच्ची कार के आसपास खेल रही थी और किसी कारणवश कार में बंद हो गई जिससे दम घुटने के कारण उसकी मौत हो गई।
बाद में नितिन गडकरी ने इस मामले में एक अन्य शख्स जिसका नाम किशोर इंगले था, उसके ऊपर यह आरोप लगाया कि इस इंगले गडकरी को ब्लैकमेल कर रहा था और कह रहा था कि यदि वे उसे पैसे दे देंगे तो वह मृतिका के माता-पिता को संभाल लेगा। यदि उसे पैसे नहीं मिले, तो वह गडकरी को इस प्रकरण में फंसा देगा। गडकरी के अनुसार, व्यक्ति के विरुद्घ कोतवाली में प्राथमिकी दर्ज कराई थी।
जानकारी के अनुसार, किशोर इंगले विद्यापीठ में लिपिक है एवं मृतिका योगिता ठाकरे के परिजनों का करीबी भी बताया जाता है। बता दें कि इस मामले की जांच सीआईडी कर रही थी। वहीं बच्चे के माता पिता का कहना है कि बच्ची के साथ शारीरिक शोषण हुआ है और उसको किसी ने मारा है।
योगिता के पिता अशोक ठाकरे पेशे से एक साधारण मजदूर हैं और माँ विमल ठाकरे दूसरों के घर पे जाकर काम करती हैं और परिवार का गुजर बसर इसी तरीके से चलता है। योगिता के अभिभावकों का कहना है कि बच्ची के साथ गलत हुआ है और उनका संदेह यहाँ तक जा रहा है कि बच्ची के साथ रेप भी हुआ है। माता-पिता ने इस मामले की जांच के लिए बंबई हाई कोर्ट में याचिका दायर की थी और मांग किये थे कि इस मामले की जांच सीबीआई को सौंपी जाए।
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इस केस को मई 2010 में सीआईडी (CID) को सौंपा गया था। करीब एक साल बाद मामले पर सीआईडी ने अपनी रिपोर्ट नागपुर कोर्ट के सामने रखा और इस केस को बंद करने की इजाजत मांगी। कोर्ट ने इस मामले पर नागपुर पुलिस (Nagpur Police) को उसकी लापरवाही फटकार लगाई और केस को बंद करने वाली याचिका को खारिज कर दिया। बंबई हाई कोर्ट ने भी इस मामले पर पुलिस को फटकार लगाई थी।
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इस मामले पर एक सामाजिक कार्यकर्ता किशोर समरिते ने सुप्रीम कोर्ट (Supreme Court) में पीआईएल दाखिल किया था और मांग की थी कि बच्ची का मामला एक बड़े नेता से संबंधित है जिसकी रसूख के असर से केस की निष्पक्ष जांच नहीं हो सकती है इसलिए मामले को सीबीआई के हाथ में सौंपा जाना चाहिए।
10 मई 2013 को न्यायमूर्ति आर. एम. लोढ़ा की अध्यक्षता वाली पीठ ने इस मामले की सुनवाई करते हुए फैसला दिया कि इस मामले को सीबीआई के हाथ में नहीं सौंपा जा सकता है। कोर्ट ने कहा कि सीबीआई के रिपोर्ट की जांच करना जिला मजिस्ट्रेट का काम है, रिपोर्ट सही है या गलत है इसका फैसला मजिस्ट्रेट ही करेगा। इस मामले पर परिवार वालों को लंबा इंतजार करना पड़ा है और फैसला अभी तक नहीं आया है।
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