स्कूल की छात्रा, रसूखदार आरोपी और 32 साल की लड़ाई… अजमेर रेप कांड की खौफनाक कहानी

यह घटना साल 1990 की है, जब अजमेर में कक्षा 12 वीं की एक स्कूली छात्रा को अजमेर के चिश्ती भाइयों ने अपनी हवस का शिकार बनाया। चिश्ती भाइयों द्वारा यह पहला मामला नहीं था बल्कि ये सब इस तरीके से बहुत सारी युवतियों को अपने हवस का शिकार बनाते थे।
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1990 के दशक में संतोष गुप्ता ने अपनी रिपोर्टिंग के माध्यम से 1992 में अजमेर रेप केस को उजागर किया। एक विवादित फोटो प्रकाशित होने के बाद पूरे अजमेर में विरोध प्रदर्शन हुआ और मामला राष्ट्रीय स्तर पर चर्चा में आया।Ai Generated
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  • 1990 के दशक में संतोष गुप्ता ने अपनी रिपोर्टिंग के माध्यम से 1992 में अजमेर रेप केस को उजागर किया। एक विवादित फोटो प्रकाशित होने के बाद पूरे अजमेर में विरोध प्रदर्शन हुआ और मामला राष्ट्रीय स्तर पर चर्चा में आया।

  • इस मामले की पहली एफआईआर 30 मई 1992 को गंज पुलिस स्टेशन में दर्ज हुई और लंबी कानूनी प्रक्रिया के बाद 2024 में अजमेर की विशेष POCSO अदालत ने 6 मुख्य आरोपियों को आजीवन कारावास और 5-5 लाख रुपये जुर्माने की सजा सुनाई।

  • साल 2021-22 के आसपास पत्रकार ज्योति यादव ने पुराने दस्तावेजों को फिर से खंगालकर इस केस को दोबारा राष्ट्रीय बहस का हिस्सा बनाया। पीड़िता, जो अब लगभग 60 वर्ष की हैं, आज भी अपनी पहचान सार्वजनिक नहीं करतीं और कहती हैं कि न्याय बहुत देर से मिला।

साल 1990 के दौर में जब मीडिया में 24*7 का प्रचलन ठीक से शुरू नहीं हुआ था, उस समय राजस्थान में एक पत्रकार ने अपने साहस का परिचय देते हुए अपने पत्रकारिता के माध्यम से न्याय दिलाने में महत्वपूर्ण भूमिका अदा कर गए। यह बात उस समय की है जब पूरे मुल्क में कहीं भी, किसी भी महिला के साथ जोर जबरदस्ती हो जाती थी और अखबार के हजारवें हिस्से में भी उनको जगह नहीं मिल पाती थी।

वह रेप केस जिसे सुनकर पूरा अजमेर दहल गया था 

यह घटना साल 1990 की है जब अजमेर में कक्षा 12 वीं की एक स्कूली छात्रा को अजमेर के चिश्ती भाइयों ने अपनी हवस का शिकार बनाया। चिश्ती भाइयों द्वारा यह पहला मामला नहीं था, बल्कि ये सब इस तरीके से बहुत सारी युवतियों को अपने हवस का शिकार बनाते थे। अपराधियों के राजनीतिक रसूख का अंदाजा इसी हिसाब से लगाया जा सकता है कि उनके खिलाफ जल्दी एफआईआर नहीं हो पाते थे। पत्रकारों ने इस मामले में हिम्मत दिखाई और लड़की को न्याय दिलाने के बदले में काफी जोखिम भी उठाया।

पत्रकार संतोष गुप्ता ने मामले में अपने साहस का परिचय दिया 

संतोष गुप्ता द्वारा उस समय की पत्रकारिता में साल 1992 में एक तस्वीर को जगह दी गई, जिसमें एक युवती को अपनी हवस का शिकार बनाते हुए युवक दिखाई दिए। इसके बाद पूरे अजमेर में 18 मई 1992 को जमकर नारेबाजी हुई। जनता सड़कों पर आ गई थी। 

इसके बाद यह सिलसिला धीरे-धीरे चलता रहा। छोटे पत्रकारों से लेकर बड़े पत्रकारों ने इस घटना के बारे में समय-समय अपनी रेपोर्टिंग जारी रखी। उस समय अजमेर में तैनात सीआईडी ​​क्राइम ब्रांच टीम के पुलिस अधिकारी धर्मवीर यादव ने बताया कि एफआईआर (FIR) दर्ज कर पाना काफी मुश्किल था क्योंकि चारों तरफ पत्रकारों का जमावड़ा होता था। इसके लिए बहुत संघर्ष करना पड़ा। आरोपी पक्ष की राजनीतिक पकड़ काफी उच्च स्तर पर थी।

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न्याय के लिए 32 साल का लंबा इंतजार 

30 मई 1992 को एफआईआर अजमेर के गंज पुलिस थाने में दर्ज हुई। इसके बाद पुलिस ने 3 सितंबर 1992 को 12 आरोपियों के खिलाफ पहली चार्जशीट पेश की थी। कुल 12 आरोपियों के नाम इस प्रकार थे- फारूक चिश्ती (मुख्य आरोपी, तत्कालीन अजमेर यूथ कांग्रेस अध्यक्ष), अनवर चिश्ती (तत्कालीन संयुक्त सचिव, अजमेर कांग्रेस), नसीम उर्फ टर्जन,  शमशुद्दीन उर्फ मैराडोना, मोइनुल्ला उर्फ पुट्टन,  इशरत अली, कैलाश सोनी, हरीश, तोलानी महेश लोढानी, परवेज अंसारी, पुरुषोत्तम (इसने 1998 में आत्महत्या कर ली थी) और जहूर चिश्ती।

मामले की सुनवाई अजमेर की जिला एवं सत्र न्यायालय (District and Sessions Court) में शुरू हुई। न्याय में इतना लंबा समय लग सकता है, वह युवती शायद ही कभी सोचती रही होगी लेकिन मामला इस कदर आगे बढ़ा की न्याय होने में लगभग 32 साल का लंबा इंतजार करना पड़ा।

अजमेर की विशेष पॉक्सो अदालत (Special POCSO Court) ने लगभग 32 साल बाद इस केस पर अपना फैसला 20 अगस्त 2024 को देते हुए 6 मुख्य आरोपियों को आजीवन कारावास की सजा और 5-5 लाख रुपए का जुर्माना लगाया। ये छह मुख्य आरोपी कुछ इस प्रकार थे नफीस चिश्ती, नसीम उर्फ टर्जन, सलीम चिश्ती, इकबाल भाटी, सोहेल गनी और सैयद जमीर हुसैन। 

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पत्रकार संतोष गुप्ता के बाद ज्योति यादव ने संभाला मोर्चा 

दरअसल,  यह मामला लगभग ठंडे बस्ते में जा रहा था फिर अचानक महिला पत्रकार, ज्योति यादव ने इस मामले को फिर से खंगालना शुरू किया। उस समय अजमेर में तैनात सीआईडी ​​क्राइम ब्रांच टीम के पुलिस अधिकारी धर्मवीर यादव के अनुसार, इस मामले के बारे में दशकों बाद कोई जानकारी के लिए संपर्क किया। ज्योति ने उन पुराने फ़ाइलों को फिर से खंगाला (साल 2021-22) और और दम तोड़ चुके इस केस को फिर से राष्ट्रीय बहस का हिस्सा बना दिया।

वह महिला जिसके साथ यह घटना हुई थी उन्होंने उन पत्रकारों के नाम को अपनी पतली सी डायरी में नोट करके रखा है जिन्होंने इस मामले में उनकी मदद की है। इसमें ज्योति का भी नाम है। वह लड़की जिसके साथ रेप हुआ था, अब लगभग 60 वर्ष उम्र के दहलीज पर है, वह अब भी अपने आपको सार्वजनिक नहीं करती हैं।

महिला का कहना है कि न्याय तो बहुत देर से मिला, परंतु जो खो चुका है वह अब वह दोबारा हासिल नहीं किया जा सकता है। यह दर्द जो महिला का है, यह दर्द केवल आज का नहीं है, असल में महिलाओं का दर्द सदियों पुराना है, पितृसत्तात्मक समाज ने महिलाओं का केवल शोषण किया है। वह महिला चाहे रामायण में सीता हो या फिर महाभारत की द्रौपदी हो, चाहे बुंदेलखंड में फूलन देवी हो या फिर दिल्ली की निर्भया (2012) हो।

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