तमिलनाडु में रिकॉर्डतोड़ वोटिंग, फिर भी क्यों इस गांव ने किया मतदान का बहिष्कार? जानें नाराजगी की बड़ी वजह

तमिलनाडु से एक ऐसी खबर आई है जिसने शासन और प्रशासन की नींद उड़ा दी है। तमिलनाडु के पुदुकोट्टई जिले के पेरम्पाथु (Perumpathu), ईचमपाडी (Eechampadi) और वेंगईवयल (Vengaivayal) जैसे कई गांवों के हजारों मतदाताओं ने इस बार चुनाव का पूर्ण बहिष्कार करने का निर्णय लिया।
इन गांवों में पोलिंग बूथ तो खुले, चुनाव अधिकारी भी हाजिर रहे, लेकिन शाम ढलने तक ईवीएम (EVM) की मशीनें लगभग खाली ही रहीं। यह बहिष्कार किसी अचानक बने योजना का परिणाम नहीं है, बल्कि यह दशकों की अनदेखी, बुनियादी सुविधाओं के अभाव और प्रशासन के प्रति गहरे अविश्वास की एक लंबी कहानी है।
तमिलनाडु से एक ऐसी खबर आई है जिसने शासन और प्रशासन की नींद उड़ा दी है। तमिलनाडु के पुदुकोट्टई जिले के पेरम्पाथु (Perumpathu), ईचमपाडी (Eechampadi) और वेंगईवयल (Vengaivayal) जैसे कई गांवों के हजारों मतदाताओं ने इस बार चुनाव का पूर्ण बहिष्कार करने का निर्णय लिया।AI Generated
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Tamil Nadu Assembly Election 2026: भारतीय लोकतंत्र के महापर्व 'लोकसभा चुनाव 2026' के दौरान जहाँ एक ओर देश भर में भारी मतदान और उत्साह की खबरें सामने आ रही हैं, वहीं तमिलनाडु से एक ऐसी खबर आई है जिसने शासन और प्रशासन की नींद उड़ा दी है। तमिलनाडु के पुदुकोट्टई जिले के पेरम्पाथु (Perumpathu), ईचमपाडी (Eechampadi) और वेंगईवयल (Vengaivayal) जैसे कई गांवों के हजारों मतदाताओं ने इस बार चुनाव का पूर्ण बहिष्कार करने का निर्णय लिया। इन गांवों में पोलिंग बूथ तो खुले, चुनाव अधिकारी भी हाजिर रहे, लेकिन शाम ढलने तक ईवीएम (EVM) की मशीनें लगभग खाली ही रहीं। यह बहिष्कार किसी अचानक बने योजना का परिणाम नहीं है, बल्कि यह दशकों की अनदेखी, बुनियादी सुविधाओं के अभाव और प्रशासन के प्रति गहरे अविश्वास की एक लंबी कहानी है।

पेरम्पाथु: जहां एक भी वोट नहीं गिरा

तमिलनाडु के पेरम्पाथु गांव (Perumpathu village) की स्थिति सबसे अधिक चर्चा में है। यहाँ के ग्रामीणों ने पहले ही चेतावनी दी थी कि यदि उनकी वर्षों पुरानी मांगें पूरी नहीं की गईं, तो वो लोग इस बार के चुनाव में हिस्सा नहीं लेंगे l चुनाव के दिन इस गांव में सन्नाटा पसरा रहा।मीडिया रिपोर्ट के अनुसार, गांव के प्रवेश द्वार पर काले झंडे लगाए गए थे और ग्रामीणों ने सामूहिक रूप से घर के अंदर रहने का फैसला किया।

ग्रामीणों की मुख्य शिकायत सड़क और परिवहन व्यवस्था को लेकर है। गांव के बुजुर्गों का कहना है कि आजादी के इतने दशकों बाद भी उनके पास एक पक्की सड़क नहीं है। मानसून के दौरान यह गांव पूरी तरह से टापू बन जाता है, जिससे मरीजों को अस्पताल ले जाना या बच्चों का स्कूल जाना असंभव हो जाता है। हमने हर नेता को वोट दिया, हर पार्टी को मौका दिया, लेकिन चुनाव जीतने के बाद कोई हमारी कीचड़ भरी सड़कों को देखने नहीं आता, एक स्थानीय निवासी ने अपना आक्रोश व्यक्त करते हुए कहा।

वेंगईवयल: न्याय की अधूरी आस

सिर्फ बुनियादी ढांचा ही नहीं, बल्कि सामाजिक न्याय और सुरक्षा भी इस बहिष्कार का एक बड़ा कारण रही। वेंगईवयल गांव (Vengaivayal Village), जो पिछले कुछ समय से पेयजल टैंक में गंदगी मिलाए जाने की अमानवीय घटना को लेकर चर्चा में था, वहां के निवासियों ने भी चुनाव से दूरी बनाए रखी। ग्रामीणों का आरोप है कि उस जघन्य अपराध के दोषियों को अब तक सजा नहीं मिली है और प्रशासन केवल जांच का भरोसा दे रहा है। दलित समुदाय के इन मतदाताओं का कहना है कि जब सरकार उनकी गरिमा और जीवन की रक्षा नहीं कर सकती, तो उन्हें वोट मांगने का भी कोई हक़  नहीं है।

ईचमपाडी (Eechampadi) की समस्याएं

इसी तरह ईचमपाडी और आसपास के इलाकों में भी चुनाव का विरोध देखा गया। यहाँ के निवासियों का कहना है कि उनके क्षेत्र में जल संकट और बेरोजगारी चरम पर है। कृषि पर निर्भर इस क्षेत्र में सिंचाई की कोई उचित व्यवस्था नहीं है। युवाओं का पलायन बढ़ रहा है, लेकिन सरकार की ओर से कोई ठोस कदम नहीं उठाए जा रहे। ग्रामीणों ने स्पष्ट किया कि 'वोट' उनका संवैधानिक अधिकार है और 'बहिष्कार' उनका विरोध दर्ज कराने का संवैधानिक तरीका।

प्रशासन की नाकाम कोशिशें

जैसे ही सुबह मतदान शुरू हुआ और इन गांवों से शून्य मतदान की खबरें आने लगीं, जिला प्रशासन में हड़कंप मच गया। जिला कलेक्टर और राजस्व विभाग के वरिष्ठ अधिकारी आनन-फानन में गांवों में पहुंचे। उन्होंने ग्रामीणों को समझाने की कोशिश की और आश्वासन दिया कि चुनाव के तुरंत बाद उनकी मांगों पर विचार किया जाएगा।

हालांकि, ग्रामीणों ने अधिकारियों की एक न सुनी। उनका तर्क था कि आचार संहिता लागू होने से पहले प्रशासन के पास पर्याप्त समय था, लेकिन तब किसी ने उनकी एक नहीं सुनी । अधिकारियों ने 'लोकतंत्र की मजबूती' का हवाला दिया, लेकिन ग्रामीणों के लिए लोकतंत्र का अर्थ केवल हर पांच साल में एक बटन दबाना नहीं, बल्कि बेहतर जीवन स्तर की प्राप्ति भी है।

नेताओं के प्रति बढ़ता जनाक्रोश

इस बहिष्कार ने राजनीतिक दलों के माथे पर चिंता की लकीरें खींच दी हैं। तमिलनाडु की राजनीति पारंपरिक रूप से द्रविड़ मुनेत्र कड़गम (DMK) और अखिल भारतीय अन्ना द्रविड़ मुनेत्र कड़गम (AIADMK) के इर्द-गिर्द घूमती रही है। लेकिन पेरम्पाथु और ईचमपाडी जैसे गांवों के इस कदम ने यह साबित कर दिया है कि जनता अब केवल पार्टी के नाम पर वोट देने को तैयार नहीं है। वे जवाबदेही चाहते हैं। स्थानीय नेताओं को गांव में घुसने से मना कर दिया गया और प्रचार के दौरान भी उन्हें कड़े विरोध का सामना करना पड़ा था।

लोकतंत्र के लिए एक चेतावनी

चुनाव विशेषज्ञों का मानना है कि 'सामूहिक बहिष्कार' लोकतंत्र के लिए एक खतरनाक संकेत है। यदि मतदाता व्यवस्था से इतने निराश हो जाएं कि वे अपने सबसे बड़े अधिकार का उपयोग करना ही छोड़ दें, तो यह चुनावी प्रक्रिया की विफलता को दर्शाता है। तमिलनाडु के इन गांवों ने एक संदेश दिया है कि विकास केवल कागजों या शहरों के फ्लाईओवर तक सीमित नहीं रहना चाहिए, बल्कि उसे राज्य के अंतिम छोर पर बसे गांव तक पहुँचना चाहिए।

[VT]

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