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सैनिक स्कूल पर फैसले को लेकर मोदी सरकार चारों तरफ से घिरती नजर आ रही है। सरकार के फैसले को लेकर यह सवाल खड़ा होने लगा है कि बीजेपी अपनी विचारधारा सैनिक स्कूल पर थोपने की कोशिश कर रही है। निजीकरण का यह फैसला अब बीजेपी सरकार पर सवालों का कहर बनकर बरसने लगा है।
2014 में नरेंद्र मोदी के प्रधानमंत्री बनने के बाद से लगातार यह कहा जा रहा है कि बीजेपी देश की सार्वजनिक संपत्ति को निजी हाथों में सौंपने पर तुली हुई है। बहुत सारे मामलों में बीजेपी के फैसलों पर सवाल भी खड़े हुए हैं। लखनऊ हवाई अड्डे के निजीकरण को लेकर मोदी सरकार को विपक्ष ने जमकर घेरा था।
अब नया मामला निकलकर आ रहा है कि सरकार सैनिक स्कूलों को निजी हाथों में सौंपने का फैसला कर चुकी है। बीजेपी सरकार की तरफ से यह फैसला ऐसे समय में लिया गया है जब विपक्ष यह आरोप लगातार लगा रहा है कि मोदी अडानी को बचाने के लिए किसी भी हद तक जाने के लिए तैयार हैं। सरकार ने 100 नए सैनिक स्कूल खोलने का निर्णय लिया है। सरकार ने यह फैसला लिया है कि ये सारे स्कूल पीपीपी मॉडल पर संचालित होंगे। पीपीपी मॉडल के तहत ये सारे स्कूल निजी स्कूलों, NGOs एवं राज्य सरकारों द्वारा साझेदारी में चलाए जाएंगे।
केंद्र सरकार के इस फैसले पर विपक्षी दलों की तरफ से प्रतिक्रिया आने लगी है। कांग्रेस की तरफ से यह आरोप लगाया जा रहा है कि बीजेपी सैनिक स्कूलों में आरएसएस की विचारधारा थोपने की कोशिश कर रही है। कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे ने मोदी सरकार को घेरते हुए कहा है कि सरकार ने 62 % सैनिक संस्थानों को आरएसएस के लोगों को सौंप दिया है। सरकार के निजीकरण वाले फैसले के खिलाफ आक्रोश बढ़ता जा रहा है।
बीजेपी पर यह आरोप पहले से लगते रहे हैं कि सरकार स्कूलों सहित अन्य सरकारी संस्थाओं में निजीकरण की प्रक्रिया को बढ़ावा दे रही यही। बहुत सारे अंतर्राष्ट्रीय हवाई अड्डे जैसे कि बंबई, लखनऊ जैसे बड़े हवाई अड्डों को बीजेपी सरकार ने निजी हाथों में सौंप दिया है। 2020-21 के बीच लखनऊ, अहमदाबाद, बेंगलुरु, जयपुर, गुवाहाटी तिरुवनंतपुरम, मुंबई हवाई अड्डों को अदानी के हाथों में सौंप दिया गया।
मई, 2022 में सरकार ने एलआईसी को बेचने का ऐलान किया था जिसका विरोध पूरे देश में देखा गया था। नरेंद्र मोदी सरकार पर सिर्फ निजीकरण का ही आरोप नहीं लगा है बल्कि सरकार पारदर्शिता के मामले पर सवालों के घेरे में है।
बता दें कि पीएम केयर फंड 27 मार्च 2020 को ही नई दिल्ली (New Delhi) में पंजीकृत किया गया था। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी (Narendra Modi) ने इस फंड को शुरू करने में अहम भूमिका निभाई। देश के स्वास्थ्य व्यवस्था को मजबूत बनाने और गरीबों को कोरोना महामारी में आर्थिक मदद देने हेतु इस फंड की शुरुआत एक सार्वजनिक धर्मार्थ न्यास (Public Charitable Trust) के रूप में की गई थी।
मात्र तीन महीने के अंदर इसमे 3000 करोड़ रुपए बहुत सारे पीएसयू द्वारा जमा किए थे। वहीं मात्र तीन साल के अंदर ही 13000 करोड़ रुपए इस फंड में इकट्ठे हुए थे। बाद में धीरे-धीरे बहुत सारे लोगों ने इस फंड पर विश्वास करके इसमें अपने पैसे दान किए। जब लोगों ने फंड के पैसे का हिसाब सूचना के अधिकार अधिनियम (RTI) के माध्यम से मांगने का प्रयास किया तो यह जवाब दिया गया कि यह एक प्राइवेट फंड है। आरोप ये लग रहे हैं कि प्राइवेटाइजेशन आज के समय में सरकार का एक हथियार बन गया है और सरकार अपनी जवाबदेही से कतरा रही है।
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