RSS के प्रचार पर सरकारी खजाने से लुटाए गए लाखों रुपए ! RTI के खुलासे से मचा हड़कंप, सवालों के कटघरे में मोदी सरकार

आरटीआई से खुलासा हुआ है कि संस्कृति मंत्रालय ने आरएसएस के शताब्दी समारोह के विज्ञापनों पर ₹76 लाख से अधिक खर्च किए। विपक्ष वाले इसे सरकारी खजाने का दुरुपयोग बताकर सवाल उठा रहे हैं, क्योंकि आरएसएस एक अपंजीकृत संगठन है। सरकार ने इसे मानक प्रक्रिया बताया है, जबकि विवाद गहराता जा रहा है।
मोदी और आरएसएस
वर्तमान बीजेपी सरकार के ऊपर यह आरोप लगते रहे हैं कि आरएसएस के दबाव में सरकार काम करती है। AI Generated
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वर्तमान बीजेपी सरकार के ऊपर यह आरोप लगते रहे हैं कि आरएसएस के दबाव में सरकार काम करती है। कई बार यह देखा गया है कि आरएसएस अप्रत्यक्ष रूप से भाजपा सरकार में हस्तक्षेप करती है और नीति निर्माण में इसका असर देखने को मिलता है। अब खबर निकलकर आ रही है कि संस्कृति मंत्रालय ने आरएसएस के प्रचार में लगभग 76 लाख रुपए खर्च किए हैं। यह बात अब सरकार में आरएसएस की भूमिका पर सवाल खड़ा करता है।

क्या है पूरा मामला, क्यों मचा है बवाल ?

नरेंद्र मोदी साल 2014 में देश के प्रधानमंत्री बने तो उन्होंने इसके लिए आरएसएस को बहुत बड़ा श्रेय दिया था। इसके बाद से यह आरोप लगातार लगते रहे हैं कि आरएसएस का हस्तक्षेप सरकार के नीति निर्माण में है। एक आरटीआई के तहत पूछे गए सवाल पर संस्कृति मंत्रालय ने जो जवाब दिया है वह काफी हैरान करने वाला है।

महाराष्ट्र के अमरावती निवासी अजय बसुदेव बोस ने आरटीआई के तहत यह सवाल पूछा था कि आरएसएस के 100 वर्ष पूरे होने पर जो आयोजन किया गया था उसमें कितना पैसा खर्च हुआ।  इसके जवाब में संस्कृति मंत्रालय ने बताया कि अलग-अलग प्रिंट मीडिया में दिए गए विज्ञापनों पर कुल 76,13,129 रुपये खर्च किए गए। यह खर्च संस्कृति मंत्रालय की तरफ से उठाया गया था। आरएसएस के शताब्दी समारोह हेतु 1 अक्टूबर, 2025 को संस्कृति मंत्रालय की तरफ से भव्य आयोजन किया गया था जिसमें प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी भी शामिल हुए थे। देश के प्रधानमंत्री का इस तरीके से एक ऐसे अपंजीकृत संगठन के कार्यक्रम में शामिल होना उनको सवालों के कटघरे में खड़ा कर दिया। 

संस्कृति मंत्रालय के सचिव ने बताया कि आरएसएस के 100 वर्ष का आयोजन भी एक शताब्दी समारोह का हिस्सा था, जिसे एनआईसी की मंजूरी के बाद संस्कृति मंत्रालय द्वारा आधिकारिक तौर पर मनाया गया। उन्होंने कहा कि  ऐसा कोई स्मृति-समारोह (कमेमोरेशन) आयोजित किया जाता है, तो विज्ञापन जारी किए जाते हैं, साथ ही स्मारक सिक्के और डाक टिकट भी जारी किए जाते हैं। आरएसएस के 100 वर्ष पूरे होने पर प्रधानमंत्री द्वारा एक सिक्का और डाक टिकट जारी किया गया था और देशभर के अखबारों में विज्ञापन भी दिए गए थे। यह एक मानक प्रक्रिया है, जो सभी शताब्दी समारोहों के लिए अपनाई जाती है। यह मंत्रालय के आधिकारिक कार्य का हिस्सा है। 

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सवालों के कटघरे में बीजेपी सरकार !

बीजेपी सरकार द्वारा इस तरीके से सरकारी खजाने से ऐसे अपंजीकृत संगठन के लिए लाखों रुपए सिर्फ विज्ञापन के नाम पर खर्च करना उनको सवालों के कटघरे में खड़ा करता है। देश के खजाने से निजी संगठनों के शताब्दी समारोह या किसी अन्य समारोह के विज्ञापन हेतु खर्च करना सरकार की मंशा पर सवाल खड़ा करता है। कुछ लोगों ने सवाल किया है कि आम जनता से टैक्स लेकर सरकार इस तरीके से पैसा का इस्तेमाल कैसे कर सकती है। 

बता दें कि आरएसएस (RSS) को भारत में अभी तक तीन बार प्रतिबंधित किया जा चुका है। सरदार पटेल (Sardar Patel) ने साल 1948 में आरएसएस पर पहली बार प्रतिबंध लगाया। सरकार का कहना था कि आरएसएस भारत के राष्ट्र ध्वज का सम्मान नहीं करता। ऐसे संगठन धार्मिक उन्माद फैलाने और राष्ट्र की अखंडता को चोट पहुंचाने की कोशिश करते हैं। 

दरअसल, आरएसएस आजादी के बाद, शुरू में भारत के तिरंगा झण्डा को राष्ट्र ध्वज के प्रतीक के रूप में स्वीकार नहीं करता था। उस समय आरएसएस की मुखपत्र आर्गनाइजर (Organiser) में तीन रंग के भारतीय राष्ट्र ध्वज को अशुभ बताया गया था। लेकिन बाद में आरएसएस ने सरकार की शर्त को माना और राष्ट्र ध्वज के सम्मान की बात को स्वीकार किया। साथ ही एक लिखित संविधान के तहत काम करने वाली शर्त को भी स्वीकारने का वादा किया तो 1949 में प्रतिबंध हटा लिया गया। 

इसी तरह से साल 1975 में इंदिरा गांधी के समय आरएसएस (RSS) पर प्रतिबंध लगाया गया। इसके अलावा साल 1992 में बाबरी विध्वंस के समय आरएसएस पर प्रतिबंध लगाया जा चुका है, लेकिन अलग-अलग समयों पर अलग-अलग शर्तों के साथ प्रतिबंध हटा लिया गया है।

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