

भारत देश की आजादी के बाद से लेकर आज तक कई ऐसे राजनेता हुए हैं जिन्होंने अपनी लीडरशिप क्वालिटी, पर्सनालिटी और अपने भाषणों से आम जनता का दिल जीत लिया। हालांकि ये राजनेता सिर्फ़ पीएम या राष्ट्रपति के पद पर नहीं बल्कि प्रांतीय क्षेत्र में भी अपनी लीडरशिप क्वालिटी (Leadership Quality) दिखाने में सफल हुए। किसी ने अपने राज्य में ऐसा दमदार व्यक्तित्व बनाया कि उसके सामने किसी के बोलने तक की हिम्मत नहीं हुई तो वहीं किसी ने अपने राज्य में गरीबों की सहायता के लिए कई ऐसी योजनाएं शुरू की जिससे लोग आज भी उन्हें मां का दर्जा देते हैं। तो कई ऐसे नेता भी हैं जिनकी एक आवाज पर पूरा भारत देश एकजुट हो जाता था। तो चलिए आज हम भारत के 10 ऐसे नेताओं (10 Powerful Politicians) के बारे में जानेंगे जिनकी एक आवाज जनता में जोश भर देने के लिए काफी है।
जवाहरलाल नेहरू (Jawahar lal Nehru) भारत के पहले प्रधानमंत्री बने। आज़ादी के तुरंत बाद भारत एक बेहद कठिन दौर से गुजर रहा था। देश का विभाजन, लाखों लोगों का विस्थापन, हिंसा और आर्थिक तंगी ये सब बड़ी चुनौतियाँ थीं। एक नए राष्ट्र को दिशा देने की ज़िम्मेदारी नेहरू के कंधों पर थी। ऐसे माहौल में उन्होंने लोकतंत्र, धर्मनिरपेक्षता और आधुनिक भारत की नींव रखने का काम किया। नेहरू के भाषणों में आशा, दूरदृष्टि और बौद्धिक गहराई साफ झलकती थी। उनकी भाषा सरल लेकिन विचार बेहद व्यापक होते थे। वे युवाओं, वैज्ञानिक सोच और आधुनिक शिक्षा पर ज़ोर देते थे। उनके भाषण लोगों को सिर्फ भावनात्मक नहीं करते थे, बल्कि उन्हें भविष्य का सपना दिखाते थे। यही कारण है कि वे जनता, खासकर युवाओं को गहराई से प्रभावित करते थे।
इंदिरा गांधी (Indira Gandhi) भारत की पहली महिला प्रधानमंत्री थीं। वह पहली बार 1966 में सत्ता में आईं। उस समय देश गंभीर आर्थिक संकट, महंगाई, खाद्यान्न की कमी और राजनीतिक अस्थिरता से जूझ रहा था। कांग्रेस पार्टी के भीतर भी गुटबाज़ी थी और कई बड़े नेता उन्हें “कमज़ोर नेता” मान रहे थे। लेकिन यही माहौल इंदिरा गांधी के लिए खुद को साबित करने का मौका बन गया। इंदिरा गांधी के भाषण बेहद सरल, भावनात्मक और सीधे जनता से जुड़े होते थे। वह कठिन शब्दों की जगह आम लोगों की भाषा में बात करती थीं। उनके भाषणों में गरीब, किसान और महिलाओं की पीड़ा साफ दिखाई देती थी। इसी वजह से जनता उनसे भावनात्मक रूप से जुड़ गई। उनका प्रसिद्ध नारा “गरीबी हटाओ” सिर्फ नारा नहीं, बल्कि जनता की उम्मीद बन गया।
लाल बहादुर शास्त्री (Lal Bahadur Shastri) भारत के दूसरे प्रधानमंत्री बने। उन्होंने 9 जून 1964 को सत्ता संभाली, जब देश एक भावनात्मक और राजनीतिक खालीपन से गुजर रहा था। जवाहरलाल नेहरू के निधन के बाद यह सवाल था कि क्या कोई नेता उस भरोसे और संतुलन को संभाल पाएगा? शास्त्री जी ने सबके सवाल का करारा ज़वाब दिया। शास्त्री जी के भाषण सीधे, सरल और आत्मा को छूने वाले होते थे। वे भारी-भरकम शब्दों की बजाय आम जनता की भाषा में बात करते थे। उनके भाषणों में देशभक्ति के साथ-साथ त्याग और अनुशासन का भाव होता था। 1965 के भारत पाकिस्तान युद्ध के दौरान जब देश खाद्य संकट से जूझ रहा था तब उन्होंने पूरे देशवासियों को एकजुट करने के लिए "जय जवान जय किसान" का नारा दिया जिसने लोगों में एक अलग ही जोश भरा।
अटल बिहारी वाजपेयी (Atal Bihari Vajpayee) पहली बार 1996 में भारत के प्रधानमंत्री बने। उस समय देश में राजनीतिक अस्थिरता का दौर था। किसी भी पार्टी को स्पष्ट बहुमत नहीं मिला था। वाजपेयी जी की सरकार सिर्फ 13 दिन चली, क्योंकि उन्हें संसद में बहुमत साबित करना था। इसके बाद वे दोबारा 1998 में सत्ता में आए लेकिन सरकार 13 महीने ही चली और अंततः 1999 से 2004 तक उन्होंने स्थिर सरकार चलाई। उस दौर में देश आर्थिक सुधार, परमाणु शक्ति बनने और गठबंधन राजनीति के नए प्रयोगों से गुजर रहा था। अटल जी के भाषणों की सबसे बड़ी ताकत थी, शब्दों की शालीनता और विचारों की गहराई। वे कविता, व्यंग्य और राष्ट्रभाव को एक साथ जोड़ते थे। उनके भाषण विरोधियों को भी सोचने पर मजबूर कर देते थे। उन्होंने अपनी कविताओं के जरिए लोगों के दिलों में एक अलग ही जगह बनाएं उनकी कविता हार नहीं मानूंगा रार नहीं ठानूंगा लोगों को आज तक प्रेरणा देता है।
लालू प्रसाद यादव (Lalu Prasad Yadav) पहली बार 1990 में बिहार के मुख्यमंत्री बने। उस समय बिहार की राजनीति पूरी तरह बदलाव के दौर से गुजर रही थी। मंडल आयोग की सिफारिशें लागू हो चुकी थीं, सामाजिक न्याय, पिछड़े वर्गों और दलितों की राजनीति ज़ोर पकड़ रही थी। कांग्रेस कमजोर हो रही थी और जनता ऐसे नेता की तलाश में थी जो सीधे उनकी भाषा में बोले। इसी माहौल में लालू यादव एक जननेता के रूप में उभरे। लालू यादव के भाषणों की सबसे बड़ी ताकत थी उनकी देशज भाषा, देसी अंदाज़ और व्यंग्य। वे मंच से बोलते नहीं थे, बल्कि लोगों से सीधी बातचीत करते थे। भोजपुरी और ठेठ हिंदी में दिए गए उनके भाषण आम आदमी को तुरंत जोड़ लेते थे। वे सत्ता, जाति और सिस्टम पर तंज कसते हुए जनता को हँसाते भी थे और सोचने पर मजबूर भी करते थे। लालू का एक भाषण बहुत मशहूर है, "लागल-लागल झुलनियां में धक्का, बलम कलकत्ता चला" ये सुनने के बाद लोगों का जोश देखने लायक होता था।
मुलायम सिंह यादव (Mulayam Singh Yadav) पहली बार 1989 में उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री बने। यह वह समय था जब देश की राजनीति तेज़ बदलाव से गुजर रही थी। बोफोर्स घोटाले के बाद कांग्रेस कमजोर पड़ रही थी, वी.पी. सिंह के नेतृत्व में गैर-कांग्रेसी राजनीति उभर रही थी और मंडल आयोग की सिफारिशों ने पिछड़े वर्गों को एक नई राजनीतिक चेतना दी थी। उत्तर प्रदेश में किसान, पिछड़े और अल्पसंख्यक वर्ग एक ऐसे नेता की तलाश में थे जो उनकी आवाज़ बने और वहीं से मुलायम सिंह यादव का उदय हुआ। मुलायम सिंह के भाषणों की सबसे बड़ी खासियत थी सादगी और स्पष्टता। वे भारी-भरकम शब्दों की जगह सीधी बात करते थे। उनके भाषणों में किसान, जवान और संविधान बार-बार आते थे। वे मंच से भाषण नहीं, बल्कि संघर्ष का भरोसा देते थे। यही वजह थी कि उनके शब्द खासकर ग्रामीण और पिछड़े वर्गों के दिल तक पहुँचते थे।
मायावती (Mayawati) पहली बार 1995 में उत्तर प्रदेश की मुख्यमंत्री बनीं। उस समय यूपी की राजनीति पूरी तरह बदलाव के दौर से गुजर रही थी। मुलायम सिंह के बाद दलित और पिछड़े वर्ग खुलकर सत्ता में भागीदारी चाहते थे। कांशीराम के नेतृत्व में बहुजन समाज पार्टी (BSP) दलित राजनीति की सबसे मजबूत आवाज़ बन चुकी थी। समाज में जातिगत भेदभाव, राजनीतिक अस्थिरता और गठबंधन सरकारों का दौर था। ऐसे माहौल में मायावती का मुख्यमंत्री बनना दलित समाज के लिए ऐतिहासिक क्षण माना गया। मायावती के भाषणों की सबसे बड़ी खासियत है उनका सख्त, स्पष्ट और आत्मसम्मान से भरा अंदाज़। वे भावुक भाषा की बजाय तथ्य और अधिकार की बात करती हैं। उनके भाषणों में “सम्मान”, “हक़”, “संविधान” और “बाबासाहेब आंबेडकर” बार-बार सुनाई देते हैं। यही वजह है कि उनका भाषण दलित और वंचित वर्ग को गहराई से प्रभावित करता है।
जयललिता (J Jayalalithaa) पहली बार 1991 में तमिलनाडु की मुख्यमंत्री बनीं। यह वह दौर था जब एम.जी. रामचंद्रन (MGR) के निधन के बाद AIADMK नेतृत्व संकट से जूझ रही थी। राज्य की राजनीति में द्रविड़ आंदोलन, सामाजिक न्याय और क्षेत्रीय अस्मिता का प्रभाव गहरा था। जनता एक मज़बूत नेता की तलाश में थी। ऐसे माहौल में जयललिता का सत्ता में आना आसान नहीं था, लेकिन उन्होंने खुद को “अम्मा” के रूप में स्थापित कर लिया। जयललिता के भाषणों में आत्मविश्वास, तीखापन और आदेशात्मक अंदाज़ साफ दिखती थी। वे मंच से बेहद प्रभावशाली आवाज़ में बोलती थीं और विरोधियों पर सीधा प्रहार करती थीं। उनके भाषण खासकर महिलाओं, गरीबों और तमिल अस्मिता से जुड़े मुद्दों पर लोगों को गहराई से प्रभावित करते थे।
योगी आदित्यनाथ (Yogi Adityanath) पहली बार 19 मार्च 2017 को उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री बने। उस समय यूपी की राजनीति में कानून-व्यवस्था, अपराध, भ्रष्टाचार और प्रशासनिक ढिलाई बड़े मुद्दे थे। 2017 के विधानसभा चुनाव में भारतीय जनता पार्टी (BJP) को ऐतिहासिक बहुमत मिला, लेकिन योगी आदित्यनाथ का नाम मुख्यमंत्री के रूप में सबके लिए चौंकाने वाला था। वे गोरखपुर से सांसद और एक कट्टर हिंदुत्व छवि वाले नेता के रूप में पहचाने जाते थे। ऐसे माहौल में उनकी ताजपोशी को “कठोर लेकिन निर्णायक शासन” की शुरुआत माना गया। योगी आदित्यनाथ के भाषणों की शैली सीधी, सख्त और बेबाक होती है। वे बिना घुमाए बात रखते हैं और कानून-व्यवस्था, राष्ट्रवाद और सुशासन पर ज़ोर देते हैं। उनके भाषणों में एक्शन का भरोसा दिखता है, यही वजह है कि उनका असर समर्थकों के बीच काफी मजबूत रहता है।
नरेंद्र मोदी (Narendra Modi) पहली बार 26 मई 2014 को भारत के प्रधानमंत्री बने। उस समय देश का माहौल काफ़ी बदला हुआ था। लंबे समय से भ्रष्टाचार के आरोप, नीतिगत ठहराव, महंगाई और युवा बेरोज़गारी जैसे मुद्दों से जनता नाराज़ थी। 2014 के आम चुनाव में लोगों को एक ऐसे नेता की तलाश थी जो मज़बूत फैसले ले सके और देश को नई दिशा दे। ऐसे माहौल में “विकास” और “अच्छे दिन” के नारे के साथ नरेंद्र मोदी एक बड़े जनादेश के साथ सत्ता में आए। नरेंद्र मोदी के भाषणों की सबसे बड़ी खासियत है उनकी सीधी भाषा और भावनात्मक जुड़ाव। वे कठिन बातों को भी आम लोगों की भाषा में रखते हैं। उनके भाषणों में आत्मविश्वास, राष्ट्रवाद और भविष्य की उम्मीद साफ दिखती है। वे अक्सर उदाहरण, कहानियाँ और छोटे वाक्य इस्तेमाल करते हैं, जिससे उनका संदेश दूर-दूर तक असर करता है। मोदी जब मंच से कहते हैं "भाइयों बहनों" तो लोगों के बीच एक उत्साह पनप जाता है।
तो ये थे वो 10 नेता जिन्होंने अपने आवाज के दम पर जनता के बीच अपनी जगह बनाई। [SP]