

अयोध्या राम मंदिर (Ram Mandir Ayodhya) के चारों ओर ज़मीन का एक ऐसा खेल चल रहा है, जिसने सबको चौंका दिया है। पिछले 5 वर्षों में मंदिर के 500 मीटर से 3 किमी के दायरे में ज़मीनों की क़ीमतों में अचानक ऐसा उछाल आया, जिसने कई विवादों को जन्म दे दिया। केंद्रीय मुद्दा यह है कि ट्रस्ट पर सर्किल रेट से कई गुना महंगी दरों पर ज़मीनें खरीदने के गंभीर आरोप लग रहे हैं। चौंकाने वाली बात यह है कि इनमें कुछ ऐसी सरकारी और मंदिरों की ज़मीनें भी शामिल हैं, जिन्हें कानूनी रूप से बेचा ही नहीं जा सकता था। पुख्ता टाइमलाइन के आधार पर आइए इस पूरे घटनाक्रम के सच को परत-दर-परत समझते हैं।
SIT की जांच में सामने आए दस्तावेजों के अनुसार, पिछले पांच सालों में हुए इन जमीन सौदों की क्रोनोलॉजी बेहद चौंकाने वाली है। इस पूरे घटनाक्रम की शुरुआत मार्च 2021 में 'बाग बिजैसी' ('Bagh Bijaisi') से होती है, जहां कुसुम पाठक (Kusum Pathak) से सुल्तान अंसारी (Sultan Ansari) और रवि मोहन (Ravi Mohan) ने एक जमीन महज ₹2 करोड़ में खरीदी। सनसनीखेज बात यह है कि ठीक 10 मिनट बाद ही चंपत राय ने ट्रस्ट के नाम पर इसे ₹18.5 करोड़ में खरीद लिया। इस बेहद महंगे सौदे के गवाह तत्कालीन मेयर ऋषिकेश उपाध्याय (Mayor Rishikesh Upadhyay) और अनिल मिश्रा (Anil Mishra) थे।
इसके बाद 2 अप्रैल 2024 को 'कोट रामचंदर' ('Kot Ramchander') में एक आवासीय प्लॉट का सौदा हुआ। मुरलीदास नामक विक्रेता से सर्किल रेट के हिसाब से ₹2.92 करोड़ की इस जमीन को ट्रस्ट ने ₹23.61 करोड़ की भारी-भरकम रकम देकर खरीदा। इस सौदे पर इसलिए भी सवाल उठ रहे हैं क्योंकि आरोप है कि यह नजूल (सरकारी) भूमि है।
विवादों का यह सिलसिला यहीं नहीं रुका। मई 2025 में 'हैबतपुर' ('Haibatpur') में दो बड़ी खरीदारियां की गईं। पहली ज़मीन ₹2.96 करोड़ की थी जिसे ₹9.09 करोड़ में लिया गया, और दूसरी राम आधार से ₹2.48 करोड़ की ज़मीन को ₹7.62 करोड़ में खरीदा गया। इसके बाद नवंबर 2025 में 'लखनऊ रोड' पर जमीनों की कीमतों ने सारे रिकॉर्ड तोड़ दिए। यहां तन्वी बंसल से ₹1.73 करोड़ की जमीन को सीधे ₹29.67 करोड़ में और आलोक बंसल से ₹9 करोड़ की जमीन को ₹55.47 करोड़ की रिकॉर्ड कीमत पर ट्रस्ट द्वारा खरीदा गया।
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इन जमीन सौदों की ख़बर सामने आने के बाद कई गंभीर कानूनी और नैतिक सवाल खड़े हो गए हैं, जो इस पूरे मामले को संदेहास्पद बनाते हैं। सबसे बड़ा सवाल '10 मिनट में 9 गुना कीमत' बढ़ने को लेकर है। मार्च 2021 के सौदे में जो जमीन महज ₹2 करोड़ में खरीदी गई, वह महज 10 मिनट के भीतर ट्रस्ट को ₹18.5 करोड़ में कैसे बेच दी गई? इस अविश्वसनीय दाम बढ़ोतरी के पीछे का वित्तीय गणित समझ से परे है।
दूसरा बड़ा विवाद नजूल और मंदिर की जमीनों के मालिकाना हक को लेकर है। अप्रैल 2024 के कोट रामचंदर मामले ने इस पर कानूनी सवाल खड़े कर दिए हैं, क्योंकि सरकारी ज़मीन को नियमों के मुताबिक इस तरह बेचा या खरीदा नहीं जा सकता। इसके अतिरिक्त, नवंबर 2025 के सौदों में सर्किल रेट vs मार्केट रेट का भारी अंतर देखने को मिला, जहां सरकारी तय दर से करीब 15 से 17 गुना अधिक भुगतान किया गया। आस्था के नाम पर मिले फंड का इस तरह सर्किल रेट से कई गुना ज्यादा इस्तेमाल करना वित्तीय पारदर्शिता पर गहरे सवालिया निशान लगाता है।
किसी भी निष्पक्ष रिपोर्टिंग के लिए मामले के दूसरे पहलू को समझना जरूरी है। इन आरोपों पर ट्रस्ट और उसके समर्थकों का तर्क है कि मंदिर विस्तार और करोड़ों श्रद्धालुओं की सुविधाओं के लिए इन जमीनों की तत्काल आवश्यकता थी। ट्रस्ट का कहना है कि किसी भी विकास क्षेत्र में वास्तविक बाजार दर यानी मार्केट रेट अक्सर सरकारी सर्किल रेट से बहुत अधिक होती है, और ये सौदे जमीन मालिकों की आपसी सहमति व तात्कालिक बाजार मांग के आधार पर किए गए हैं। प्रशासनिक स्तर पर, ट्रस्ट ने हमेशा वित्तीय हेरफेर के आरोपों को खारिज किया है और इसे मंदिर परियोजना को बदनाम करने की कोशिश बताया है। [SP]