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भारत को आजादी मिलने के साथ बड़े भू-भाग को खोना पड़ा। जिन्ना जैसे नेताओं के जिद से हिंदुस्तान का बंटवारा हुआ। 14 अगस्त 1947 को इस्लाम के नाम पर पाकिस्तान देश का जन्म हुआ। आज का बांग्लादेश भी उसी पाकिस्तान का हिस्सा था। भारत विभाजन इतिहास का एक काला अध्याय था, क्योंकि लाखों लोगों को पलायन करने के लिए मजबूर होना पड़ा, परिवार अलग हो गए और बड़े पैमाने पर हिंसा हुई।
आजादी के बाद, भारत के साथ नवजात पाकिस्तान को कई बड़ी चुनौतियों का सामना करना पड़ा, शरणार्थियों का प्रबंधन, प्रशासनिक ढांचा तैयार करना, संपत्ति का बंटवारा, सुरक्षा सुनिश्चित करना, जल संसाधन संबंधी समस्याओं का समाधान करना और अर्थव्यवस्था को स्थिर करना। इन सबके साथ-साथ, देश को अपनी संवैधानिक और राजनीतिक पहचान भी स्थापित करनी थी, जिसमें राष्ट्रगान का चयन भी शामिल था और इसके लिए पाकिस्तान को बहुत देर बाद सफलता हाथ लगी।
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दरअसल, पाकिस्तान को अपना राष्ट्रगान, जिसे क़ौमी तराना के नाम से जाना जाता है, को अंतिम रूप देने में लगभग सात साल लग गए। जून 1948 में, दक्षिण अफ्रीका के एक मुस्लिम व्यापारी, ए.आर. गनी ने सर्वश्रेष्ठ गीत और रचना के लिए 5,000 रुपये का पुरस्कार घोषित किया। जब यह प्रयास सफल नहीं हुआ, तो पाकिस्तान सरकार ने इस कार्य को अपने हाथ में लेने के लिए एक राष्ट्रगान समिति (एनएसी) का गठन किया।
इसके बाद साल 1949 में अहमद गुलाम अली छागला द्वारा रचित एक धुन को स्वीकृति मिली। प्रारंभ में यह राष्ट्रगान केवल वाद्य संगीत के रूप में था और बिना बोलों के बजाया जाता था। इसके बाद, इस रचना को देश भर के कई प्रख्यात कवियों के साथ साझा किया गया। सैकड़ों सुझावों की समीक्षा के बाद, हाफ़िज़ जालंधरी द्वारा लिखे गए बोलों का चयन किया गया।
जालंधरी ने इस राष्ट्रगान को अत्यधिक फ़ारसीकृत उर्दू में लिखा जो एक परिष्कृत शैली, जिसमें सुगमता और परिष्कार का अद्भुत मिश्रण था। राष्ट्रगान में कुल 49 शब्द हैं, जिनमें से केवल एक शब्द उर्दू (“का”) है और बाकी सभी फ़ारसी हैं।
यह भाषाई चयन जानबूझकर किया गया था। फारसी भाषा इस क्षेत्र में, विशेष रूप से मुगल साम्राज्य के दौरान, लंबे समय से दरबारी और साहित्यिक भाषा रही थी और इसका गहरा सांस्कृतिक महत्व था। फारसी शब्दावलियों का उपयोग करने से राष्ट्रगान काव्यात्मक, लयबद्ध और उदात्त बन गया। इसके अलावा पाकिस्तान में इस्लामी एकता के नाम पर राष्ट्र को बनाया गया था
इसके साथ ही, इसने पंजाबी, सिंधी या बंगाली जैसी किसी एक क्षेत्रीय भाषा को प्राथमिकता देने से बचने में मदद की, जिससे नवगठित और विविधतापूर्ण राष्ट्र में एकता की भावना को बढ़ावा मिला। यह भाषा व्यापक इस्लामी परंपराओं के साथ पाकिस्तान के सांस्कृतिक और ऐतिहासिक संबंधों को भी दर्शाती है।
राष्ट्रगान का आधिकारिक तौर पर पहली बार प्रसारण अगस्त 1954 में रेडियो पाकिस्तान पर हुआ, जहां से इसकी औपचारिक शुरुआत मानी गई।
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