

वर्तमान में चीन के पास दुनिया का सबसे बड़ा रणनीतिक तेल भंडार (900 मिलियन बैरल) है, जबकि अमेरिका (415 मिलियन बैरल), जापान (300+ मिलियन बैरल) और जर्मनी जैसे देश भी विशाल स्टॉक रखते हैं।
भारत IEA का पूर्ण सदस्य नहीं, बल्कि एक सहयोगी सदस्य है, जिससे उसे संकट के समय अंतरराष्ट्रीय सहयोग मिल सकता है।
मार्च 2026 की आधिकारिक रिपोर्ट के अनुसार, भारत के पास 3.37 मिलियन मीट्रिक टन (लगभग 9.5 दिन) का रणनीतिक भंडार है।
पश्चिम एशिया में चल रहे घमासान का असर पूरे वैश्विक राजनीति पर पड़ रहा है। प्रायः यह कहा जाता है कि राजनीति से खाना नहीं मिलता है लेकिन ईरान अमेरिका युद्ध ने यह साबित कर दिया कि वैश्वीकरण के बाद अंतर्राष्ट्रीय राजनीति का प्रभाव घर के रसोई तक है। ईरान ने होर्मुज जलडमरूमध्य को भू-राजनीति में एक रणनीतिक हथियार बना लिया है। इसी बीच तेल भंडारण को लेकर चर्चा एक बार फिर से तेज हो गई है।
रणनीतिक तेल भंडार (Strategic Petroleum Reserve - SPR) का मतलब है कि संकट के समय मुसीबतों का सामना करने के लिए देश अपने यहां पर तेल ऊर्जा को स्टोर करके रखते हैं। यदि वैश्विक राजनीति में उथल-पुथल होती है तो तेल के बाजार में उतार चढ़ाव होता है, ऐसे में तेल भंडारण बाजार को स्थाई रखने में काफी मददगार साबित होता है। ऐसी बहुत बार परिस्थितियाँ आईं हैं जब विश्व को इस तरीके के चुनौतियों का सामना करना पड़ा है। IEA (International Energy Agency) के सदस्य देशों के पास यह अधिकार होता है कि लगभग तीन महीने आयात के बराबर तेल भंडारण कर सकते हैं।
यह एक अंतर्राष्ट्रीय स्वायत्त संगठन है। इसकी स्थापना साल 1974 में की गई थी। स्थापना का उद्देश्य यह था कि वैश्विक राजनीति में तेल संकट जैसे आपदाओं से सामना करने के लिए एवं संकट के समय बाजार को स्थिर बनाने के लिए सभी राष्ट्र आपस में सहयोग कर सकें।
दरअसल, साल 1973 में अरब देशों ने तेल निर्यात पर प्रतिबंध लगा दिया था। इसकी वजह से पूरे विश्व बाजार में भूचाल आ गया था। दोबारा इस तरीके के संकट का सामना करने के लिए इस प्रकार के संगठन को बनाया गया था।
ऊर्जा सुरक्षा, आर्थिक विकास, पर्यावरण जागरूकता और वैश्विक जुड़ाव इस संगठन की स्थापना उद्देश्य हैं। संगठन इसी आधार पर काम करता है। वर्तमान में लगभग 31 देश इसके सदस्य हैं वहीं 13 देश इसके सहयोगी सदस्य हैं। अंतर्राष्ट्रीय ऊर्जा एजेंसी (International Energy Agency) का मुख्यालय पेरिस में बनाया गया है। इसके सदस्य देश अपने पास कुल आयात के 90 दिन के बराबर कच्चे तेल का भंडारण कर सकते हैं।
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भारत अंतर्राष्ट्रीय ऊर्जा एजेंसी (International Energy Agency) का सदस्य देश नहीं है, लेकिन भारत IEA (International Energy Agency) का एक सहयोगी सदस्य है। सहयोगी सदस्य होने के वजह से भारत और IEA (International Energy Agency) के बीच एक अच्छा संबंध है। नियम के मुताबिक संकट के समय सभी देश मिलकर बाजार को स्थिर बनाए रखने में अपना अपना योगदान देंगे।
ऐसे में भारत को अगर तेल संकट का सामना करना पड़े तो IEA (International Energy Agency) की तरफ से मदद मिलना कोई नई बात नहीं होगी। नवंबर 2021 और मार्च 2022 में रूस और यूक्रेन युद्ध के समय , भारत ने IEA और अमेरिका के आग्रह पर अपने रणनीतिक भंडार से लगभग 5 मिलियन बैरल कच्चा तेल रिलीज किया था ताकि वैश्विक तेल बाजार स्थाई बना रहे।
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चीन अंतर्राष्ट्रीय ऊर्जा एजेंसी का सदस्य नहीं है, लेकिन वह तेजी से बड़ा भंडार बना रहा है। चीन के पास दुनिया का सबसे बड़ा रणनीतिक तेल भंडार है। चीन के पास लगभग 900 मिलियन बैरल कच्चे तेल का भंडारण है।
वहीं अमेरिका की बात की जाए तो उसके पास लगभग 415 मिलियन बैरल तेल स्टॉक में है। अमेरिका ने हाल की दिनों में तेल की कीमतों को नियंत्रण में रखने के लिए अपने भंडार से तेल जारी किया था।
इसी तरह ब्रिटेन ने अभी अपने यहां ठीक-ठाक मात्रा में तेल भंडारण कर लिया है। जानकारी के मुताबिक ब्रिटेन के पास लगभग 38 मिलियन बैरल कच्चा तेल और 30 मिलियन बैरल रिफाइंड उत्पाद मौजूद हैं। इस भंडारण से 90 दिन तक संकटों का सामना किया जा सकता है।
इसी तरीके से जर्मनी के पास 110 मिलियन बैरल कच्चा तेल और 67 मिलियन बैरल तैयार पेट्रोलियम उत्पाद, जापान के पास करीब 300 मिलियन बैरल से अधिक, दक्षिण कोरिया के पास 100 मिलियन बैरल, फ्रांस के पास 120 मिलियन बैरल कच्चे तेल का भंडारण है।
भारत सरकार पेट्रोलियम और प्राकृतिक गैस मंत्रालय (MoPNG) द्वारा 23 मार्च 2026 को राज्यसभा में एक आधिकारिक लिखित उत्तर जमा किया गया। रिपोर्ट के मुताबिक, भारत के पास लगभग 3.37 मिलियन मीट्रिक टन तेल जमा है। इस हिसाब से भारत के पास लगभग 9.5 दिनों तक कच्चे तेल की जरूरत को पूरा करने की क्षमता है। वहीं भारत के निजी तेल कंपनियों (OMCs) के स्टॉक को मिला दिया जाए तो लगभग 75 दिन तक कच्चे तेल की जरूरत को भारत पूरा कर सकता है।
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