तेल-गैस संकट की जड़ बना स्ट्रेट ऑफ होर्मूज, जानिए इसके नाम का असली मतलब

होर्मुज जलडमरूमध्य फारस की खाड़ी को ओमान की खाड़ी और अरब सागर से जोड़ने वाला एक संकरा समुद्री मार्ग है, जो ईरान और ओमान के बीच स्थित है। यह प्राचीन काल से ही व्यापार का महत्वपूर्ण मार्ग रहा है और सिंधु घाटी व मेसोपोटामिया सभ्यताओं के बीच समुद्री व्यापार का प्रमुख संपर्क बिंदु था।
होर्मुज जलडमरूमध्य और ईरान का ध्वज
1622 में सफवी शासक शाह अब्बास प्रथम ने ब्रिटेन की मदद से पुर्तगालियों को हटाकर होर्मुज जलडमरूमध्य को ईरान के नियंत्रण में ले लिया।X
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  • होर्मुज जलडमरूमध्य फारस की खाड़ी को ओमान की खाड़ी और अरब सागर से जोड़ने वाला एक संकरा समुद्री मार्ग है, जो ईरान और ओमान के बीच स्थित है। यह प्राचीन काल से ही व्यापार का महत्वपूर्ण मार्ग रहा है और सिंधु घाटी व मेसोपोटामिया सभ्यताओं के बीच समुद्री व्यापार का प्रमुख संपर्क बिंदु था।

  • मध्यकाल में होर्मुज साम्राज्य ने इस मार्ग से गुजरने वाले जहाजों से कर वसूला। बाद में 16वीं सदी में पुर्तगालियों ने इस पर कब्जा कर कार्तज प्रणाली लागू की, जिसमें जहाजों को परमिट लेकर ही गुजरना पड़ता था। 1622 में सफवी शासक शाह अब्बास प्रथम ने ब्रिटेन की मदद से पुर्तगालियों को हटाकर इसे फिर से ईरान के नियंत्रण में ले लिया।

  • आज यह दुनिया के सबसे महत्वपूर्ण समुद्री मार्गों में से एक है क्योंकि विश्व के समुद्री तेल व्यापार का लगभग 20–25% इसी रास्ते से गुजरता है। हाल के तनाव में ईरान और अमेरिका के बीच संघर्ष के कारण इस मार्ग का उपयोग भू-राजनीतिक दबाव के साधन के रूप में किया जा रहा है। हालांकि भारत के साथ अच्छे संबंधों के कारण भारतीय जहाजों को इस मार्ग से गुजरने की अनुमति दी जा रही है।

अमेरिका और ईरान के बीच शुरू हुए संघर्ष को लगभग 3 सप्ताह पूरे हो रहे हैं। युद्ध थमने का नाम नहीं ले रहा है बल्कि परिस्थितियाँ बेकाबू होती जा रही हैं। इसी बीच ईरान ने होर्मुज जलडमरूमध्य को लेकर बयान दिया है कि जो देश अमेरिका के दूतावास को अपने देश से हटा देंगे उनके जहाज को होर्मुज जलडमरूमध्य से जाने दिया जाएगा। होर्मुज जलडमरूमध्य क्या है, भू-राजनीतिक दृष्टिकोण से इसका क्या महत्व है, इसको जानेंगे

क्या है होर्मुज जलडमरूमध्य

होर्मुज जलडमरूमध्य फारस की खाड़ी और ओमान की खड़ी को आपस में जोड़ती है। ईरान और ओमान के बीच में स्थित यह जलडमरूमध्य फारस की खाड़ी को ओमान और अरब सागर से जोड़ने वाली एक संकरा समुद्री मार्ग है। इस समुद्री मार्ग पर ईरान का कब्जा है। लेकिन बदलते समय के साथ इस जलडमरूमध्य पर वैश्विक तनाव भी देखने को मिलते रहते हैं। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार होरमुज नाम अहुरा मज्दा से बनाया गया है जिसे वहाँ के स्थानीय लोग होरमुज़्ड कहते थे जिसका तात्पर्य है, बुद्धिमान भगवान। 

वहीं इसके नाम का दूसरा इतिहास यह है कि होर्मुज ईरान में एक शहर है जो कि मिनाब नदी के पास में है। लोगों का मानना है कि इसी शहर के नाम पर इसका नाम होर्मुज जलडमरूमध्य पड़ गया।

होर्मुज जलडमरूमध्य प्राचीन समय में 

प्राचीन समय की बात किया जाए तो यह समुद्री मार्ग सिंधु घाटी सभ्यता और मेसोपोटामिया की सभ्यताओं का मिलन बिन्दु था अर्थात यह दोनों सभ्यताओं के आपस में व्यापारिक संबंध स्थापित करने का माध्यम था। सिंधु घाटी के लोथल (गुजरात) और गोदी बंदरगाह से यात्रा का प्रारंभ किया जाता था और अक्सर बड़े समुद्री जहाजों से सामान उतारकर छोटे जहाजों पर लादा जाता था, जिससे कि मेसोपोटामिया की दजला-फरात (Tigris-Euphrates) नदियों में अंदर तक जा सकें। इस अदला बदली के लिए होर्मुज एक सटीक स्थान था।

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समय के साथ बदल गए होर्मुज के अधिकारी 

11वीं और 12वीं शताब्दी के आस-पास के समय में इस जलडमरूमध्य पर होर्मुज साम्राज्य (Kingdom of Hormuz) का शासन रहा। होर्मुज साम्राज्य ने इस समुद्री मार्ग को अपनी आय का एक स्रोत बना लिया था। होर्मुज का व्यापार उस समय भारत, चीन, अफ्रीका और यूरोप इत्यादि तक फैला हुआ था। होर्मुज साम्राज्य ने अपनी भौगोलिक स्थिति का फायदा उठाकर फारस की खाड़ी के व्यापार पर पूर्ण एकाधिकार स्थापित किया था। बता दें कि इस खाड़ी में प्रवेश करने वाले किसी भी देश के जहाज को होर्मुज द्वीप के बंदरगाह पर रुकना ही  पड़ता था। बदले में एक ऊंची रकम (10 से 15 फीसदी) कर (TAX) के रूप में अदा करना पड़ता था। इसके बदले में साथ लुटेरों से सुरक्षा की गारंटी मिलती थी। 

कुछ समय के बाद पुर्तगालियों ने इस मार्ग पर अपना आधिपत्य स्थापित किया। 16वीं सदी में अल्फांसो डी अल्बुकर्क के नेतृत्व में इस मार्ग पर पुर्तगालियों का अधिकार हो गया। पुर्तगालियों ने लगभग 100 साल से भी अधिक समय तक इस क्षेत्र पर अपना कब्जा बनाए रखा। 1515 में यहाँ पर कार्तज प्रणाली लागू किया गया। इसके तहत यह अनिवार्य कर दिया गया कि यदि कोई भी जहाज खाड़ी (Persian Gulf) के अंदर जाए या बाहर आए उसको होरमुज  बंदरगाह पर रुकना पड़ेगा। कार्तज दिखाने पर ही जहाज को जाने दिया जाता था। कार्तज लेने वाले जहाज को यह कसम खानी पड़ती थी कि वह पुर्तगालियों के दुश्मनों जैसे कि तुर्क या मिस्र  के साथ व्यापार नहीं करेगा और न ही काली मिर्च (Pepper) जैसे प्रतिबंधित मसालों का व्यापार करेगा।

बता दें कि यह कार्तज इतना महत्वपूर्ण था कि जिस जहाज के पास कार्तज नहीं मिलता था, पुर्तगाली लोग उस जहाज को समुद्री लुटेरा घोषित कर देते थे और उसे जब्त कर लेते थे।  

16 वीं शताब्दी में ईरान का कब्जा 

16वीं शताब्दी तक पुर्तगालियों ने इसपर अपना आधिपत्य बनाए रखा। बाद में 1622 में ईरान के सफवी वंश के शासक,  जिनका नाम शाह अब्बास प्रथम था, ने ब्रिटेन की मदद से इस क्षेत्र से पुर्तगालियों के आधिपत्य को चुनौती दी और होर्मुज पर ईरान के आधिपत्य को स्थापित किया।  

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वर्तमान भू-राजनीतिक दृष्टिकोण से होर्मुज की महत्ता   

ईरान (Iran) ने आज के समय में होर्मुज को भू-राजनीतिक दबाव का एक हथियार (Hormuz as a tool of geopolitical pressure) बना लिया है। यह इसलिए हो रहा है कि इस मार्ग से पूरी दुनिया के कुल समुद्री तेल व्यापार का लगभग 20 से 25 फीसदी व्यापार इसी मार्ग से होता है। खाड़ी देशों और एशियाई देशों के व्यापार का प्रमुख मार्ग है। 28 फरवरी 2026 को ईरान के सुप्रीम लीडर आयतुल्ला अली खामेनेई को अमेरिका (America) ने मार देने की पुष्टि कर दी। इसके बाद से इस मार्ग से हो रहे व्यापार पर काफी असर देखने को मिला। ईरान ने दुश्मन देशों के लिए तथा उनके सहयोगियों के लिए इस मार्ग को बंद कर दिया है। वहीं भारत और ईरान के बीच हुई बातचीत से समाधान निकाला गया है।

भारत में ईरानी राजदूत मोहम्मद फथाली (Iranian Ambassador to India Mohammad Fathali) ने कहा है कि भारत और ईरान के संबंध बहुत पुराने हैं। उन्होंने कहा कि भारत, ईरान का एक अच्छा मित्र है, भारत के जहाजों को होर्मुज से निकलने दिया जाएगा। हालांकि कितने जहाजों को निकलने दिया जाएगा इसके बारे में उन्होंने भविष्य की ओर इशारा करते हुए बात समाप्त कर दी।

इधर 14 मार्च 2026 को भारत के दो एलपीजी (LPG) टैंकर शिवालिक और नंदा देवी होरमुज से निकाल दिए गए हैं और उम्मीद की जा रही है कि 16 मार्च 2026 तक टैंकर गुजरात के तट पर पहुँच जाएंगे।

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