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अंतर्राष्ट्रीय कूटनीति के गलियारों से एक बेहद चौंकाने वाली खबर सामने आ रही है। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प ने इजरायल के प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू को कड़े शब्दों में खरी-खोटी सुनाई है। मीडिया संगठन 'एक्सियोस' की एक हालिया रिपोर्ट के अनुसार, राष्ट्रपति ट्रम्प और इजरायली प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू के बीच फोन पर कूटनीतिक मुद्दों को लेकर चर्चा चल रही थी। इसी बातचीत के दौरान किसी गंभीर मुद्दे पर राष्ट्रपति ट्रम्प अचानक भड़क गए और उन्होंने सख्त लहजे में कहा कि "इसीलिए पूरी दुनिया इजरायल से नफरत करती है।"
ट्रम्प का यह बयान इस समय अंतर्राष्ट्रीय राजनीति और कूटनीतिक हलकों में आग की तरह फैल गया है। हालांकि, वैश्विक नेताओं के साथ ट्रम्प का यह आक्रामक अंदाज नया नहीं है। यह पहली बार नहीं है जब अमेरिकी राष्ट्रपति ने किसी देश के राष्ट्र प्रमुख के साथ इस तरह की तीखी भाषा का इस्तेमाल किया हो। इससे पहले भी ट्रम्प कई मौकों पर विभिन्न देशों के राष्ट्राध्यक्षों से बेहद अजीब और तल्ख लहजे में बात कर चुके हैं, जिससे अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर बड़े कूटनीतिक विवाद खड़े हुए हैं।
डोनाल्ड ट्रम्प के ऐसे बयानों का इतिहास काफी पुराना है। साल 2019 में ट्रम्प ने एक ऐसा बयान दिया था, जिसने वैश्विक स्तर पर सबको हैरान कर दिया था। उन्होंने सार्वजनिक रूप से डेनमार्क के अधीन आने वाले द्वीप 'ग्रीनलैंड' को अमेरिका द्वारा खरीदने की बात कही थी। ट्रम्प के इस दावे पर डेनमार्क की प्रधानमंत्री भड़क गईं थीं। दरअसल, ट्रम्प का तर्क था कि ग्रीनलैंड के वित्तीय बोझ की वजह से डेनमार्क की अर्थव्यवस्था को भारी नुकसान हो रहा है, इसलिए इस क्षेत्र पर अमेरिका का नियंत्रण होना चाहिए।
उनके कहने का तात्पर्य यह था कि यदि डेनमार्क ग्रीनलैंड को अमेरिका के हाथों बेच देता है, तो इसमें उसी का फायदा होगा। ट्रम्प ने इसे दुनिया की सबसे बड़ी 'रियल एस्टेट डील' के रूप में पेश किया था। इस अजीबोगरीब बयान की वजह से दुनिया भर में ट्रम्प की काफी किरकिरी हुई थी। जब डेनमार्क की प्रधानमंत्री मेटे फ्रेडरिक्सन (Mette Frederiksen) ने इस पूरे मामले पर अपनी तीखी आपत्ति दर्ज कराई, तो ट्रम्प ने पलटवार करते हुए उनके बयान को 'Nasty' (घिनौनी) तक कह दिया था।
कनाडा के प्रधानमंत्री जस्टिन ट्रूडो को लेकर भी ट्रम्प का एक बयान काफी चर्चा में रहा था। यह मामला साल 2024 का है, जब अमेरिका ने कड़ा रुख अपनाते हुए कनाडा से आने वाले सामानों पर 25 प्रतिशत का भारी टैरिफ (सीमा शुल्क) बढ़ा दिया था। इस फैसले के बाद, 29 नवंबर 2024 को मार-ए-लागो रिसॉर्ट में पत्रकारों द्वारा पूछे गए एक सवाल के जवाब में ट्रम्प ने विवादास्पद टिप्पणी की थी। उन्होंने कहा था कि अगर कनाडा इस बढ़े हुए टैरिफ को चुकाने में असमर्थ है, तो उसे अमेरिका का 51वां राज्य बन जाना चाहिए और जस्टिन ट्रूडो वहां के गवर्नर के रूप में काम कर सकते हैं। ट्रम्प के इस बयान की कनाडा के राजनीतिक और सामाजिक क्षेत्रों में तीव्र आलोचना की गई थी।
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यूक्रेन के राष्ट्रपति वोलोडिमिर जेलेंस्की के खिलाफ भी अमेरिकी राष्ट्रपति ट्रम्प कई बार बेहद आपत्तिजनक टिप्पणियां कर चुके हैं। 28 फरवरी 2025 को अमेरिका के व्हाइट हाउस में दोनों नेताओं के बीच एक द्विपक्षीय बैठक आयोजित की गई थी। इस महत्वपूर्ण मीटिंग के बीच में ही ट्रम्प ने जेलेंस्की को अचानक टोकते हुए कहा था कि "चलिए, आपने बहुत बात कर ली।"
उनके बात करने के इस तरीके से साफ प्रतीत हो रहा था कि वह जेलेंस्की और उनके देश को अमेरिका के समक्ष अत्यंत बौना साबित करना चाहते हैं। इसके अतिरिक्त, ट्रम्प ने कई वैश्विक मंचों पर जेलेंस्की के लिए 'सेल्समैन' शब्द का इस्तेमाल किया है। उन्होंने बार-बार तंज कसते हुए कहा है कि जेलेंस्की दुनिया के सबसे बेहतरीन सेल्समैन हैं, जो जब भी अमेरिका आते हैं, अरबों डॉलर की सहायता राशि ले जाते हैं।
ईरान-अमेरिका के बीच जारी तनाव और युद्ध जैसी परिस्थितियों के दौरान अमेरिकी राष्ट्रपति ट्रम्प ब्रिटेन के रुख से काफी नाराज नजर आए। मार्च 2026 में ट्रम्प ने ब्रिटिश प्रधानमंत्री कीर स्टॉर्मर पर एक बेहद तीखी और सीधी टिप्पणी की। उन्होंने तंज कसते हुए कहा कि "हम इस समय जिससे कूटनीतिक डील कर रहे हैं, वह ब्रिटेन के महान नेता विंस्टन चर्चिल नहीं हैं।" ट्रम्प के इस बयान से साफ जाहिर था कि वह ब्रिटेन के प्रधानमंत्री को बहुत गंभीरता से नहीं ले रहे हैं।
इसी तरह, ईरान-अमेरिका युद्ध-2026 के माहौल में जब फ्रांस के राष्ट्रपति ने इस पूरे संकट में अमेरिका का खुलकर साथ देने से साफ इनकार कर दिया, तो ट्रम्प ने उन पर भी निशाना साधा। उन्होंने फ्रांसीसी राष्ट्रपति इमैनुएल मैक्रॉन को एक बेहद 'हल्के किस्म का नेता' करार देते हुए कहा कि मैक्रॉन अगली बार फ्रांस का चुनाव नहीं जीत पाएंगे और वह बहुत जल्द सत्ता से बाहर होने वाले हैं। ट्रम्प की इस टिप्पणी पर वैश्विक स्तर पर तीखी प्रतिक्रियाएं देखने को मिलीं। अंतर्राष्ट्रीय विश्लेषकों ने इस पर गंभीर सवाल उठाते हुए पूछा कि आखिर अमेरिका के राष्ट्रपति यह तय करने वाले कौन होते हैं कि फ्रांस का अगला राष्ट्रपति कौन बनेगा और कौन नहीं।
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