केरल चुनाव 2026: महिलाओं का खेल तय करेगा सत्ता! कांग्रेस-बीजेपी या CPI किसे मिलेगा ‘लेडी वोट’?

केरल में महिलाओं की साक्षरता दर लगभग 97 से 99 प्रतिशत के बीच है। इस बात से अंदाजा लगाया जा सकता है कि महिलाओं का प्रभाव चुनावी राजनीति में बहुत बड़े स्तर पर पड़ने वाला है।
सड़क पर आंदोलन करते लोग।
केरल में महिलाओं को टिकट देने में राजनीतिक दलों ने कंजूसी की है। इसका असर यह हो रहा है कि चुनाव में नोटा पर वोट देने की मांग तेज हो गई है। केरल में यह आंदोलन तेज होते दिखाई दे रहा है। AI generated
Published on
Updated on
3 min read

केरल में महिलाओं की आबादी पुरुषों से अधिक है। केरल चुनाव 2026 में महिला वोटरों पर सभी दलों की निगाहें टिकी हुई हैं। महिला वोट को साधने के लिए भाजपा, सीपीआईएम और कांग्रेस ने अपना-अपना फार्मूला तैयार कर लिया है। महिला वोट को अपनी तरफ खींचने के लिए कोशिश लगातार जारी है। 

किस पार्टी को वोट देंगी महिलाएं ?

केरल में महिलाएं पुरुषों से ज्यादा संख्या में हैं। लिंगानुपात देखा जाए तो  प्रति एक हजार पुरुष पर लगभग 1,121 महिलाएं हैं। वहीं महिलाओं के साक्षरता दर की बात करें तो लगभग 97.9% से 99% महिलाएं साक्षर हैं। इस बात से अंदाजा लगाया जा सकता है कि महिलाओं का प्रभाव चुनावी राजनीति में बहुत बड़े स्तर पर पड़ने वाला है। कहते हैं कि महिलाएं यदि पढ़ी लिखी समझदार हों तो फिर चुनाव में अपना निर्णय खुद कर लेती हैं कि किस पार्टी को वोट करना है और किस पार्टी का बहिष्कार करना है।

पिछले बार साल 2021 के केरल विधानसभा चुनाव में सीपीआईएम समर्थित एलडीएफ को महिलाओं ने खुलकर वोट दिया था और एलडीएफ को लगभग 47 प्रतिशत से ऊपर महिलाओं का वोट मिला था। कांग्रेस समर्थित यूडीएफ को पिछले चुनाव में लगभग 35 प्रतिशत वोट हासिल हुआ था। भाजपा के एनडीए को महज 10-12 प्रतिशत वोट मिला था।

यह कयास लगाए जा रहे हैं कि महिलाओं को साधने में कांग्रेस एक बार फिर से सफल हो सकती है क्योंकि परंपरागत रूप से महिला वोट कांग्रेस के खाते में जाता रहा है। वहीं कुछ विश्लेषकों का कहना है कि मुख्यमंत्री पिनराई विजयन ने अपनी सरकार में बहुत सारे नए योजनाओं को लागू किया जिससे महिलाएं सीधे तौर पर लाभान्वित हुई हैं। वाम दलों ने इन योजनाओं के माध्यम से महिला वोट को एलडीएफ की तरफ खींचने की कोशिश की है। 

किस पार्टी से कितनी महिला उम्मीदवार ?

महिलाओं की आबादी पुरुषों से अधिक होने के बावजूद राजनीतिक दलों में इस बार महिला उम्मीदवारों की संख्या बहुत कम नजर आ रही है। सीपीआईएम के नेतृत्व वाले एलडीएफ में सिर्फ 15 महिलाओं को उम्मीदवार बनाया गया है। वहीं भाजपा समर्थित एनडीए में सिर्फ 16 महिलाओं को टिकट दिया गया है। 

कांग्रेस समर्थित यूडीएफ की तरफ से 12 महिलाओं को टिकट दिया गया है। केरल में कुल 140 विधानसभा सीट है। महिलाओं की आबादी अधिक भी है और साक्षरता दर भी अधिक है। तमाम राजनीतिक दलों द्वारा महिलाओं को लेकर जो वादे किए जाते हैं वे इस चुनाव में केरल के राजनीतिक दहलीज पर दम तोड़ते नजर आ रही है। साम्यवाद का नारा बुलंद करने वाली पार्टियां भी इस चुनाव में महिलाओं को टिकट देने में कतराते नजर आईं। राष्ट्रवाद और धर्म ध्वजा फहराने वाली भाजपा भी इस मामले में बहुत पीछे रह गई है। 

यह भी पढ़ें : केरल का पहला चुनाव, पूरी दुनिया में बना एक मिसाल ! महज 28 महीने बाद बर्खास्त हुई पहली गैर-कांग्रेसी सरकार

महिला संगठनों ने किया बहिष्कार !

केरल में महिलाओं को टिकट देने में राजनीतिक दलों ने कंजूसी की है। इसका असर यह हो रहा है कि चुनाव में नोटा पर वोट देने की मांग तेज हो गई है। केरल में यह आंदोलन तेज होते दिखाई दे रहा है। तुल्य प्रातिनिध्य प्रस्थानम (Thulya Prathinidhya Prasthanam) नामक महिला संगठन ने इस चुनाव में बहिष्कार का आह्वान किया है। इस संगठन के समर्थन में बहुत सारे अराजनीतिक महिला संगठनों ने समर्थन दिया है।

इन सभी की मांग है कि जिन विधानसभा में महिला उम्मीदवार नहीं हैं उन सभी विधानसभाओं में किसी भी प्रत्याशी को वोट नहीं दिया जाएगा। तुल्य प्रातिनिध्य प्रस्थानम संगठन में कार्यरत प्रोफेसर कुसुमम जोसेफ (Prof. Kusumam Joseph) ने इस आंदोलन को हवा देने में पूरी ताकत लगा दी है। देखना यह है कि इस आंदोलन का असर चुनाव में पड़ता है या नहीं पड़ता। अगर यह आंदोलन तेज होता है तो इसका असर वामदलों पर पड़ेगा या कांग्रेस पर, यह 4 मई 2026 को साफ हो जाएगा। 

यह भी देखें :

सड़क पर आंदोलन करते लोग।
कश्मीर फाइल्स से धुरंधर तक: फिल्में तय करेंगी असम, केरल और तमिलनाडु का चुनावी परिणाम !

Related Stories

No stories found.
logo
www.newsgram.in