

अमेरिका-ईरान तनाव के कारण तेल की मांग बढ़ी है और रूस पर लगे कुछ प्रतिबंधों में ढील मिली, जिससे रूस को तेल-गैस बेचने का बड़ा अवसर मिल रहा है।
युद्ध की स्थिति में भी चीन ईरान से अंतरराष्ट्रीय बाजार से कम कीमत पर तेल खरीद रहा है, जिससे उसकी अर्थव्यवस्था और ऊर्जा सुरक्षा मजबूत हो रही है।
युद्ध के माहौल में कई देश अपनी सुरक्षा बढ़ाने के लिए हथियार खरीदते हैं, जिससे अमेरिका, रूस, फ्रांस और ब्रिटेन जैसी देशों की डिफेंस कंपनियों को भारी मुनाफा होता है।
हम सबने बचपन में एक कहानी जरूर सुनी होगी, कि दो बिल्लियाँ रोटी के टुकड़े को लेकर झगड़ रही थीं, तो फैसला कराने के लिए वे बंदर के पास गईं। बंदर ने तराजू से बराबर करने के बहाने खुद ही पूरी रोटी खा ली और बिल्लियों को कुछ नहीं मिला। इस कहानी का जो सार निकलता है, वो ये है कि दो लोगों की लड़ाई में फायदा किसी तीसरे को ही होता है। विश्व पटल पर मौजूदा स्थति देखें, तो कुछ ऐसी ही दिखाई पड़ती है।
इजरायल-अमेरिका (Israel-America) और ईरान (Iran) आपस में लड़ रहे हैं। ईरान दुनिया के सबसे बड़े तेल उत्पादक देशों में से एक है और जब-जब मिडिल ईस्ट में लड़ाई होती है, तो दुनिया में तेल की सप्लाई रुकने का खतरा बढ़ जाता है। वर्तमान समय में भी कुछ ऐसी ही हालत है। हालांकि, अमेरिका और ईरान की आपसी लड़ाई में फायदा किसी तीसरे देश को भी हो रहा है। तो जैसा हमने ऊपर कहानी का जिक्र किया था, ठीक यहाँ भी वैसा ही नज़ारा देखने को मिल रहा है। आइये जानते हैं, कौन हैं वो देश, जिनकी इस युद्ध से चांदी हो रही है।
मिडिल ईस्ट में रूस (Russia) हमेशा से ही खुद को मजबूत करने की फिराक में रहा है। अमेरिका (America) और ईरान (Iran) की जंग रूस के लिए किसी सुनहरे अवसर से कम नहीं है। 24 फ़रवरी 2022 को जब रूस-यूक्रेन युद्ध शुरू हुआ, तब वित्तीय प्रतिबंध (Financial Sanctions), ऊर्जा और व्यापार प्रतिबंध (Energy & Trade Sanctions) रूस पर लगे थे। G7 देशों ने रूसी कच्चे तेल पर $60 प्रति बैरल की सीमा तय की ताकि रूस को तेल बेचकर ज्यादा मुनाफा न हो। अमेरिका, ब्रिटेन और EU ने रूसी विमानों के लिए अपना हवाई क्षेत्र (Airspace) पूरी तरह बंद कर दिया।
अब जब अमेरिका (America) और ईरान (Iran) आमने सामने हैं, तो दुनिया में तेल का संकट ना आ जाए, इसके लिए अंकल सैम यानी अमेरिका के तेवर थोड़े ढीले पड़ गए। अमेरिकी प्रशासन ने 12 मार्च 2026 को एक 30-दिन का लाइसेंस (waiver) जारी किया। इसके तहत भारत और अन्य देश उस रूसी तेल को खरीद सकते हैं। भारत ने इसका फायदा उठाया और 30 मिलियन बैरल रूसी कच्चे तेल की खरीददारी कर ली। इसके साथ ही यह भी नहीं भूलना चाहिए कि रूस तेल के साथ गैस निर्यातक भी है। तो ऐसे में रूस के दोनों हाथों में लड्डू है।
वहीं, कई मीडिया रिपोर्ट्स में यह बात चल रही है कि रूस ईरान (Iran) को हथियार दे रहा है लड़ने के लिए और अपने सेटेलाइट के जरिये अमेरिका (America) के ख़ुफ़िया ठिकानों की जानकारी भी दे रहा है। यही कारण है कि ईरान अब तक युद्ध में बना हुआ है। इसके साथ ही रूस को यह भी फायदा हो रहा है कि दुनिया का ध्यान अब यूक्रेन वॉर से हट गया है, जिसका फायदा व्लादिमीर पुतिन अब खूब उठा सकते हैं।
चीन (China) दुनिया की दूसरी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था है। 2025-2026 के आंकड़ों के अनुसार, चीन की कुल अर्थव्यवस्था लगभग $19 ट्रिलियन से $19.4 ट्रिलियन अमेरिकी डॉलर के बीच है। ऐसे में चीन के लिए यह ख़ुशी की बात यह है कि अमेरिका-ईरान युद्ध से USA की अर्थव्यवस्था कमजोर पड़ रही है। ताजा आंकड़ों के मुताबिक अमेरिका ने शुरूआती 6 दिन में ही $11.3 बिलियन (लगभग ₹94,000 करोड़ से ₹1 लाख करोड़) खर्च कर दिए हैं।
विशेषज्ञों के अनुसार यदि यह युद्ध लंबा खिंचता है, तो अमेरिका (America) में महंगाई दर 4.1% तक पहुँच सकती है, जिससे पूरी अर्थव्यवस्था सुस्त पड़ सकती है। इसके साथ ही चीन बहुत कम कीमतों पर ईरान से तेल खरीदता है, जिससे जिनपिंग सरकार की धाक एशिया में मजबूत हो रही है।
बता दें कि इस समय अंतरराष्ट्रीय बाजार में बेंट क्रूड की कीमत वर्तमान में $100 प्रति बैरल के आसपास है लेकिन ईरान (Iran) चीन को $8 से $11 प्रति बैरल कम पर तेल बेच रहा है। इस हिसाब से चीन को ईरानी तेल लगभग $89 से $92 प्रति बैरल के बीच पड़ रहा है। ऐसे में युद्ध वाले स्थति में भी चीन का फायदा है।
बहरहाल, दुनिया में जब भी युद्ध शुरू होता है, तो छोटे देशों को यह डर सताने लगता है कि कहीं उनके ऊपर भी मुसीबत तो नहीं आएगी। ऐसे में वो अपनी सुरक्षा को लेकर चिंतित होते हैं और अरबों डॉलर के हथियार खरीदते हैं। अमेरिका, फ्रांस, ब्रिटेन और रूस हथियार बनाने और बेचने के लिए काफी मशहूर हैं। इस परिस्थति में यहाँ की डिफेंस कंपनियां सक्रिय हो जाती हैं।
इन सारे देशों के मिसाइल, लड़ाकू विमान और रडार सिस्टम की मांग बढ़ जाती है। बता दें कि सुरक्षा चिंताओं के कारण यूरोप का रक्षा बजट 2020 में $378 बिलियन से बढ़कर 2026 में $693 बिलियन हो गया है, जो शीत युद्ध के बाद का उच्चतम स्तर है। ऐसे में युद्ध जैसी भीषण स्थति में भी इन देशों को फायदा ही होता दिखता है।
बता दें कि अमेरिका की राजनीति, सेना और निजी हथियार बनाने वाली कंपनियों के बीच एक शक्तिशाली गठबंधन है, जिसे "मिलिट्री-इंडस्ट्रियल कॉम्प्लेक्स" (Military-Industrial Complex - MIC) कहते हैं, जो हथियारों को बनाती हैं और अरबों डॉलर का मुनाफा कमाती हैं।